Profile cover photo
Profile photo
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’
1,990 followers -
मेरी पैदाइश बस्ती ज़िले के एक मध्यवर्गीय जमींदार परिवार में हुई। लेकिन मेरे पैदा होने तक जमींदारी मटियामेट हो चुकी थी। बस ऐंठन बाकी थी। मेरे वालिद ने उच्च शिक्षा हेतु मेरा दाख़िला इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कराया पर पढ़ाई के दौरान ही उनका इंतकाल हो गया। जैसे तैसे शिक्षा पूरी की। इकलौती औलाद होने के नाते मुझे घर को संभालने वापस आना पड़ा। पढ़ाई लिखाई का शौक़ था और गाँवं के ही क़रीब ही महाविद्यालय के पुस्तकालय में नौकरी मिल गयी तो यह शौक़ भी पूरा हो रहा है। मीर तथा ग़ालिब की ग़ज़लें पढ़ पढ़कर हुई तुकबन्दी की शुरुआत ने ग़ाफ़िल बना दिया। अब बतौर ग़ाफ़िल आपके सामने हूँ इस तमन्ना के साथ कि- ग़फ़लत में ही यूँ ज़िन्दगी हंसते और गाते, यारों से गप लड़ाते गुज़र जाय तो अच्छा।
मेरी पैदाइश बस्ती ज़िले के एक मध्यवर्गीय जमींदार परिवार में हुई। लेकिन मेरे पैदा होने तक जमींदारी मटियामेट हो चुकी थी। बस ऐंठन बाकी थी। मेरे वालिद ने उच्च शिक्षा हेतु मेरा दाख़िला इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कराया पर पढ़ाई के दौरान ही उनका इंतकाल हो गया। जैसे तैसे शिक्षा पूरी की। इकलौती औलाद होने के नाते मुझे घर को संभालने वापस आना पड़ा। पढ़ाई लिखाई का शौक़ था और गाँवं के ही क़रीब ही महाविद्यालय के पुस्तकालय में नौकरी मिल गयी तो यह शौक़ भी पूरा हो रहा है। मीर तथा ग़ालिब की ग़ज़लें पढ़ पढ़कर हुई तुकबन्दी की शुरुआत ने ग़ाफ़िल बना दिया। अब बतौर ग़ाफ़िल आपके सामने हूँ इस तमन्ना के साथ कि- ग़फ़लत में ही यूँ ज़िन्दगी हंसते और गाते, यारों से गप लड़ाते गुज़र जाय तो अच्छा।

1,990 followers
About
चन्द्र भूषण मिश्र's posts

Post has attachment
इस तरह अपने मुक़द्दर एक जैसे हो गए
हाले कमतर हाले बरतर एक जैसे हो गए दरमियाँ तूफ़ान सब घर एक जैसे हो गए हमको मिल पाईं न ख़ुशियाँ उनको मिल पाए न ग़म इस तरह अपने मुक़द्दर एक जैसे हो गए एक पूरब एक पच्छिम दिख रहा था जंग में और जब आए वो घर पर एक जैसे हो गए राह के क्या मील के क्या आपके तो राज में किस ...

Post has attachment
चीख उठती है कुछ मकानों से
आपको हो यक़ीन या के न हो गो सुना मैंने अपने कानों से हाँ ये सच है के आधी रात के बाद चीख उठती है कुछ मकानों से -‘ग़ाफ़िल’

Post has attachment
सोचता हूँ के अगर जाऊँगा तो क्या लेकर
होते फिर शे’र मेरे क़ाफ़िया क्या क्या लेकर बात बन जाती लुगत का जो सहारा लेकर लिख दिया मैंने अभी एक अजूबा सी हज़ल कह दो तो पढ़ दूँ यहाँ नाम ख़ुदा का लेकर एक क़त्आ- वैसे तो जी में मेरे आप अब आने से रहे और मालूम है आएँगे भी तो क्या लेकर फिर भी आ जाइए है रात गुज़रने व...

Post has attachment
ज़रा अब देख तो ले है बचा क्या
तुझे चाहा, है हिज़्र इसकी सज़ा क्या बता मेरी ख़ता है और क्या क्या दहकती आग सी आँखों में तेरी कोई अब भी तो डूबा है, जला क्या ज़माना हो गया आतिश उगलते ज़रा अब देख तो ले है बचा क्या शरारा जो छुपाया था तू जी में सवाल अब है के शोला बन उठा क्या मेरे ख़त का था गो मज़्मून...

Post has attachment
शिक़्वा नहीं हमें है ज़रा भी गुलाब से
क्या बुझ सकी है प्यास किसी की शराब से पाएगा कोई फ़ैज़ भी क्या मह्वेख़्वाब से चुग़ली सी कर रहा है हमारे रक़ीब की इक झाँकता गुलाब तुम्हारी किताब से है रंज़ बस यही के हमारा नहीं है यह शिक़्वा नहीं हमें है ज़रा भी गुलाब से हर सू से ख़ुद ही आती है वर्ना हमारा क्या है राब...

Post has attachment
पाँव को मैं पाँव सर को सर लिखूँगा
और कितना चश्म को ख़ंजर लिखूँगा अब न यूँ कुछ रातभर दिनभर लिखूँगा मानता हूँ मैं मुसन्निफ़ हूँ नहीं पर जब लिखूँगा और से बेहतर लिखूँगा बोझ गो सारे बदन का ढो रहा है पाँव को पर सर भला क्यूँकर लिखूँगा सच बयानी रास आए या न आए पाँव को मैं पाँव सर को सर लिखूँगा क़ैदे-ज़ु...

Post has attachment
सच्ची रह पकड़ा सकता है
दिल जो शख़्स गंवा सकता है जी उस पर ही आ सकता है बेपरवा सा हुस्न इश्क़ को बेमतलब तड़पा सकता है देख के तेरे लब पे तबस्सुम मेरा ग़ुस्सा जा सकता है इंसाँ बस मजनू हो जाए कंकड़ पत्थर खा सकता है तेरी पेशानी का पसीना मेरा हसब बता सकता है इल्म हुआ है किसे इश्क़ में क्या ख...

Post has attachment
आईना रंग क्यूँ बदलता है
मान लेना न यह के पक्का है आदमी आदमी का रिश्ता है यूँ तो लाखों गिले हैं ज़ेरे जिगर कौन तेरा है कौन मेरा है इश्क़ की क्या नहीं है ये तौहीन दिल सुलगता है और तड़पता है पुख़्ता हूँ ख़ूब ज़िस्मो जान से मैं हादिसों से जो मेरा नाता है न डरेगा भी तो डराएगी कुछ इसी ही सिफ़त...

Post has attachment
बोलिए क्या शे’र मेरा भी हुआ
रूबरू होने पे क्यूँ ऐसा लगा है मिजाज़े आईना बिगड़ा हुआ आईना करता नहीं गोया गिला सामने उसके मगर अच्छे से आ टूटने का दौर है मौला ये क्या लग रहा जो हर बशर टूटा हुआ था नहीं इसका गुमाँ मुझको ज़रा मेरा ही दिल एक दिन देगा दगा चल रहा जो वस्ल का यह सिलसिला एक दिन होना ...

Post has attachment
तेरी जो लत है जी चुराने की
बेबज़ा को बज़ा बताने की कोशिशें हो रहीं ज़माने की ज़िन्दगी की फ़क़त है दो उलझन एक खोने की एक पाने की पहले आ शब गुज़ार लें मिलकर बात सोचेंगे फिर बहाने की मेरा भी जी चुराया होगा तू तेरी जो लत है जी चुराने की एक क़त्आ- ख़ुश्बू-ओ-गुल हैं पहरेदार जहाँ राह कोई न जाके आने ...
Wait while more posts are being loaded