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Vir Vinod Chhabra
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सर्वगुण संपन्न पत्नी
-वीर विनोद छाबड़ा हमारे एक मित्र बता रहे थे - आजकल मैं बड़े आराम में है। सर्वगुण संपन्न पत्नी जो
मिलने वाली है। उन्होंने बताया कि उनकी होने वाली पत्नी ट्रिपल एम.ए. है - हिंदी , इंग्लिश और इकोनॉमिक्स
में। चौथी बार भी करेगी। अभी हिस्ट्री में एडमिशन लिया है। इसे...

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भूतनी के छाबड़ा जी....
- वीर विनोद छाबड़ा ज्ञानी-ध्यानी कह गए हैं पाप से घृणा करो पापी से नहीं। लेकिन इसके बावजूद कुछ लोग कभी दुरुस्त नहीं होते। क्यूंकि उनका
स्वाभाव ही डंक मारना होता है। कोई नौ दस साल पहले की बात है। तब हम इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड की
सेवा में हुआ करते थे। चेयरमैन साब ...

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उन्होंने पत्र को ही लेख बना दिया
- वीर विनोद छाबड़ा पत्र लेखन से संबंधित मुझे एक किस्सा याद आ रहा है । बात १९८८ की है। क्रिकेट के ' डॉन ' सर डॉन ब्रैडमैन २७ अगस्त को ८८ साल के होने जा रहे थे। मैं डॉन का ज़बरदस्त फैन
था। उन पर कई लेख लिख चुका था। लेकिन इस बार इस कुछ अलग हट लिखना चाहता था। मैं...

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राजेश खन्ना उस दौर में वाकई टॉप पर थे
- वीर विनोद छाबड़ा Rajesh Khanna with Sharmila in Amar Prem राजेश खन्ना अपने दौर
में वाकई सुपरस्टार थे। वो उस दौर को परदे बाहर भी पूरी शान-ओ-शौकत के साथ जी रहे थे।
दो राय नहीं कि वो बेहतरीन कलाकार थे। तब तक आखिरी खत , राज़ , आराधना , कटी पतंग , अमर प्रेम , आन...

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बाप बाप होता है और.…
-वीर विनोद छाबड़ा Govinda & Amitabh in Bade Miyan, Chote Miyan कभी अतीत की कोई पोस्ट इसलिये अच्छी लगती है क्योंकि उसमें कोई
अतीत का बंदा आकर अतीत की याद दिलाता है। ऐसी ही एक अतीत की पोस्ट।  करीब ढाई साल पहले की बात है। रात डेढ़ बजे का समय। आंखों से
नींद गायब ...

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अब कहां जायें हम?
- वीर विनोद छाबड़ा हम लखनऊ के चारबाग़
रेलवे स्टेशन के सामने रेलवे की तिमंज़ली मल्टी स्टोरी बिल्डिंग में २१ साल रहे। पचास
कदम पर पूर्वोत्तर रेलवे का लखनऊ जंक्शन। दो सौ मीटर की दूरी पर चारबाग़ राजकीय बस अड्डा।
सामने मेन रोड थी। आलमबाग से हज़रतगंज जाने वाला सारा ट्...

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वो यम नहीं बरेठा था
-वीर विनोद छाबड़ा  मेरे साथ छोटी-मोटी दुर्घटनायें और टूट-फूट लगी रहती हैं। दो साल इन्हीं दिनों
की बात है। आसमान पर घने बादल थे। मैं घर लौट रहा था। इंद्र देवता से मना रहा था , दस मिनट रुक जाओ। तब
तक मैं घर पहुंच जाऊंगा। फिर जी भर कर बरसना। लेकिन उन्होंने मेरी...

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आत्मा नहीं है ऑनलाइन में
-वीर विनोद छाबड़ा हमने वो ज़माना देखा
है जब हर जगह लंबी कतार थी। राशन की दुकान , मिट्टी का तेल , बैंक , पोस्ट ऑफिस , बिजली , पानी , सीवर , हाउस टैक्स , रेल-बस का टिकट और सिनेमा का टिकट , हर जगह मारा-मारी थी।
गरीबों की कतार अलग और सिफाऱिशियों की अलग। दबंग लोग ...

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मेफेयर के गलियारों में सिगरेट का अलग ही मज़ा था
-वीर विनोद छाबड़ा  सिगरेट पीने की भी कई कलाएं होती हैं। देश , काल और माहौल के अनुसार
स्टाइल बदलती है। अब हाफ रेट के सिनेमाहाल में तो चाहे मुट्ठी में सिगरेट दबा कर पियें या छल्ले
निकालें। न कोई रोके और न कोई इमेज बने। वहां तो पिक्चर चलते सिगरेट पियो। इधर हीरो...

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ऊपर वाला बहुत समझदार है
- वीर विनोद छाबड़ा उस दिन शाम की ही बात है। हमें ख़्याल आया कि हमारे जूते घिस चुके हैं। हम भूतनाथ
मार्किट के लिए निकले। मेमसाब ने भी पांच सौ का नोट पकड़ा दिया। कुछ अचार और ढोकला ले आना। हमने कहा कि पैसे हैं , लेता आऊंगा। मेमसाब ने जोर दिया , रख लो नहीं तो बाद ...
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