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अंगड़ाइयाँ लेती हुई यह शाम
न जाने कब से इंतज़ार में बैठी है
तनहाइयों के लिये तरसते तरसते
रात तो यूँ ही बीत गयी
तनहाइयों कों को चूमती चूमती...

शब्बाखैर
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अपनी ही अंदरूनी आहट से आहत ऐ मेरे दोस्तों

गलती यह ..क्या मेरी नहीं थी?
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भीतरी महल ...
रंगीन हवायें पैरों से लिपटी रहती हैं जहाँ
सांसों की सुनहरी आभा
कोंपलों के दिये लेकर
अरमानोंकी आरती उतारती
शरमा जाती है वहाँ ...

20.11.17@7.50pm
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