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बेटी का हरण


रचनाकार की रचना रंग लाई
कानों में आवाज़ आई
एक ओर बेटी घर में आई
(पर) चारों ओर उदासी छाई
भगवान का आशीर्वाद माना
मेरी खुशी का न था ठिकाना
नौ महीने कोख संभाला
हो न जाय कोई हल्ला
चोरी-छिपे कांड हो गया
मेरी बेटी का हरण हो गया
कौन ले गया कहाँ ले गया
किसी ने न बताया क्यों ले गया
एक बार उसका चुंबन न लिया
एक बार उसका चेहरा न देखा
कोई बतादे उसका पता ठिकाना
दिन-रात देखूँ मैं सपना डरावना
कूड़ेदान में न फेंका हो
खूँखार कुत्तों ने न चीरा हो
जल्लादों ने न काटा हो
पहाड़ से न फेंका हो
दिख जाए अगर वह कहीं दूर से
कर लूँगी आलिगन उसका दूर से
ममता मेरी खींच लाएगी उसको दूर से
पहचान लूँगी उसको दूर से
किसी ओर की गोद में खेले मंज़ूर है
किसी ओर को माँ पुकारे मंज़ूर है
कहीं ओर चहके मुझे मंज़ूर है
उसका अस्तित्व रहे बस यही अरमान है ।

रेलगाड़ी की तरह जिंदगी
जन-जन की बोगी से जुड़ हुए…!
तमाम उम्र गुजर जाती है
एक दूसरे से जुड़ते -टूटते हुए…!!
चलती रेलगाड़ी की तरह
सरपट दौड़ती, धीमी कभी तेज !
गंतव्य पाने की अभिलाषा
दहकती कर्म की अग्नि में तेज़ !!
प्राणो को ढोती हुई
जीवन में बोगी रूपी तन !
किसी का समीप
किसी का सुदूर लक्ष्य बन !!
आते अडचने के प्लेटफार्म
जहाँ पल दो पल रूकती है जिंदगी !
छोड़कर यादो के मुसाफिर
फिर रफ़्तार पकड़ चलती है जिंदगी !!
रिश्तो नाते जिसकी राहे
किसी से बिछुड़ना किसी को अपनाती !
रेलगाड़ी की बोगी की तरह
सफर में कभी जोड़ती कभी हटाती जाती !!
कितनी समानता लिए
रेलगाड़ी की तरह जिंदगी चले जिंदगानी !
अपने गंतव्य को पाते ही
स्वंय से अपरिचित रहती जिसकी कहानी !!
!

उँगली उठाना


इंसान गलती खुद कर जाता है
फिर भी नाम दूसरे का लगाता है
और सामने वाले को कमजोर देख
लड़ाई करने के लिए खड़ा हो जाता है ||
रस्ते में केले खाता है
छिलका सड़क पर फेक जाता है
जब दूसरे के फैके छिलके से फिसल जाता है
तो दूसरे को कोसकर शोर मचाता है ||
कूड़ा गाड़ी में कूड़ा डालने में आलस दिखाता है
बाद में अँधेरे का फायदा उठकर कूड़ा बाहर फैक आता है
जब फैके कूड़े से चारो और गन्दा नजर आता है
तो विदेशो में ज्यादा सफाई का गाना गाता है ||
गाड़ी को साफ करने के लिए पानी बहाता है
कोई भैसो को पानी के पाइप से नहलाता है
जब पानी का लम्बा चोडा बिल भरने को आता है
तो बिल को गलत कहकर विभाग के चक्कर लगाता है ||
हलकी सी गर्मी सहन नहीं कर पाता है
पुरे दिन घर में ए०सी ० चलाता है
जहाँ एक लाइट की जरुरत हो वहाँ झूमर जलाता है
फिर मीटर के तेज चलने की शिकायत दर्ज करवाता है ||
दुसरो के बच्चों के चरित्र पर उँगली उठाता है
चारो तरफ उसके दोस्त को उसका आशिक बताता है
जब अपना बच्चा गलती करे तो बच्चा कहकर
समाज में उसकी गलती छुपाता है ||
आखिर कब तक दुसरो पर यह उँगली उठाई जायगीl
उँगली उठाने से पहले देख ले तीन उंगलियाँ तेरी तरफ ही आएगी ||

माँ की याद


मुझे तेरी बहुत याद आती है माँ
तेरी याद तुझसे दूर होने का दर्द दे जाती है माँ
तेरे पास था तो तेरे आँचल में सो जाता था माँ
अब सोने से पहले तेरे खयालो में खो जाता हु माँ
मेरी हर तकलीफ में मुझसे ज्यादा दर्द पाती है माँ
वो भी क्या दिन थे जब अपने हाथो से खिलाती थी माँ
जब पास था तो बाहर जाने को ललचाता था माँ
अब महीनो तुझसे मिलने को तरस जाता हु माँ
तेरे दरखती अहसास की छाँव को नहीं भूल पता हु माँ
वो छाँव बरक़रार है ,अब इसी से खुद को समझाता हु माँ
तेरी ममता के मुजस्समे को मन में बसाया हुआ है माँ
मैने मन में तेरा मंदिर बनाया हुआ है माँ

फिर कैसी आजादी का वो संघर्ष है


वक्त की गणना के 365 दिन और पूर्ण हुए,
अच्छे गए या बुरे गए,
दोनों में इन 365 दिनों का कोई दोष नहीं,
आज जो हम काट रहे हैं,
पहले कभी हमने ही बोया होगा,
हमने नहीं तो, जो हमारे साथ मिलकर काट रहे हैं,
उनने कभी बोया होगा,
तुम्हारा नाम राम है,
तुम्हारा चेहरा अलग है,
उसका नाम राम है,
उसका चेहरा तुमसे अलग है,
उस तीसरे का भी नाम राम है,
उसका चेहरा भी तुमसे अलग है,
फिर, रहीम का चेहरा तुमसे कैसे मिलेगा?
हम तो कभी का छोड़ चुके,
वायदों का हिसाब रखना,
जो उधार कभी वापस न मिले ,
उसको खाते में लिख कर क्या रखना?
हमें जानकर गलीबल, रोज नए शगूफे छोड़ो,
रोज नए सपने गढ़ते जाओ,
उन्होंने 60 साल कुछ न किया,
अब आप, सफाई से लेकर मेक इन इंडिया तक,
सब हमसे करवाओ,
सुनो, उनकी बात सुनो,
जवानी जाने के पहले, बहुत कुछ करना है,
टोना, टोटका, बेगा, तांत्रिक बनकर,
विश्व को शिक्षा देना है,
पर, उसके पहले जो हुआ नहीं देश में उस इतिहास को गढ़ना है,
राम, कृष्ण, बुद्ध, विवेकानंद और परमहंस के देश में,
एक हत्यारे का मंदिर भी तो बनना है,
निकाल दो स्वतंत्रता के संघर्षों को,
इतिहास और पाठ्य पुस्तकों से,
भूल जाओ आम्भी, सांगा की मीराजाफरी,
और भर दो पुस्तकों को,
गौरी, लोधी और खिलजी,बाबर के साथ हुए युद्धों से,
19वीं और 20वीं शताब्दी का आजादी के लिए किया गया,
सत्याग्रह भी कोई संघर्ष है,
न उससे उन्मांद जागता है,
न उसमें कोई हिन्दुतत्व है,
फिर कैसी आजादी का वो संघर्ष है,

गर्भ के अन्धकार में
पनपता एक नव जीवन
बुनता हर पल नए सपने
जीवन की आशा करता
पलता नित नव आलोक में !!
अंतर्मन में शंशय फैला
जागता सा सोता कोख में
चिंतित होता, भ्रमित होता
होगा क्या जब निकलूंगा
इस नरक के मलिन शोक से !!
कैसा होगा मेरा आशियाना
महल मिलेगा या टूटी झोपड़
कही खिलता बचपन होगा
या मिले अन्धकार का साया
बस डूबा रहता इसी सोच में !!
चखूंगा पहली बूँद पंचामृत की
या कड़वे पानी की बून्द मिलेगी
बजेंगे घर में तवा थाल ख़ुशी से
या होगा चंहु और सन्नाटा छाया
डर-डर के जी रहा हू इस खौफ में !!
झूलूंगा में किसी स्वर्ण पालने
या बिछा घास का आसन होगा
फेंका जाऊं किसी कूड़ेदान में
या आँचल से माँ के लिपटा होगा
जब आऊंगा जनमानस लोक में !!
होता है आभास नित्य नवीन
करता कोई इन्तजार आगमन का
सुगबुगाहट से होता भान जैसे
मेरे जनक करते कुछ मीठी सी बाते
लगे की होगा स्वागत बड़े जोश में !!
क्या हूँ मै खुद से अन्जान हूँ
बेखबर कुदरत के अभिनय से
नर – नारी का भेद न जाना
अज्ञानी था जीव जगत रीत से
नित बुनता सपने जीव लोभ में !!
उम्मीदों के पर बढ़ते जाते
घडी-घडी, अवधि बीत रही
समय दिन पक्ष, मास गुजरते
मुक्ति की लग अब आस रही
ये सोच सम्भालूंगा खुद होश में !!
अंत हुआ इन्तजार का
जन्म की बेला आ गयी
लगता अब नौ मास की कैद से
बरी होने की शुभ घडी आ गयी
भर लेगा मुझे हर कोई आगोश में !!

हो सके तो इतना करना
जब दुनिया में तूने पहली सांस ली
तेरे माँ – बाप सदैव तेरे साथ रहे
हो सके तो इतना करना
जब ले रहे हो वो भी अंतिम सांस
उस पल में तू भी उनके साथ रहे !!
जब तू चलना सीख रहा था
उठ-उठ के गिर जाता था
वो उँगली पकड़ तेरे साथ रहे
हो सके तो इतना करना
जब पड़े जरुरत उन्हें किसी हाथ की
उस पल तेरे हाथ में उनका हाथ रहे !!
जब तू कुछ कह नहीं पाता था
बिन बोले हर बात तेरी उन्हें ज्ञात रहे
हो सके तो इतना करना
जब वो कुछ कहने को संकोच करे
उनकी हर जरुरत का तुझे ज्ञान रहे !!
जब चाहा हुई तुझे कुछ पाने की
बिन मांगे वो तेरे लिए तैयार रहे
हो सके तो इतना करना
हो जरुरत जब उनको सहारे की
उस क्षण में तू उनका हथियार रहे !!
जब दुनिया में तूने पहली सांस ली
तेरे माँ – बाप सदैव तेरे साथ रहे
हो सके तो इतना करना
जब ले रहे हो वो भी अंतिम सांस
उस पल में तू भी उनके साथ रहे !!

जन्म से पहले शायद हर एक जीव ऐसा सोचता होगा
कौन जाने किस योनि में जीवन उसको मिलता होगा
जन्मो जन्मो तक सबकी अात्मा को भटकना पड़ता है
कीट पतंगों से पशु पक्षी तक का जीवन जीना पड़ता है
किसको मिलता कैसा जीवन कहते सब फल कर्मो का
लाखो योनि गुजरे जब मिलता सुख मानव जीनव का
न कर व्यर्थ इस जीवन को ये मौका हर बार नहीं मिलता
ले गीता से कुछ ज्ञान जिसमे सच्चे सुख का मन्त्र मिलता
नरक और स्वर्ग का भेद यही है, यही सबकी करनी भरनी
गर्भ गृह तो सबका एक फिर जीवन भिन्न क्यों पाते है !
सुकर्म करो तो स्वर्ग यही, कुकर्मी नरक यही पे पाते है !!
समझ सको तो समझ लो मानव ऐसा “धर्म” कहते है !
जिसको खोजो मंदिर मस्जिद वो तेरे घट में रहते है !!

देखो मम्मी! नन्ही बिटिया,
तुमको आज बताती।
जब तुम रोती, रात रात भर,
मुझको नींद न आती।।

पापाजी अक्सर देते हैं,
शाम-सवेरे ताने।
बात-बात में तुम्हें डाँटते,
करके नये बहाने।।

दादा-दादी को भी देखा,
मैंने उखड़ा-उखड़ा।
रोज पड़ोसी से कहते हैं,
जाकर अपना दुखड़ा।।

दोष तुम्हीं को सब देते हैं,
भीतर बाहर वाले।
दोषी से हमदर्दी सबको,
कैसे खेल निराले।।

घबराती हो ताने सुनकर,
फिर भी तुम चुप रहतीं।
मर जाती पैदा होते ही,
कभी- कभी तुम कहतीं।।

हिम्मत करो और फिर देखो,
एक बात बतलाऊँ।
बेटी नहीं किसी से कम है,
तुमको मैं समझाऊँ।।

माँ मेरी मुझको अवसर दो,
जग में कुछ करने का।
मेरे सर पर हाथ धरो तुम,
गया समय डरने का।।

पढ़ लिखकर मैं बनूँ डाॅक्टर,
सबकी जान बचाऊँ।
बनूँ इन्दिरा मैं भारत की,
सत्ता पर छा जाऊँ।।

अगर कहो तो बन व्यापारी,
लाखों लाख कमाऊँ।
बेटा कभी नहीं कर सकता,
वह कर के दिखलाऊँ।।

इस बेटी को समझो मम्मी,
आज कसम यह खाती।
साथ बुढ़ापे तक दूँगी मैं,
यह विश्वास दिलाती।।
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