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Keshav Kahin
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कहि न जात का कहिये... क्या कहें और क्यों कहे? सोच कर सुहाती हुई कहें या बिन सोचे कह दें जो कुछ भी सच है? तमाम बातें कह देने के बाद भी कुछ न कुछ अनकहा तो रह ही जाता है.
कहि न जात का कहिये... क्या कहें और क्यों कहे? सोच कर सुहाती हुई कहें या बिन सोचे कह दें जो कुछ भी सच है? तमाम बातें कह देने के बाद भी कुछ न कुछ अनकहा तो रह ही जाता है.

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...  उन्हीं में से एक ने पूछने पर अपना नाम बताया- गऊरी.   मैने कहा- बस गौरी?  तो वह बोला-  नाहीं, अगहूं है- गऊरी संकर. मै कुछ उतावलेपन से बोला- देखो, तुम्हें अपना पूरा नाम बताना है. गौरी शंकर के आगे भी कुछ है कि नहीं?  वह बहुत संयत होकर बोला- मोरज.  मैने उसका नाम लिख लिया- गौरी शंकर मौर्य. उसके माता-पिता एवं पुश्तैनी निवास के बारे मे जानकारी चाही तो  उसने कहा- जिल्ला त है सोल्तापुर, महतारी का नाम सुमिनतरा और बाप का नाम भभीखन मोर्ज.  फिर उसने अपने वर्तमान पता के विषय मे कहा- अबहीं तौ कवनो नाहीं है, हम सीधे ‘इसपि टेलन घर’ से भिनसारी वाली मोटर पकरि के आई रहे हैं.  बाद मे समझ मे आया कि ‘ईस्ट पटेल नगर’ बताना चाहता था. जब उसकी शिक्षा के विषय मे पूछा कि कितना पढ़े हो, तो कुछ देर सोचा फिर बोला- दुई पन्ना!  मै ऐसी किसी पढ़ाई की बात सुन कर चकित हो गया और उकता कर बोला- मै स्कूल की पढ़ाई की बात पूछ रहा हूं.  उसने अपना आत्म-विश्वास खोए बिना उत्तर दिया-  हमहूं हनुमान-चलीसा का बात करि रहे. का बतावैं, एकै पन्ना पढ़े माँ ससुरा दूई घन्टा लागि जात है. एक दिन संझा को फुरसत मिली रही तो फुलवारी मे  बईठि के बहुत जोर मारे रहे सो दुई पन्ना पढ़ि डारे. सो हम दूईये पन्ना पढ़े हैं.  मैंने संतोष की सांस ली कि आगे कुछ  और जानकारी नहीं चाहिए थी, अन्यथा मेरी हिम्मत साथ नहीं देती....

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कविता और अपराध-बोध 

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अपराध-बोध
खुलासा
कर देना आवश्यक   है कि और सज्जन होते होंगे ,  किन्तु
मै जन्मजात कवि नहीं था .    बल्कि उल्टे मुझे कविता से डर लगता था (उस कविता से नहीं ,  जिसका
 जिक्र आगे है) .   कविता के रूप में मैने जो पहला गाना
ध्यान से सुना था ,  वह
था-  “ मै जट यमला पगला दीवान...

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... घर आकर मैं सोच में पड़ गया, जब मैडम को मालूम था कि मैं ‘नॉटी’ हूँ, तो फिर मुझे ‘वो’ क्यों कहा?  रात को बिस्तर पर नींद नहीं आ रही थी, उठ कर मैने पिताजी से पूछ ही लिया- “बापू, तुम मुझे ‘वो’ के बारे में बता दो तो नींद आ जाए.”  सुनते ही बिस्तर पर लेटे पिताजी उछल कर खड़े हुए और बोले- “लट्टू का बच्चा, अभी तोहका बताय दिहित हैं कि..." और तमतमाते हुए जैसे ही उन्होंने चाँटा मारने के लिए हाथ ऊपर किया, मैं भाग कर माँ के पास चला गया. पिताजी बड़बड़ाए जा रहे थे- “देखो, ससुरे जमाने को! बित्ता भर का हुआ नाहीं कि ‘ऊ’ का फेर में परि गया....

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मैने पूछा कि क्या अपना नाम लिखना जानते हो?  तब उसने कुछ हिचकिचाते हुए अपनी गरदन ‘हाँ’ कहने की मुद्रा मे हिलाई और पेन को दाहिने हाथ मे कस कर पकड़ लिया.  अपना नाम लिखने की कोशिश मे उसने बहुत मुश्किल से ‘गौरी’ लिखा तो सही, लेकिन ‘र’ मे ई की मात्रा बनाते हुए इतनी जोर से पेन को दबाया कि कागज फट गया और बॉल पेन का प्वाईन्ट टूट कर फर्श पर लुढ़कता हुआ कहीं गुम हो गया. यह किस्सा नहीं होता तो मुझे बात याद भी नहीं रहती...

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मेरी आखों के सामने लगभग पन्द्रह वर्ष पुराना दृश्य उभर आया और मैं उछल पड़ा-
“अरे सुरेश! ... तुम सुरेश ही हो न?” थोड़ी  देर की चुप्पी के बाद सिर को झटका कर, पान के पीक की पिचकारी मार कर वह बोला- “नहीं, मैं छुरेछ नहीं हूँ.”
मैने उसकी ओर देखा तो लगा कि वह अपने दिमाग पर जोर डालने की कोशिश में लगा था. मैं उसकी मदद करते हुए बोला- “अरे भाई मैं चन्दर हूं, चन्दर! पहचाना नहीं?  तुम मुझे पन्द्रह साल बाद मिले हो तो क्या हुआ, मैंने तुम्हारे हाथ पर बने निशान  को देखते ही पहचान लिया.  भला मैं कैसे भूल सकता हूं-  तुम एक दिन जंगल में अकेले चले गए थे और तुम्हें किसी लकड़-बग्घे ने हाथ में काट लिया था...

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बिब्बो ने गरदन हिलाई- आँखों में उतर आए आंसू गालों पर ढलकने को तैयार थे-  “सभी बैठ कर खुसर-पुसर कर रहे हैं.  तभी तो मुझे बाहर आने का मौक़ा मिला. खैर तेरा क्या, तू यहीं रह जायेगी.  मेरी कोई भूल-चूक को दिल से न लगाए रखना. उस दिन मैंने तुझे थप्पड़ मार दिया था...”
   “गलती तो मेरी ही थी, मै खामखा तेरी नाक के पीछे...” ख़ाला ने अपनी सहेली का दिल हल्का करने की कोशिश की...

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“अरे सुरेश! ... तुम सुरेश ही हो न?” थोड़ी  देर की चुप्पी के बाद सिर को झटका कर, पान के पीक की पिचकारी मार कर वह बोला- “नहीं, मैं छुरेछ नहीं हूँ.”
मैने उसकी ओर देखा तो लगा कि वह अपने दिमाग पर जोर डालने की कोशिश में लगा था. मैं उसकी मदद करते हुए बोला- “अरे भाई मैं चन्दर हूं, चन्दर! पहचाना नहीं?  तुम मुझे पन्द्रह साल बाद मिले हो तो क्या हुआ, मैंने तुम्हारे हाथ पर बने निशान  को देखते ही पहचान लिया...
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