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चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’
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मेरी पैदाइश बस्ती ज़िले के एक मध्यवर्गीय जमींदार परिवार में हुई। लेकिन मेरे पैदा होने तक जमींदारी मटियामेट हो चुकी थी। बस ऐंठन बाकी थी। मेरे वालिद ने उच्च शिक्षा हेतु मेरा दाख़िला इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कराया पर पढ़ाई के दौरान ही उनका इंतकाल हो गया। जैसे तैसे शिक्षा पूरी की। इकलौती औलाद होने के नाते मुझे घर को संभालने वापस आना पड़ा। पढ़ाई लिखाई का शौक़ था और गाँवं के ही क़रीब ही महाविद्यालय के पुस्तकालय में नौकरी मिल गयी तो यह शौक़ भी पूरा हो रहा है। मीर तथा ग़ालिब की ग़ज़लें पढ़ पढ़कर हुई तुकबन्दी की शुरुआत ने ग़ाफ़िल बना दिया। अब बतौर ग़ाफ़िल आपके सामने हूँ इस तमन्ना के साथ कि- ग़फ़लत में ही यूँ ज़िन्दगी हंसते और गाते, यारों से गप लड़ाते गुज़र जाय तो अच्छा।
मेरी पैदाइश बस्ती ज़िले के एक मध्यवर्गीय जमींदार परिवार में हुई। लेकिन मेरे पैदा होने तक जमींदारी मटियामेट हो चुकी थी। बस ऐंठन बाकी थी। मेरे वालिद ने उच्च शिक्षा हेतु मेरा दाख़िला इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कराया पर पढ़ाई के दौरान ही उनका इंतकाल हो गया। जैसे तैसे शिक्षा पूरी की। इकलौती औलाद होने के नाते मुझे घर को संभालने वापस आना पड़ा। पढ़ाई लिखाई का शौक़ था और गाँवं के ही क़रीब ही महाविद्यालय के पुस्तकालय में नौकरी मिल गयी तो यह शौक़ भी पूरा हो रहा है। मीर तथा ग़ालिब की ग़ज़लें पढ़ पढ़कर हुई तुकबन्दी की शुरुआत ने ग़ाफ़िल बना दिया। अब बतौर ग़ाफ़िल आपके सामने हूँ इस तमन्ना के साथ कि- ग़फ़लत में ही यूँ ज़िन्दगी हंसते और गाते, यारों से गप लड़ाते गुज़र जाय तो अच्छा।

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समझ सकते हैं मालिक आप जो व्यापार करते हैं
मेरा कुनबा भला टुकड़ों में क्यूँ सरकार करते हैं वही तो आप भी करते हैं जो गद्दार करते हैं सगे भाई ही हैं हम हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई हम इक दूजे को जाँ से भी ज़ियाद: प्यार करते हैं कहाँ हम हिज़्र के आदी हैं अब तक वस्ल है अपना बिछड़ने को हमें मज़्बूर ही क्यूँ यार ...
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तुझ बेवफ़ा से वैसे भी अच्छा रहा हूँ मैं
काटा किसी ने और गो बोता रहा हूँ मैं दुनिया के आगे यूँ भी तमाशा रहा हूँ मैं आया नहीं ही लुत्फ़ बगल से गुज़र गया इतना कहा भी मैंने के तेरा रहा हूँ मैं इल्ज़ाम क्यूँ लगाऊँ तुझी पर ऐ बेवफ़ा ख़ुद से भी जब फ़रेब ही खाता रहा हूँ मैं मुझसे किया न जाएगा तौहीने मर्तबा कुछ ...
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क्या ये सच है के दार होता है
कौन अब ग़मग़ुसार होता है ज़ेह्न पर बस ग़ुबार होता है ख़ार जी में है फूल बातों में यूँ ही दुनिया में यार होता है हों न अश्आर दोगले क्यूँ जब सर वज़ीफ़ा सवार होता है आज के दौर में तो हाए ग़ज़ब इश्क़ भी क़िस्तवार होता है कू-ए-जाना के बाद ग़ाफ़िल जी क्या ये सच है के दार होता...
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मैं क्या हूँ आप क्या हो न ये तज़्किरा करो
होना तो चाहिए ही सलीक़ा के क्या करो क्यूँ मैं कहूँ के आप भी ये फ़ैसला करो मैं तो किया हूँ इश्क़ ये मर्ज़ी है आपकी रक्खो मुझे जी दिल में के दिल से जुदा करो रुस्वाइयों से चाहिए मुझको नहीं निज़ात इतना मगर हो आप ही बाइस रहा करो दुनिया के रंगो आब में घुल मिल गए हैं स...
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ख़याल इतना रहे लेकिन ज़ुरूरत भर सँभलना तुम
किसी से भी कभी भी मत किए वादे से टलना तुम भले जलना पड़े ता'उम्र मेरे दिल तो जलना तुम इधर चलना उधर चलना किधर चलना है क्या बोलूँ जिधर भी जी करे उस ओर पर अच्छे से चलना तुम मचलना हो अगर फूलों की ख़ुश्बू या के सूरत पर न रोकूँगा दिले नादाँ मगर बेहतर मचलना तुम शिफ़ार...
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इश्क़ फ़रमाए मुझे अब इक ज़माना हो चुका है
सोचता हूँ यार मुझको इश्क़ माना हो चुका है मेरे खो जाने का पर क्या यह बहाना हो चुका है अब तो लग जाए मुहर दरख़्वास्त पर ऐ जाने जाना इश्क़ फ़रमाए मुझे अब इक ज़माना हो चुका है तू भी आ जाए के मुझको कल ज़रा आ जाए आख़िर चाँद का भी रात के पहलू में आना हो चुका है रश्क़ करने...
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पर हुज़ूर मुस्कुराइए!
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गुलाब कर देगा?
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सोच सकते हैं पा नहीं सकते
शख़्स जो डगमगा नहीं सकते अस्ल रस्ते पर आ नहीं सकते ज़िन्दगी इक हसीन गीत है गो लोग पर गुनगुना नहीं सकते ऐसी कुछ शै हैं जैसे तू है जिन्हें सोच सकते हैं पा नहीं सकते वस्ल का उनके ख़्वाब देखें क्यूँ जिनको हम घर बुला नहीं सकते हक़ है क्या तोड़ने का ग़ाफ़िल अगर हम कोई ग...
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जाने क्यूँ मेरा मर्तबा जाने
हर कोई बात क्यूँ ख़ुदा जाने क्यूँ न इंसान भी ज़रा जाने मुझको इक बार याद कर लेता मैं भी आ जाता यार क्या जाने मेरी बू तो फ़ज़ाओं में है लोग शुक्र है मुझको दिलजला जाने ग़म तो ये है के लोग मुझसे कहीं जाने क्यूँ मेरा मर्तबा जाने ग़ाफ़िल आएगा क़त्ल होने को कौन जब वो इल्म...
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