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यंदा 'योग दिनी' सूर्यनमस्काराचा समावेश नाही

नवी दिल्ली : यंदा २१ जून रोजी साजऱ्या होणाऱ्या आंतरराष्ट्रीय योग दिनाच्या कार्यक्रमात 'सूर्यनमस्कार' आसनाचा समावेश नसेल. योग 'ॐ'च्या उच्चारणाशिवाय पूर्ण होत नाही. तथापि, नसले तरीही यंदा तेही अनिवार्य नसेल, असे केंद्रीय आयुषमंत्री श्रीपाद नाईक यांनी स्पष्ट केले.


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अपघातांमध्ये मुंबई प्रथम

नवी दिल्ली : रस्ते अपघातात मुंबई प्रथम क्रमांकावर, मात्र मृतांच्या संख्येत दिल्ली पहिल्या क्रमांकावर आहे. २०१५ मध्ये मुंबईत सर्वाधिक २३,४६८ रस्ते अपघात झाले, तर दिल्लीत सर्वाधिक १,६२२ अपघाती मृत्यू झाले. २०१५ मध्ये देशभरात पाच लाख रस्ते अपघात झाले. त्यात १.४६ लाख लोक ठार झाले. २०१५ मध्ये १३ राज्यांत ८७.२ टक्के रस्ते अपघात झाले. त्यात तामिळनाडूत सर्वाधिक ७९,७४६ लोक जखमी झाले. या यादीत कर्नाटक, मध्य प्रदेश, केरळ, महाराष्ट्र, आंध्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, तेलंगणा, गुजरात, छत्तीसगढ, ओडिशा, पश्चिम बंगाल यांचाही समावेश आहे.


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मानवी जीवन का सच ओशो रजनीशजी का तत्वज्ञान!
'काम और समाधि" एक हो के, तृप्त होने की कला है एक भावदशा है,लेकिन पुरुष के अहंकार ने को तोड़ दिया काम और समाधि को,
असल में अहंकार पाने और जितने की भावदशा का नाम है इसीलिए पुरुष की उत्सुकता किसी भी स्त्री में तभी तक होती है, जब तक वह उसे पा नहीं लेता! या उससे पूरी तरह परिचत नहीं हो जाता।पाते ही उसकी उत्सुकता समाप्त हो जाती है,पूरी तरह परिचित होते ही फिर कोई रस नहीं रह जाता।
नीत्शे ने कहा है कि पुरुष का गहरे से गहरा रस विजय में है पाने में है! इसलिए पत्नी में उत्सुकता समाप्त हो जाती है, क्योंकि वह पाई ही जा चुकी; उसमें कोई अब जीतने को बाकी नहीं रहा है। इसलिए जो बुद्धिमान पत्नियां हैं, वे सदा इस भांति जीएंगी पति के साथ कि जीतने या पाने को कुछ बाकी बना रहे। नहीं तो पुरुष का कोई रस सीधे स्त्री में नहीं है। अगर कुछ अभी पाने को बाकी है तो उसका रस होगा। अगर सब पा चुका है तो उसका रस खो जाएगा। तब कभी-कभी ऐसा भी घटित होता है कि अपनी सुंदर पत्नी को छोड़ कर वह एक साधारण स्त्री में भी उत्सुक हो सकता है। और तब लोगों को बड़ी हैरानी होती है कि यह उत्सुकता पागलपन की है, इतनी सुंदर उसकी पत्नी है और वह नौकरानी के पीछे दीवाना हो!
पर आप समझ नहीं पा रहे हैं, नौकरानी अभी पाई जा सकती है; पत्नी पाई जा चुकी! सुंदर और असुंदर बहुत मौलिक नहीं हैं। जितनी कठिनाई होगी पाने में, उतना पुरुष का रस गहन होगा। और स्त्री की स्थिति बिलकुल और है, जितना पुरुष मिला हुआ हो, जितना उसे अपना मालूम पड़े, जितनी दूरी कम हो गई हो, उतनी ही वह ज्यादा लीन हो सकेगी। स्त्री इसलिए पत्नी होने में उत्सुक होती है; प्रेयसी होने में उत्सुक नहीं होती। पुरुष प्रेमी होने में उत्सुक होता है; पति होना उसकी मजबूरी है।
स्त्री का यह जो संतुलित भाव है, विजय की आकांक्षा नहीं है, यह ज्यादा मौलिक स्थिति है। क्योंकि असंतुलन हमेशा संतुलन के बाद की स्थिति है। संतुलन प्रकृति का स्वभाव है। इसलिए हमने पुरुष को पुरुष कहा है और स्त्री को प्रकृति कहा है। प्रकृति का मतलब है कि जैसी स्थिति होनी चाहिए स्वभावतः वही होति है स्त्री पुरुष दोनों का गहरे में मिल्न एक असाधरण बात है पुरुष प्रकुतिक के पास ऎसे जाये जैसे मंदिर में परमात्मा के दर्शन का श्रद्धा का भाव हो इसको ऐसा समझें, जैसे की वह देवी हो, पति को ऐसा समझें कि जैसे कि वह परमात्मा है। औ जितना आदमी चिन्तित होता है।
जितना परेशान होता है। जितना क्रोध से भरा होता है।जितना घबराया होता है, जितना एंग्विश में होता है।
उतना ही ज्यादा वह काम में प्रवेश करता है।और मजे की बात हमारे सारे धर्म स्थलो पे भी चीन्तित क्रोधी,डरपोक,परेशान और अहंकारी लीग ही जाते है ।आनंदित आदमी काम के पास नहीं जाता। दुखी आदमी काम और मंदिर की तरफ जाता है। क्योंकि दुख कोभुलाने के लिए इसकोएक मौका दिखाई पड़ता है।लेकिन स्मरण रखें कि जब आप दुःख में जायेंगे, चिंता में जायेंगे,उदास हारे हुए जायेगे, क्रोध में लड़े हुए जायेंगे। तब आप काम की उस गहरी अनुभूति को उपलब्ध नही हो पायेंगे जब आनंद में हों, जब प्रेम में हों, जब प्रफुल्लित
हों और जब प्राण ‘प्रेयर फुल’ हों। जब ऐसा मालुम पड़े कि आज
ह्रदय शांति से और आनंद से कृतज्ञता से भरा हुआ है, तभी क्षण है
—तभी क्षण है काम के निकट जाने का मंदिर में प्रवेश करने का । और वैसा व्यक्ति काम से समाधि को उपलब्ध होता है। और एक बार भी
समाधि की एक किरण मिल जाये। तो काम से सदा केलिए मुक्त हो जाता है। और वो समाधि में गतिमान हो जाता है।इसीलिए स्त्री और पुरूष का मिलन एक बहुत गहरा अर्थ रखता है।
गहरे से गहरा अनुभव मनुष्य को काम के अनुभव में होता है। वह पहला अनुभव है प्रेम में जुड़ जाने का। और जो
व्यक्ति इस जुड़ जाने के अनुभव को—प्रेम की प्यास, जुड़ने की
आकांशा के अर्थ में समझेगा,वह आदमी एक दूसरे अनुभव को भी
शीध्र उपलब्ध हो सकता है। दुसरा अनुभव है समाधि का ,समाधि के मायने लोगो ने गलत मैकाले है ये कोइसिर्फ साधू सन्यासियो की भाषा नहीं है समाधि तो हर आत्मा के प्यास की "तृप्ती" है ये बात समझ ले पहले इसलिए योगी तो जुड़ता है, साधु भी जुड़ता है। संत भी जुड़ता है,समाधिस्थ व्यक्ति भी जुड़ता है। कामी भी जुड़ता है।काम में दो व्यक्ति जुड़ते है। एक व्यक्ति दूसरे से जुड़ता है
और एक हो जाता है।
समाधि में एक व्यक्ति समष्टि से जुड़ता है और एक हो जाता
है।काम दो व्यक्तियों के बीच मिलन है।और समाधि में अनन्त से जुड़ जाता है ।
और ध्यान देने योग्य दुसरी बात,की काम के क्षण में ध्यान दोनों आंखों के बीच,हो टॉजिसे योग आज्ञा चक्र को कहता है। वहां अगर ध्यान होतो काम की सीमा और समय तीन घंटे तक बढ़ाया जा सकता है। और
एक संभोग व्यक्ति को सदा के लिए ब्रह्मचर्य में
प्रतिष्ठित कर देगा—न केवल एक जन्म के लिए, बल्कि अगले
जन्म के लिए भी। वह अनुभव चाहे इस जन्म का हो,चाहे पिछले जन्म का हो—जो इस जन्म में ब्रह्मचर्य को उपलब्धहोता है, वह पिछले जन्मों के गहरे संभोग के अनुभव के आधार पर
और किसी और आधार पर नहीं। कोई और रास्ता है नहीं,0लेकिन अगर पिछले जन्म में किसी को गहरे संभोग की अनुभूति
हुई हो ता इस जन्म के साथ ही वह सेक्स से मुक्त पैदा होगा।
उसकी कल्पना के मार्ग पर सेक्स कभी भी खड़ा नहीं होगा
और उसे हैरानी दूसरे लोगों को देखकर कि यह क्या बात है।
लोग क्यों पागल हैं, क्यों दीवाने है? उसे कठिनाई होगी
यह जांच करने में कि कौन स्त्री है, कौन पुरूष है? इसका भी
हिसाब रखने में और फासला रखने में कठिनाई होगी।ये कठिनाई का अहसास बुद्ध को भी हुआ था
लेकिन कोई अगर सोचता हो कि बिना गहरे अनुभव के कोई
बाल ब्रह्मचारी हो सकता है। तो बाल ब्रह्मचारी नहीं
होगा, सिर्फ पागल हो जायेगा। जो लोग जबरदस्ती
ब्रह्मचर्य थोपने की कोशिश करते है, वह विक्षिप्त होते है और
कहीं भी नहीं पहुंचते।
ब्रह्मचर्य थोपा नहीं जाता। वह अनुभव की निष्पति है। वह
किसी गहरे अनुभव का फल है। और वह अनुभव काम का ही
अनुभव है। अगर वह अनुभव एक बार भी हो जाए तो अनंत जीवनकी यात्रा के लिए सेक्स से मुक्ति हो जाती है।
तो , उस गहराई के लिए—श्वास शिथिल
हो इतनी शिथिल हो कि जैसे चलती ही नहीं और ध्यान,
सारी अटैंशन आज्ञा चक्र के पास हो। दोनों आंखों के बीच
के बिन्दु पर हो। जितना ध्यान मस्तिष्क के पास होगा,
उतनी ही काम की गहराई अपने आप बढ़ जायेगी। और
जितनी श्राव शिथिल होगी, उतनी लम्बाई बढ़ जायेगी।
और आपको पहली दफा अनुभव होगा कि काम का आकर्षण
नहीं है मनुष्य के मन में। मनुष्य के मन में समाधि का आकर्षण है।
और एक बार उसकी झलक मिल जाए, एक बार बिजली चमक
जाये और हमें दिखाई पड़ जाये अंधेरे में कि रास्ता क्या है
फिर हम रास्ते पर आगे निकल सकते है।
एक आदमी एक गंदे घर में बैठा है। दीवालें अंधेरी है ओर धुएँ से पूती
हुई है। घर बदबू से भरा हुआ है। लेकिन खिड़की खोल सकता है।
उस गंदे घर की खिड़की में खड़े होकर वह देख सकता है दूर
आकाश को तारों को सूरज को, उड़ते हुए पक्षियों को। और
तब उसे उस घर के बहार निकलने में कठिनाई नहीं रह जायेगी।
जिस दिन आदमी को काम के भीतर समाधि का पहली
थोड़ी सह भी अनुभूति होती है उसी दिन सेक्स का गंदा
मकान सेक्स की दीवालें अंधेरे से भरी हुई व्यर्थ हो जाती है
आदमी बाहर निकल जाता है।
लेकिन यह जानना जरूरी है कि साधारणतया हम उस मकान
के भीतर पैदा होते है। जिसकी दीवालें बंद है। जो अंधेरे से पूती
है। जहां बदबू है जहां दुर्गंध है और इस मकान के भीतर ही पहली
दफ़ा मकान के बाहर का अनुभव करना जरूरी है, तभी हम बहार
जा सकते है। और इस मकान को छोड़ सकते है। जिस आदमी ने
खिड़की नहीं खोली उस मकान की और उसी मकान के
कोने में आँख बंद करके बैठ गया है कि मैं इस गंदे मकान को नहीं
देखूँगा, वह चाहे देखे और चाहे न देखे। वह गंदे मकान के भीतर ही हैऔर भीतर ही रहेगा।जिसको हम ब्रह्मचारी कहते है। तथाकथित जबर दस्ती थोपेहुए ब्रह्मचारी, वे सेक्स के मकान के भीतर उतने ही है जितना
की कोई भी साधारण आदमी है। आँख बंद किये बैठे है, आप आँख
खोले हुए बैठे है, इतना ही फर्क है। जो आप आँख खोलकर कर रहे है,
वह आँख बंद कर के भीतर कर रहे है। जो आप शरीर से कर रहे है। वे मन
से कर रहे है। और कोई फर्क नहीं है।
इसलिए काम के प्रति दुर्भाव छोड़ दे। समझनेकी चेष्टा,प्रयोग करने की चेष्टा करें और काम को एक पवित्रता की स्थिति दे।एक भाव दशा चाहिए काम के पासजाते समय। वैसा भाव-दशा जैसे कोई मंदिर के पास जा रहाहै। क्योंकि काम के क्षण में हम परमात्मा के निकटतम होते है।
इसीलिए तो काम में परमात्मा सृजन का काम करता है। औरनये जीवन को जन्म देता है। हम क्रिएटर के करीब होते है। औरसमाधि एक व्यक्ति और अनंत के बीच मिलन है।काम और समाधि दो का मिलान है एक होने के लिए समझ चाहिए समझने के लिए ।

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