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Bhavana Tiwari
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सुन ऐ ज़िन्दगी तुझे मैं अपनी शर्तों पर रखूँगी !
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नवगीत -कर्ज़ से हारा रघुआ
दंश झेलता बदहाली का हुआ राम को प्यारा रघुआ। पारसाल के वचन भरोसे सोचा   कष्ट कटेंगे। रह-रह जो आँखों में उमड़े दुख के मेघ छँटेंगे। अंध नगर में , अंधे पीसें चौपट राजा झूठे वादे शोषित लिपट नीम से रोया   और कर्ज़ से हारा रघुआ। पास नहीं   फूटी कौड़ी भी जिससे मुँह भर...
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गीत - कर्ज़ से हारा रघुआ।
दंश झेलता
बदहाली का हुआ राम
को प्यारा रघुआ। पारसाल के
वचन भरोसे सोचा   कष्ट
कटेंगे। रह-रह जो
आँखों में उमड़े दुख के
मेघ छँटेंगे। अंध नगर
में , अंधे
पीसें चौपट राजा झूठे वादे शोषित
लिपट नीम से रोया   और कर्ज़
से हारा रघुआ। पास नहीं   फूटी कौड़ी
भी जिससे
मुँह भर...
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...पैदा होते ही माँ के स्तनों को ढूँढने वाला शिशु, जिस योनिमार्ग से निकल कर, सांसारिक जीवन-यात्रा आरम्भ करता, पुरुष बनकर वही अन्य स्त्रियों का अपमान करता है. घोर आशचर्य की बात नहीं, सत्य है कि यदि माँ चाहे तो उसे यह पौरुष कभी प्राप्त न हो.माँ- बहन की गाली देने वाले कुछ तो मनुष्यता लाओ पाने भीतर. शर्म आती है. स्त्रियाँ सार्वजनिक स्थानों पर ऐसे ही अपमानित की जाती रहीं हैं.. माँ -बहन की गाली भाषिक और वाचिक बलात्कार है.

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कवयित्री विशेषांक हेतु रचनाएँ आमंत्रित
कवयित्री विशेषांक के लिए रचनाएँ आमंत्रित ---------------------------------------------------   काव्य-केंद्रित त्रैमासिक पत्रिका "अनन्तिम"   का आगामी अंक (जुलाई-सितम्बर 2017) काव्य-की किसी भी विधा में अपनी तीन-तीन रचनाएँ प्रेषित करें। लघु विधाओं में यथा दो...
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टँगे-टँगे खूँटी पर आख़िर,
कहाँ तलक़ हम
सत्य बाँचते ।

न्यायालय की चौखट
सच से दूर बड़ी थी।
कानूनों की सूची
धन के पास खड़ी थी।

सगे-सगे वादी थे
लचकर,
मुंसिफ़ कब तक
तथ्य जाँचते ।

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कागज़-पत्तर के ढेरों में  
मैं थककर सपने बुनती हूँ ।
कानों की खिड़कियाँ भेड़कर 
साहिब की झिड़की सुनती हूँ।
बंद बैग में
सपने रखकर,
दिन भर खटती रही ज़िन्दग़ी ।
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