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जय श्रीश्याम
तेरा प्यार अनोखा
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जय हनुमान जय बजरंगबली
जय श्रीराम
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राधे राधे ....जय श्रीराधेकृष्णा
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💞 बिसराये ना बिसरे .....तेरे प्रीत भरे अहसास,,,,,

धड़कन - धड़कन तुम बसे .....दूर रहो या पास !! 💞
जय श्रीराधेकृष्णा
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Jai Shri Krishna
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सुप्रभात दोस्तो.👌..जय श्रीराधेकृष्णा
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" सम्पूर्ण श्रीमद्भगवद्गीता " गतांक से आगे - (146)
अध्याय अष्टम : अक्षरब्रह्मयोग (भगवत्प्राप्ति)

अनन्यचेताः सततं यो मां स्मरति नित्यशः।
तस्याहं सुलभः पार्थ नित्ययुक्तस्य योगिनीः ।।14।।

हे अर्जुन! जो अनन्य भाव से निरन्तर मेरा स्मरण करता है उसके लिये मैं सुलभ हूंँ, क्योंकि वह मेरी भक्ति में प्रवृत्त रहता है।

सज्जनों, इस श्लोक में उन निष्काम भक्तों द्वारा प्राप्तव्य अन्तिम गन्तव्य का वर्णन है जो भक्तियोग के द्वारा भगवान् की सेवा करते हैं, पिछले श्लोकों में चार प्रकार के भक्तों का वर्णन हुआ है- आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी, मुक्ति की विभिन्न विधियों का भी वर्णन हुआ है- कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा हठयोग, इन योग पध्दतियों के नियमों में कुछ न कुछ भक्ति मिली रहती है, लेकिन इस श्लोक में शुद्ध भक्तियोग का वर्णन है, जिसमें ज्ञान, कर्म या हठ का मिश्रण नहीं होता, जैसा कि अनन्यचेताः शब्द से सूचित होता है।

भक्तियोग में भक्त श्रीकृष्ण के अतिरिक्त और कोई इच्छा नहीं करता, शुद्धभक्त न तो स्वर्गलोक जाना चाहता है, न ब्रह्मज्योति से तादात्म्य या मोक्ष या भवबन्धन से मुक्ति ही चाहता है, शुद्धभक्त किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं करता, शास्त्रों में शुद्धभक्त को निष्काम कहा गया है, उसे ही पूर्णशान्ति का लाभ होता है, उन्हें नहीं जो स्वार्थ में लगे रहते हैं, एक ओर जहाँ ज्ञानयोगी, कर्मयोगी या हठयोगी का अपना-अपना स्वार्थ रहता है, वहीं पूर्णभक्त में भगवान् को प्रसन्न करने के अतिरिक्त अन्य कोई इच्छा नहीं होती।

इसलिये भगवान् कहते हैं कि जो एकनिष्ठ भाव से उनकी भक्ति में लगा रहता है, उसे वे सरलता से प्राप्त होते हैं, शुद्धभक्त सदैव श्रीकृष्ण के विभिन्न रूपों में से किसी एक की भक्ति में लगा रहता है, श्रीकृष्ण के अनेक स्वांश तथा अवतार है, यथा रामजी तथा नृसिंह भगवान्, जिनमें से भक्त किसी एक रूप को चुनकर उसकी प्रेमाभक्ति में मन को स्थिर कर सकता है, ऐसे भक्त को उन अनेक समस्याओं का सामना नहीं करना पड़ता, जो अन्य योग के अभ्यासकर्ताओं को झेलना पड़ता है।

भक्तियोग अत्यन्त सरल, शुद्ध तथा सुगम है, इसका शुभारम्भ हरे कृष्ण जप से किया जा सकता है, भगवान् सबों पर कृपालु है, किन्तु जैसा कि पहले कहा जा चुका है जो अनन्य भाव से उनकी सेवा करते हैं वे उनके ऊपर विशेष कृपालु रहते हैं, भगवान् ऐसे भक्तों की सहायता अनेक प्रकार से करते हैं, जैसा कि कठोपनिषद् (1/2-23) में कहा गया है- "यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्" जिसने पूरी तरह से भगवान् की शरण ले ली है और जो उनकी भक्ति में लगा हुआ है वही भगवान् को यथारूप में समझ सकता है।

भगवद्गीता में भी दसवें अध्याय के दसवें श्लोक में कहा गया है- "ददामि बुद्धियोगं तम्" ऐसे भक्त को भगवान् पर्याप्त बुद्धि प्रदान करते हैं, जिससे वह उन्हें भगवद्धाम में प्राप्त कर सके, शुद्धभक्त का सबसे बड़ा गुण यह है कि वह देश अथवा काल का विचार किये बिना अनन्य भाव से श्रीकृष्ण का ही चिन्तन करता रहता है, उसको किसी तरह का व्यवधान नहीं होना चाहिये, उसे कहीं भी और किसी भी समय अपना सेवा कार्य करते रहने में समर्थ होना चाहिये, कुछ लोगों का कहना है कि भक्तों को वृन्दावन जैसे पवित्र स्थानों में, या किसी पवित्र नगर में, जहाँ भगवान् रह चुके हो, रहना चाहिये।

किन्तु शुद्धभक्त कहीं भी रहकर अपनी भक्ति से वृन्दावन जैसा वातावरण उत्पन्न कर सकता है, जैसा कि सततम् तथा नित्यशः शब्दों से सूचित होता है, शुद्धभक्त निरन्तर श्रीकृष्ण का ही स्मरण करता है और उन्हीं का ध्यान करता है, ये शुद्धभक्त के गुण है जिनके लिये भगवान् सहज सुलभ है, गीता समस्त योग पध्दतियों में से भक्तियोग की ही संस्तुति करती है, सामान्यतया भक्तियोगी पाँच प्रकार से भक्ति में लगे रहते हैं, पहला है शान्त भक्त, जो उदासीन रहकर भक्ति में युक्त होते हैं, दूसरे है दास्य भक्त, जो दास के रूप में भक्ति से युक्त होते हैं, तीसरे है सख्य भक्त, जो सखा रूप में भक्ति से युक्त होते हैं, चौथा है वात्सल्य भक्त, जो माता-पिता की भाँति भक्ति में युक्त होते हैं तथा पाँचवें है माधुर्य भक्त, जो परमेश्वर के साथ दाम्पत्य प्रेमी की भाँति भक्ति में युक्त होते हैं।

शुद्धभक्त इनमें से किसी में भी परमेश्वर की प्रेमाभक्ति में युक्त होता है और उन्हें कभी नहीं भूल पाता, जिससे भगवान् उसे सरलता से प्राप्त हो जाते हैं, जिस प्रकार शुद्धभक्त क्षणभर के लिये भी भगवान् को नहीं भूलता, उसी प्रकार भगवान् भी अपने शुद्धभक्त को क्षणभर के लिये भी नहीं भूलते, भगवान् के नाम रूपी महामंत्र के कीर्तन की भगवद्भक्ति विधि का यही सबसे बड़ा आशीर्वाद है।

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्‌।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ।।15।।

मुझे प्राप्त करके महापुरुष, जो भक्तियोगी है, कभी भी दुखों से पूर्ण इस अनित्य जगत् में नहीं लौटते, क्योंकि उन्हें परम सिद्धि प्राप्त हो चुकी होती है।

सज्जनों! चूँकि यह नश्वर जगत् जन्म, जरा तथा मृत्यु के क्लेशों से पूर्ण है, अतः जो परम सिद्धि प्राप्त करता है और परलोक कृष्णलोक या गोलोक वृन्दावन को प्राप्त होता है, वह वहाँ से कभी वापस नहीं आना चाहता, इस परमलोक को वेदों में अव्यक्त, अक्षर तथा परमा गति कहा गया है, यानी यह लोक हमारी भौतिक दृष्टि से परे है और अवर्णनीय है, किन्तु यह चरमलक्ष्य है, जो महात्माओं का गन्तव्य है।

महात्मा अनुभवसिद्ध भक्तों से दिव्य सन्देश प्राप्त करते हैं और इस प्रकार वे धीरे-धीरे भगवद्भक्ति में भक्ति विकसित करते हैं और दिव्यसेवा में इतने लीन हो जाते हैं कि वे न तो किसी भौतिक लोक में जाना चाहते हैं, यहाँ तक कि न ही वे किसी आध्यात्मिक लोक में जाना चाहते हैं, वे केवल श्रीकृष्ण का सामीप्य चाहते हैं, अन्य कुछ नहीं, यही जीवन की सबसे बड़ी सिद्धि है, इस श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण के सगुणवादी भक्तों का विशेष रूप से उल्लेख हुआ है, ये भक्त भगवद्भक्ति में जीवन की परमसिद्धि प्राप्त करते हैं, यानी वे सर्वोच्च आत्मायें है।

शेष जारी • • • • • • • • • • •

जय श्री कृष्ण!
ओऊम् नमो भगवते वासुदेवाय्
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हमेशा “बेटियों को ही क्यूं कहा जाता है कि सयानी बन तुझे अगले घर जाना है “बेटों...

को क्यूं नहीं कहा जाता कि सयाना बन किसी ने तेरे लिए अपना घर छोड़कर आना है,
जय श्रीकृष्ण
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जय श्रीकृष्ण सुप्रभात दोस्तो
जय श्रीकृष्ण
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जिंदगी में एक ....
जय श्रीराधेकृष्णा
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