After 3 yrs of persistent efforts, Hospital Guest House in Amethi that was used by Congress leader for political purpose is finally vacated. https://twitter.com/smritiirani/status/859374368211828738

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तो क्या होता..! (गज़लनुमा गीत ।)

http://mktvfilms.blogspot.in/2016/02/blog-post.html

यादों की   जात, कुंवारी  होती तो, क्या  होता..!

हिज़्र की लाश, तुम्हारी  होती तो, क्या   होता..!


हिज़्र = जुदाई; कुंवारी = वर्जिन.

१.

छिन   लेता  चैन- ओ -अमन,  तेरे   पैमाने  से ।

किस्मत से   ऐसी   यारी   होती,  तो क्या होता..!


चैन-ओ-अमन= सुखचैन-शांति;  पैमाना= ज़िंदगी.

२.

तेज़  हो  जाती  है क्या धड़कनें,  हर  वस्ल में ?

हमें  भी, दिल की बिमारी होती, तो क्या होता..!


वस्ल=मिलन.

३.

गुमनाम मंज़िलों का सफर, सीधा नहीं  होता ।

पैने   काँटों  की  सवारी  होती  तो, क्या होता..!


मंज़िल=पड़ाव,मुकाम; सीधा=सरल,आसान.

पैना= तीक्ष्ण;धारदार.

४.

ख़ुदकुशी  करने  पर  तुली  थी  कमज़ोर साँसें ।

और   शिकस्त   करारी   होती  तो  क्या होता...!


ख़ुदकुशी= आपघात; शिकस्त=हार,पराजय.


मार्कण्ड दवे - दिनांक - १३-०२-२०१६.
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आप सबको हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं |
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Dear Friends,
My new Story-Book in Hindi, `Mai aur Meri kahaniya` Launch function by Sahityalok Hindi Parishad (Ahmedabad) At M. K. audio-Video Recording Studio. Ahmedabad-Gujarat-India. On Dt:06 July 2014.
http://mktvfilms.blogspot.in/2014/07/mai-aur-meri-kahaniya-launch-function.html
Markand Dave.
mdave42@gmail.com

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कहाँ  खो  गया है आदमी ? (गीत)

KHO GAYA HAI AADAMI-HINDI GEET-MARKAND DAVE
http://mktvfilms.blogspot.in/2012/09/blog-post_7.html
http://mkringtones.blogspot.in/2013/04/blog-post_8.html

अरमानों की  लाशें कितनी, ढो  रहा   है  आदमी..!
मायूसी के  भँवर में  कहाँ,  खो  गया  है  आदमी ?

अंतरा-१.

खिलखिलाता  मातम जहाँ, आँसू  बहाती  ख़ुशियाँ..!
मनचाही  सौगात पाकर  भी,  रो  रहा   है   आदमी ?
अरमानों   की   लाशें  कितनी, ढो  रहा   है  आदमी..!

अंतरा-२.

ज़िच राह भटकना  यहाँ,  नित जीना, नित  मरना  है..!
सादगी का  दम  भर  कर, चरम   सो  रहा  है  आदमी..!
अरमानों  की   लाशें      कितनी,  ढो  रहा   है  आदमी..!
(ज़िच  राह= लाचारी  भरी  ज़िंदगी; चरम= अंतिम )

अंतरा-३.

है  शग़ल  का  हाल  खस्ता, महँगा  पानी, खून  सस्ता ?
तभी  तो   आस्तीन,  इलीस   की   धो  रहा   है  आदमी..!
अरमानों  की      लाशें     कितनी,  ढो  रहा   है  आदमी..!
(शग़ल= रोजगारी; खस्ता=ख़राब) 
(इलीस की आस्तीन= शैतान की  लहूलुहान  बाँह)

अंतरा-४.

वसीयत लिखें  फ़ज़ीअत की  तो, क्या  लिखे  ये  आदमी ?
कवल  अवम, अंगी  को  देकर ,खुश  हो  रहा  है  आदमी..!
अरमानों   की    लाशें     कितनी,   ढो   रहा    है  आदमी..!
(फ़ज़ीअत= दुर्दशा ) (अवम= आख़री) (कवल= निवाला) (अंगी=नेताजी-सरकार)
© मार्कण्ड दवे । दिनांकः०७-०९-२०१२.

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I am quite sure that the knowledgeable readers of SoY would be able to add  more variations of this sub-category, like songs by other female playback singers or songs by different female singers or songs by other music directors – All Versions by Female Singers.

The journey continues…

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यादों  की   बारिश..! (गीत)

http://mktvfilms.blogspot.in/2013/04/blog-post.html
http://mkringtones.blogspot.in/2013/04/blog-post.html

यादों  की   बारिश   हो    रही   है, पलपल   ऐसे..!
सूखी   नदी  में   हो, झरनों  की   हलचल   जैसे..!

१.

दिल का चमन  शायद, गुलगुल  हो न  हो मगर, 
ख़्वाब   होगें  ज़रूर  गुलज़ार, हो  मलमल  जैसे..!
सूखी   नदी  में   हो, झरनों  की   हलचल   जैसे..!

गुलगुल=मुलायम; गुलज़ार=हराभरा 

२.

दर्द - दरख़्त   बूढ़ा,  सो   गया   है  साहिल   पर,
फिर    जागेगा    वह, जवानी   हो   चंचल   जैसे..!
सूखी   नदी  में   हो, झरनों  की   हलचल   जैसे..!

दरख़्त=पेड़; साहिल = तट

३.

दब    गया   पारा - ए - दिल, घाव  के  संग  तले,
फिर   आयेगा   ऊपर, फाड़  कर   दलदल   जैसे..!
सूखी   नदी  में   हो, झरनों  की   हलचल   जैसे..!

पारा-ए-दिल= दिल का एक टूकड़ा; संग=पत्थर

४.

जमकर  बरसना अय तसव्वर, तुम  क्या जानो,
तरस  गये  हैं  कान, सुनने को  कलकल  कैसे..!
सूखी   नदी  में   हो, झरनों  की   हलचल   जैसे..!

तसव्वर=याद; कलकल=जल के बहने से उत्पन्न मधुर शब्द ।

© मार्कण्ड दवे । दिनांकः ०१-०४-२०१३.

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SARAKATI RAAT-HINDI GEET BY MARKAND DAVE.
http://mkringtones.blogspot.in/2013/03/sarakati-raat-hindi-geet-by-markand-dave.html
http://mktvfilms.blogspot.in/2011/10/blog-post_14.html
सरकती रात का आँचल । (गीत)


सरकती रात का, आँचल मैं  थामे  बैठा  हूँ , 
यारों   की  भीड़  में, तन्हाई  थामे  बैठा  हूँ ।

दिदारे यार  को, तरसता रहा, मैं भी, यार भी,

भरी  महफ़िल में  ये,रुसवाई  थामे  बैठा  हूँ ।


अंतरा-१.

आस थी इस शाम को,आयेंगे ना, आये वो..!

बेवफ़ा, ग़मे  आशिकी,गले लगाए  बैठा  हूँ ।

भरी  महफ़िल में  ये,रुसवाई  थामे  बैठा  हूँ ।

यारों   की  भीड़  में, तन्हाई  थामे  बैठा  हूँ ।

अंतरा-२.

प्यार में अक्सर, कहते थे  वो, मर जायेंगे ..!

मैं  न  भूला,आज तक,जाँ  लूटाये  बैठा हूँ ।

भरी  महफ़िल में  ये,रुसवाई  थामे  बैठा  हूँ ।

यारों   की  भीड़  में, तन्हाई  थामे  बैठा  हूँ ।

अंतरा-३.

ना जाने क्यूँ, दामन बचा कर, वो चल दिये..!

राहें  उनकी, रोशन  रहें, दिल जलाए  बैठा हूँ ।

भरी   महफ़िल  में  ये, रुसवाई  थामे  बैठा  हूँ ।

यारों   की  भीड़  में, तन्हाई  थामे  बैठा  हूँ ।

अंतरा-४.

क्या करुं,दिले जलन को,काश ये होता नहीं..!

मर जाउंगा लो, आज  मैं, जाम थामे  बैठा  हूँ ।

भरी   महफ़िल  में   ये,रुसवाई  थामे  बैठा  हूँ । 

यारों   की  भीड़  में, तन्हाई  थामे  बैठा  हूँ ।

© मार्कण्ड दवे । दिनांक-१३-१०-२०११.
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