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Kumar Swasti Priye 'Warsi'
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Kumar Swasti Priye 'Warsi' can be defined as 'A Common Man' exploring the knowledge scattered and sprayed everywhere and leading his simple life without affecting Himself from the differential thoughts of any society. He can be explained as a Modern Mystic trying to delve deep in the ocean of Knowledge. In addition, he can be seen as a Journalist as well as a Social Worker serving the common people in the field of Education
Kumar Swasti Priye 'Warsi' can be defined as 'A Common Man' exploring the knowledge scattered and sprayed everywhere and leading his simple life without affecting Himself from the differential thoughts of any society. He can be explained as a Modern Mystic trying to delve deep in the ocean of Knowledge. In addition, he can be seen as a Journalist as well as a Social Worker serving the common people in the field of Education

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हर वक़्त मौजू हैं मुनव्वर साहब के ये शेर:
मोहब्बत करने वालों ये में झगडा दाल देती है,
सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा दाल देती है.
तवायफ की तरह अपनी गलत्कारी की चेहरे पर,
हुकुमत मंदिर और मस्जिद का पर्दा दाल देती है.
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आम आदमी आम सोच रखता है. हिन्दू और मुसलमान होने का एहसास सियासी लोग करवाते हैं वो भी महज सत्ता पाने के लिए. लेकिन वो कभी ये नहीं सोचते हैं कि आने वाले समय में आम आदमी इन सियासी दांव-पेंच में फंस कर कितना भुगतान करेगा और क्या-क्या भुगतान करेगा. हाल में हुए मुज़फ्फरनगर के दंगे की ही बात नहीं, इससे पहले भी मंदिर-मस्जिद को ले कर कई विवाद हुए हैं. जब तक आम आदमी सही मायनों में शिक्षित नहीं होगा, उसे मजहब का सही अर्थ पता नहीं चलेगा और दंगों का ये दौर चलता ही रहेगा. सियासी लोग इसका फायदा उठाते ही रहेंगे.
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हर वक़्त मौजू हैं मुनव्वर साहब के ये शेर:
मोहब्बत करने वालों ये में झगडा दाल देती है,
सियासत दोस्ती की जड़ में मट्ठा दाल देती है.
तवायफ की तरह अपनी गलत्कारी की चेहरे पर,
हुकुमत मंदिर और मस्जिद का पर्दा दाल देती है.
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केजरीवाल के लिए मुनव्वर साहब का ये मौजू है:
मुनासिब है कि पहले तुम भी आदमखोर बन जाओ,
कहीं संसद में खाने कोई चावल-दाल जाता है.
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भावुकता या आवेश में आकर वादे करना या व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन करने का ख्वाब देखना कहाँ तक सही है! यदि अरविन्द केजरीवाल बिहार की व्यवस्था के मॉडल को अपनाते हुए विधायक-फंड ख़त्म करना चाह रहे हैं तो वहां नीतीश कुमार की कार्यशैली पूरी तरह व्यवस्था के अनुकूल है. सूत्रों के अनुसार, लालू राज में राज्य सरकार की किसी भी योजना से जुडा कोई भी काम लेने के लिए योजना राशि २० प्रतिशत कमीशन के रूप में देना पड़ता था, लेकिन नीतीश राज में ये राशि बढ़ कर ३० प्रतिशत हो गयी है. हमारे इस महान देश के नेता विकास से जुडी नीतियां बनाने में कितने सामर्थ्यवान है ये सारा देश जानता है . सारी नीतियां अफसरों की दूरदर्शिता पर आधारित होती हैं. बिहार में उनका ख्याल रखने का नीतीश ने पहले सारी व्यवस्था की और फिर विधायक निधि ख़त्म करने बिल विधानसभा में वैधानिक सम्मति के साथ पारित हुआ. केजरीवाल के सामने १५ साल से चली आ रही शीला सरकार के बनाये हुए नियमों को बदलना सबसे बड़ी समस्या साबित होगी. भारत के इस लोकतान्त्रिक मॉडल में केजरीवाल ज्यादा समय चलते नहीं दिखाई दे पाते हैं....
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यदि नरेंद्र मोदी खुद को हिन्दू राष्ट्रवादी कहते हैं तो इसमें क्या गुनाह हो गया. "हिन्दू राष्ट्रवादी" का अर्थ समझिये...हिन्दुस्तान का हिन्दू और राष्ट्र प्रेमी राष्ट्रवादी. इस तमगे का कोई भी हिन्दुस्तानी प्रयोग कर सकता है. केजरीवाल जैसे आम आदमी होने का एक ख़ास आदमी दंभ भरते दीखते है. आम आदमी 'कमिश्नर' नहीं होता, उसकी बीवी आई.आर.एस. अफसर नहीं होता. कौशाम्बी जैसे महंगे सोसाईटी में उसका घर नहीं होता. आम आदमी की तो परिभाषा ही बदल गयी है. यदि ऐसा ही होता है आम आदमी, तो अब हर कोई आम बन कर जीना पसंद करेगा! 
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धर्म/मजहब पर कुछ भी लिखना आग में हाथ डालने के बराबर है. यदि सब लोग धर्म/मजहब को समझ लेते तो उनका नाम शिक्षितों में शुमार होता. कोई झगडा/फसाद होता ही नहीं और कोई संघ/जमात बना कर किसी भी धर्म का स्वघोषित ठेकेदार नहीं होता. इस बात पर तो हंसी आती है कि कौन सा दूसरा खुदा/भगवान् पैदा हो गया जिसने इन जमात/संगठन वालों को धर्म/मजहब के रक्षा की ज़िम्मेदारी दे दी! :)
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             ====:)=====:) ======:)====
कितने माहो-साल हो गए हम भी पायमाल हो गए,
अब वो मिलने रोज़ आती है जब सफ़ेद बाल हो गए.
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