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Sunita Shanoo
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ख्वाब एक माँ का...
 बढे जा रही हैं उम्र और  मेरी उम्र के साथ-साथ बढ रहे हो  तुम भी और तुम्हारे साथ जी रही हैं  मेरी उम्मीदें, मेरे ख्वाब मै एक अलग ढँग की माँ हूँ शायद अपनी माँ से भी अलग मैने तुम्हें भी पा लिया था  बचपन के अनछुये ख्वाबों में वो ख्वाब  जो शायद कम ही देखे जाते ह...

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हरिद्वार ऋषिकेश यात्रा एक एड्वेंचर...
सबसे पहली बात तो यही आश्चर्य करती है कि हरिद्वार, ऋषिकेश जैसे तीर्थ स्थल पर एडवेंचर्स जैसा क्या होगा, जब भी किसी से पूछा था कि तुम चलोगे बस एक ही जवाब मिला, हमारी उम्र नहीं है जी हरिद्वार जाने की, या हमें तो मरने के बाद हमारे बच्चे ले जायेंगे और गंगा में बह...

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इंतज़ार
इंतज़ार तेरे पास आने का इंतज़ार तुझे देख भर लेने का इंतज़ार तुम्हे गले से लगा लेने का इंतज़ार तुम्हारा माथा चूम कर हौले से हाथ दबाने का इंतज़ार यह कहने का कि मै हूँ तुम्हारे लिये इंतज़ार तुझसे मिलने का मिलकर शिकायत करने का कि तुम अब तक अकेले कैसे रहे शिकायत...
इंतज़ार
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सैंड टू ऑल
सैंड टू ऑल की गई  तुम्हारी तमाम कविताओं में  ढूँढती हूँ वो चंद पंक्तियाँ  जो नितान्त व्यक्तिगत होंगी जो लिखी गई होंगी  किसी ख़ास मक़सद से किन्हीं ख़ास पलों में सिर्फ मेरे लिये नहीं होगा उन पर  किसी और की वाह वाही का ठप्पा भी लेकिन सैंड टू ऑल की गई सारी कवित...
सैंड टू ऑल
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साहित्य अमृत में प्रकशित-- पर उपदेश कुशल बहुतेरे
साहित्य अमृत के नये अंक में पढिये मेरा एक व्यंग्य... पर उपदेश कुशल बहुतेरे,  नसीहतबाज़ कहें या पर-उपदेशक इन्हें कोई फ़र्क नहीं पड़ता, आजकल ये सारे के सारे उपदेशानन्द व्हाट्स एप्प और फ़ेसबुक बाबा के घर बैठे नजर आते हैं, सुबह जैसे ही मोबाइल ओपन किया तपाक से एक नस...

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अतुल्य भारत अभियान का स्वप्न
पहरेदारी मुल्क की सौंप हमारे हाथ .. सारा भारत चैन से सोये सारी रात . भारतीय सेना के एक ऑफ़िसर विजेंद्र शर्मा की यह पंक्तियाँ बरबस ही याद आ रही हैं, आप भी सोचिये इस विषय में। हमारे बुजूर्ग कहा करते थे, "पर उपदेश कुशल बहुतेरे" यानि जिनकी कथनी और करनी में फ़र्क ...

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प्रेम की पराकाष्ठा
मेरी नर्म हथेली पर  अपने गर्म होंठों के अहसास छोड़ता  चल पड़ता है वो और मै अन्यमनस्क सी देखती हूँ अपनी हथेली काश वक्त रूक जाये, बस जरा सा ठहर जाये लेकिन तुम्हारे साथ चलते  घड़ी की सुईयां भी दौड़ती सी लगती है  धीरे से मेरा हाथ मेरी गोद में रखकर, हौले से पीठ ...

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खत
खत बहुत दिन हुए नहीं लिख पाई लिखती तो तुम भी जान पाते वो हजारों अनकही बातें जो रात दिन बुनती हैं ख्वाब ख्वाब जिसमें होते हो तुम और तुम्हारा खयाल जब हम मिले थे पिछली दफ़ा मेरे खयालों की पोटली सिमट गई थी चुपचाप खामोशी के साथ लेकिन मै मै नहीं रह पाई थी खामोश बत...

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तुम से "मै"
दिन बहुत हुये... दिन नहीं साल हुये हैं हाँ सालों की ही बातें है जाने कितनी मुलाक़ातें है गिन सकते हैं हम उँगलियों पर लेकिन दिन...महिने...साल... गिन लेने के बाद भी गिनकर बता सकोगे! बाल से भी बारीक उन लम्हों को  जो बिताये है तुम्हारे साथ  और साथ बिताने के इंत...

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हाँ मै व्रत रखती हूँ...
जब बहुत छोटी थी तब माँ को देखा करती थी करवाचौथ का व्रत करते हुयें. माँ सजधज कर जब बहुत सारे पकवान बनाया करती थी, हम बच्चे आश्चर्य करते थे कि माँ ने पानी तक नहीं पिया है कहीं गिर न जाये, पिता माँ का पूरा ख्याल रखते थे, यहाँ तक की आटा लगाना सब्जी काटना जैसे क...
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