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abhishek shukla
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ख़ुद की तलाश में ही भटके हैं दर-बदर
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कबूतर के घोंसले से गिरे हुए अंडे को कोई अगर वापस घोंसले में डाल दे तो अंडे में से बच्चे नहीं निकलते।

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क्योंकि कविताओं का पुनर्जन्म नहीं होता
पहाड़ जैसे मन से बहने वाली कविताएं, व्याकरण और छंदों की खाइयों में उलझकर प्रायः मृतप्राय हो जाती हैं। उनमें प्राण डालने की कितनी भी कोशिश क्यों न की जाए, जीवन का संचार नहीं दिख सकता। टूटे हाथ-पैरों की मरम्मत हो जाती है, वैद्य उन्हें जोड़ने में सक्षम हैं लेकिन...
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abhishek shukla commented on a post on Blogger.
बेहद खूबसूरत रचना. बहुत पसंद आई.
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