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Dear, members. Greetings!
I am a researcher at JNU. My field of research is dialect and its importance comparing it to Japan's dialect. If you could help me in findind some literary text of Bajjika. It could be a great job to preserve our own language. I hope you would respond. I request Mr. Rajesh to guide me in the given scenario.
Regards,
Pankaj

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आज सकरात हई सब लोगन के हमरा तहफ से सकरात मुबारक हॉ

ये विडंबना ही होगी कि हमारी अगली पीढ़ी को अपनी बोली / भाषा की जानकारी UNESCO वेबसाइट से लेनी पड़े। भारतवर्ष जिसे विश्व विभिन्न संस्कृतियों एवं भाषाओं की विविधता के लिए जानता है, वहीं हम भारतवासी अपने विविधता को पिछड़ापन समझकर अपने इन्द्रधनुषी रंग को बिसराते चले जा रहें हैं। विविध भारत के इंद्रधनुषी रंग में अगर कोई नया रंग ना भर सकें तो कम-से-कम इसे बेरंग होने से बचाएं।
आइए हम अपनी बोली को बचाएं।

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हिले लागल मन

पिपर के पत्ता लेखा हरदम हिले लागल मन
जहिया से देखली तोहरा हेरा गेली हम

सोंच सोंच के हार गेली अब न याद हम करम
मुदा करु कि तोहरे याद के आसपास रहे लगली हरदम

भुल गेली बरहमबाबा न याद रहलन गोसांइ
धरती या असमान मे देखै छि खाली तोहर परछाइ

हे दइव हे भगमान बुझे न सकली भेल छि हम शिला
काहे बनैला आदमी आ काहे रचैला प्यार के लिला


विश्वराज अधिकारी

गीत

भोर के ठण्डी मे फगुनयी बेआर
होरी के राग मे गीत के बाहार

भोर के ठण्डी मे फगुनयी बेआर
होरी के राग मे गीत के बाहार
डुबे लागल गावँ फगुआको रंग मे
रहे खोजे मन हरपल पाहुन सँग मे

भोर के ठण्डी मे फगुनयी बेआर
होरी के राग मे गीत के बाहार

एक बेर बहगेल नफिरे नदी के पानी
लौट के फेर कहियो न आबे जबानी
कह कह के हारगेली नफिरल देश मे
कइसे रमगेल बेदर्दी दूर परदेश मे

भोर के ठण्डी मे फगुनयी बेआर
होरी के राग मे गीत के बाहार

रंग रुप उडला परे कि होइ धन
कैसे जतन करु भरल जोवन
जल्दी से आबा अब छोड के सोना चानी
साथ साथ काटे इ अमनोल जिन्दगानी

भोर के ठण्डी मे फगुनयी बेआर
होरी के राग मे गीत के बाहार


विश्वराज अधिकारी

न परु नेता के फेर मे

इ नेता उ नेता सब नेता सत्ता के बडका बेपारी
जनता मरे भुख से नेता के भन्सा मे सोना के थारी


इ नेता उ नेता सब नेता कुर्सी के फेर मे
जनता सुते कादो मे नेता सोना चानी के ढेंड मे


ओझरागेल जनता नेता के भाषण के जाल मे
गीर गेल मुह के बले मर गेल अकाल मे


एक दिन त खडा होइ अपन अपन पैर मे यी जनता
अपन जिन्गी के एक दुन खुद होइ कुसल अभियन्ता





विश्वराज अधिकारी
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