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Divya Agrawal
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शुभ संध्या....
रह गुज़र है ये उसकी यहीं मंज़िल भी है
फिर भी गुजरी हैं सदियां उन्हें न आए हुए।

नब्ज थमने लगी है 'जानिब' धुआं सांसे है
फकीरी ज़िंदा है मगर उन पे सब लुटाए हुए ।

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शुभ संध्या....
रह गुज़र है ये उसकी यहीं मंज़िल भी है
फिर भी गुजरी हैं सदियां उन्हें न आए हुए।

नब्ज थमने लगी है 'जानिब' धुआं सांसे है
फकीरी ज़िंदा है मगर उन पे सब लुटाए हुए ।

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दुआ.....अमित जैन "मौलिक"
अब न कोई दवा असर देगी
चंद सांसें है बस दुआ देना ।।

शोर ज्यादा है तेरी गलियों का
आएंगे इक दिन पता देना ।।

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दुआ.....अमित जैन "मौलिक"
अब न कोई दवा असर देगी
चंद सांसें है बस दुआ देना ।।

शोर ज्यादा है तेरी गलियों का
आएंगे इक दिन पता देना ।।

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शुभ प्रभात....
अब न कोई दवा असर देगी
चंद सांसें है बस दुआ देना ।।

शोर ज्यादा है तेरी गलियों का
आएंगे इक दिन पता देना ।।

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शुभ प्रभात....
अब न कोई दवा असर देगी
चंद सांसें है बस दुआ देना ।।

शोर ज्यादा है तेरी गलियों का
आएंगे इक दिन पता देना ।।

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शुभ प्रभात....
पाँव वहशत में कहीं रुकते हैं दीवानों के
तोड़ डालेंगे ये ज़ंजीर जो पहनाई भी

ऐ मिरे देखने वाले तिरी सूरत पे निसार
काश होती तेरी तस्वीर में गोयाई भी

ऐ 'क़मर' वो न हुई देखिए तक़दीर की बात
चाँदनी रात जो क़िस्मत से कभी आई भी

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शुभ प्रभात....
पाँव वहशत में कहीं रुकते हैं दीवानों के
तोड़ डालेंगे ये ज़ंजीर जो पहनाई भी

ऐ मिरे देखने वाले तिरी सूरत पे निसार
काश होती तेरी तस्वीर में गोयाई भी

ऐ 'क़मर' वो न हुई देखिए तक़दीर की बात
चाँदनी रात जो क़िस्मत से कभी आई भी

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पत्तों के श्यामता के द्वीप
डुबोते हुए हुस्न-हिना के
गंध-ज्वार-सी हरित-श्वेत जो उदय हुई है
वह तू ऊषा, मेरी आंखों पर तेरा स्वागत है

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पत्तों के श्यामता के द्वीप
डुबोते हुए हुस्न-हिना के
गंध-ज्वार-सी हरित-श्वेत जो उदय हुई है
वह तू ऊषा, मेरी आंखों पर तेरा स्वागत है
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