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Ruchi Shrivastava
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बंद आँखों के तसव्वुर का नज़ारा कुछ और।
आँख खुलते हि नज़र आया तमाशा कुछ और।

आज इन्सां को समझ पाना तो मुश्किल है बहुत।
पीठ पीछे वो अलग मुंह पे वो होता कुछ और।

जो भि सोचा थ वो बाजार से मै ला न सका।
ले के आया हूँ हमेशा हि निराशा कुछ और।

इश्क का गहरा हे दरिया न नपेगा तुमसे।
जितना समझा हे ये उससे भि हे गहरा कुछ और।

पास उनके है हुनर रंज छुपा लेते हैं।
लाख ग़मगीन हों लोगों को हे दिखता कुछ और

मेरि चाहत का ये आदर्श नतीजा निकला।
भूलना चाहा जिसे याद वो आया कुछ और।

.........आदर्श बाराबंकवी......
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