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Anmol Tiwari
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Thanks sir ji

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मेवाड़ के वीर
मेवाड़ के उन वीरों की        हस्ती अभी भी बाकी हैं। फिर से जनमेगा प्रताप        ये उम्मीद अभी भी बाकी हैं।। मान बढ़ाया जग में जिसने        उन वीरों की क्या बात करूँ। क्या कुंभा क्या राणा सांगा       चेतक की मै साख भरूँ।। भूखे प्यासे फिरे वनों में         वो...

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कविता==माँ
मेरे तन्हाई के आलम मैं भी,
एक ख़ुशी दे जाती हैं माँ।
एक दृष्टि मेरी और डाल,
जाने क्या कर जाती हैं माँ।।
क्या जादू है उसके हाथों में,
मैं कभी जान ही ना पाया।
पर कैसे मेरे मन की,
हर बात समझ जाती है माँ।।
हर ग़म के साये मे वो,
पास आकर के मेरे।
अपने पल्लू से पसीने को,
पौछ जाती हैं माँ।।
माँ तू माँ नहीं मेरे,
सीने में धड़कता दिल है।
तभी तो मेरे दिल का ,
हर हाल समझ लेतीं हैं माँ।।
शैशव में सीने से,
बचपन में झूले से।
दिन में गीत लोरियों से,
रात को सुलाती हैं माँ।।
इसीलिए तो बहुत याद आती हैं माँ।।
जवानी की ज़िद मे उससे,
कहीं रूठ ना जाऊँ।
मेरे हर अरमाँ पे ,
ख़ुशियाँ लुटाती हैं माँ।।
मैं कलेजा हूँ उसका,
वों साँसें है मेरी।
तभी तो हर साँस में ,
बसी होती हैं माँ।।
इसीलिए तो इस दुनिया मैं,
सबसे ख़ास होती है माँ
कवि-अनमोल तिवारी" कान्हा"

काव्य ग्रंथ:-चाणक्य गीतिका
खंडकाव्य(भाग-1 मातृवंदना)
कवि=अनमोल तिवारी!कान्हा"
।।श्री।।
सौम्य शिखर हिम अतुल जहाँ,
उत्तर की पवनें ठंडी हैं।
परचम अपना फहराती वो,
भारत भूमि अखंडी हैं।।
पारावार जो अपार जल से,
इसके चरणों को धोता हैं।
देव जन्म भी जिस भूमि पर,
बड़ा ही दुर्लभ होता हैं।।
इसके कण-कण की शौर्यता का,
में कहाँ-कहाँ गुणगान करूँ?
नमो-नमो हे! मातृभूमि,
वंदन में अपना शीश धरूँ।।
हे! बुद्धि की दात्री माँ ,
मेरे सुर में आशीस भर देना।
कर सकूँ एक सृजन नया में,
सेवक पर कृपा कर देना।।
आर्याव्रत की गाथा का एक,
लघु अंश में लिखता हूँ।
मगधपुरी के राजमहल से,
नूतन पता क्षेप करता हूँ।।
खंड--2(चाणक्य अपमान )
इतिहास जिस जनपद को,
शीश मुकुट सम कहता हैं।
तीन वंश अति प्रसिद्ध हुए,
ये इतिहास गवाही देता हैं।।
हर्यक वंश शिशुनाग वंश और,
नंद वंश का नाम सुनो।
और 322ई•पू•के ,
मौर्य वंश का काम सुनो।।
नंद वंश की कांत लता पर,
धनानन्दं एक नाम हुआ।
ठीक उसी के राजकाज में,
चाणक्य पराक्रम हुआ।।
धनानन्द के आनंद ने,
सब कुछ हाल बदल डाला।
भोग विलासी अभिलाषा ने,
बाहुपास जकड डाला।।
भद्र पुरुषों का राजमहल में,
उसके कोई मान ना था।
और रंग महल की प्राचीरों से,
बाहर उसका ध्यान ना था।।
(साथियों रचना जारी रहेगी कृपया
अपने विचारों से अवगत कराएं
आपका अमूल्य सुझाव मुझे और
उत्तम रचना हेतु प्रेरित करेगा
सादर धन्यवाद

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Jai matarani
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