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Sumer Singh Rathore
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बोरङियों के बोरों सा खट्टा, टूळों के केरों सा तीखा, जाळों के पीलूओं सा मीट्ठा, खेजङियों की सांगरियों सा स्वादिष्ट बनने की चाहत पाले सुमेरा।
बोरङियों के बोरों सा खट्टा, टूळों के केरों सा तीखा, जाळों के पीलूओं सा मीट्ठा, खेजङियों की सांगरियों सा स्वादिष्ट बनने की चाहत पाले सुमेरा।

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तब भी मार्च आता था। अखबारों पर जार्ज बुश की बड़ी-बड़ी तस्वीरों के साथ इराक का नाम छपा रहता था। बच्चे रविवार को या तो किताबों में घुसे रहते या खंडहरों में नाक पर हाथ रखे चमगादड़ों को ढूंढ़ते थे। वह चुपचाप इंतज़ार करता था बारह बज जाने का। वह टीवी को झांकता रहता था। गाँव में कुछ ही घरों में टीवी थी। पर रविवार को टीवी देखने वाला सिर्फ वो होता था।
उन दिनों वह नई-नई दुल्हन बन कर आई थी। सब औरतें दोपहरों में ऊंघ रही होती या कहीं चौकियों पर मखौल कर रही होती। वह जब भी कमरे में आती मुस्करा देती और आलों में से कुछ ढूंढ़कर चली जाती। उस दोपहर जाने कौनसी फिल्म आ रही थी। तेज हवा से एंटीना घूम गया था।
‘आप टीवी देखते रहिए मैं एंटीना ठीक करता हूं, सही से आ जाये तो खिड़की से बता देना।’
‘ठीक है। पीछे के तरफ जो पत्थर रखे हैं उन्हें एंटीना से लगा देना फिर वो हवा से हिलेगा नहीं।’
सेट करके वह वापिस से चारपाई पर आकर बैठ गया। वो कुछ सी रही थीं और वहीं बैठकर टीवी देखने लगीं। जाने क्या बातें कर रही थीं। उन दिनों पत्रिका के साथ रविवारिय अंक आता था जिसमें कहानियां होती थीं। एड आई तो वह उस पन्ने को टटोलने लगा। उन्होंने बालों में हाथ फेर कर कहा ‘तुम इतने चुप क्यों रहते हो।’ उसने देखा और हंसने लगा। ‘मुझे पढ़ना नहीं आता, ये इसमें क्या लिखा है। वह कहानी सुनाने लगा। उन्होंने खिड़की बंद करते हुए कहा ‘कितनी धूल आती है’।
‘देखो तो मेरी पीठ पर क्या चुभ रहा है’।
‘कुछ भी नहीं है’
‘वहां डोरी के नीचे देखो’
उसने डोरी के नीचे उंघली फिराई। उसे स्कूल के शैतान बच्चे याद आ गए जो मई तक का महीना गिनते हुए उंगली कर देते थे। डोरी में पतली सी भुरट की सिळी लगी थी। निकालते हुए उसके मुँह से जाने क्यों जनवरी, फरवरी निकलने लगा। मई पर आते-आते उन्होंने छात्ती में भींच लिया। ढीली सी टीशर्ट खिसक कर उसकी बाहों में झूल गई। उसने दांत छाती के नीचे गड़ा दिये।
‘कितने भोले बच्चे बनकर रहते हो। क्या कर रहे हो ये।’
उसने ओढ़ण खींचकर चेहरा छुपा लिया।
हवा खिड़कियों के सुराखों से टकराकर आलों में बिछे अखबारों को बिखेर रही थी। उसने टीशर्ट ठीक किया और भाग गया। गायों की रखवाली का वक्त था ये।
बच्चों की गर्दनों पर मंड गए निशानों पर किसी की नज़र नहीं जाती थी। वह पीलू खाने ऊंची डालों पर लटकता था या चमगादड़ों को पकड़ते हुए खंडहरों में कई बार घिसट जाता था। उस नीले निशान पर किसी ने शक नहीं किया।
अब भी मार्च आने वाला है। अखबार नहीं देखा उसने जाने कितने दिनों से। उसे रोते हुए देखकर किसी ने सलाह दी। ‘तुमने कभी आँखों में आँखें डालकर कहा है’
‘नहीं, डर लगता है मुझे’
वह कोई खास दिन था। उसने सोच लिया था कि वो आज आँखों में देखेगा। वह नहीं देख पाया। नज़र फेरकर आसमान देखते हुए वह बोलता रहा और फिर रोने लगा। पता नहीं कब वह किसी के सामने ऐसे रोया था।
‘मैंने कह दिया’
‘उसने क्या कहा’
‘वही जो हमेशा कहती है।’ रोती सी आवाज़ में उसने कहा ‘ऐसा क्यूं होता है मेरे साथ’
‘तुम रोमांटिक नहीं हो’
वह हंसने लगी। और खामोश ही गई। यह सबकुछ शांत होने का एक छोटा सा पल था।
वह चेहरा देखती रही बोली ‘केन वी किस्स’
‘नो’ उसने कहा ‘वॉव, कंसेट! शुक्रिया। और वो हंसने लगा।
‘इस मोहब्बत ने मुझे कितना ‘पवित्र’ बना दिया है।’
‘तो फिर क्यों नहीं चले जाते हो तुम टूर पर?’ उसने आँख मारते हुए कहा। दोनों हंसने लगे।
और सारी कहानियां उसकी आँखों के आगे फिरने लगी। जैसे किसी ने एंटीना घुमा दिया और साफ सिग्नल आने लगे थे। स्क्रीन पर नीले निशानों से भरी गर्दन और कंधे चमक रहे थे। बचपन में कोई ऐसा हुआ होगा क्या।
वह डरने लगा था लोगों से, रोशनी से।
वह चिलाने लगा खाली कमरे में। ‘मैं कहां जाऊंगा अगर हार गया तो। कोई घर चला जायेगा, कोई शहर चला जायेगा। मैं भी चला जाऊंगा कहीं ना कहीं। कोई तो जगह होगी जहां मैं जा सकूंगा। खो जाऊंगा मैं एक दिन। दूर कहीं, बहुत दूर।’
वह बोलती रही। समझाती रही। उसे सिर्फ इतना सुनाई दिया ‘यह भी एक फेज होता है, उम्र का फेज। निकल जाता है तो कुछ भी याद नहीं रहता’।
वह उठकर चला आया था। यह भी एक फेज है जिसे सिर्फ खाली कमरे समझ सकते हैं।
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उसकी हरकतें बचकाना हैं। क्यों कि आज से उसका पच्चीसवां बरस शुरू हो रहा है। वह हर बार किसी और के साथ होते हुए भी उसी के साथ होता है। वह सोचता था कि साथ होने के सुख से बड़ा कोई सुख हुआ ही नहीं। साथ होने का सुख सच था और साथ होकर भी साथ ना होना छलावा।
दिन भर के इंतज़ार के बाद जब हाथों में हाथ मिलते हैं तो जमीन खिसक जाती पैरों के नीचे से और कौन जी सकता है खिसकी हुई जमीन पर।
ये मौसम ही अजीब था जीवन की ही तरह। कितनी तेज हवा थी कल जैसे सब कुछ उड़ा ले जायेगी। वह सूखे पत्तों को उड़कर इधर-उधर जाते हुए देखता रहा। वह खिले हुए फूलों को झड़ते हुए देखता रहा। वह खुदको राख होते हुए भी देखता रहा।
उसकी आत्मा कहती है कि वह गलत कर रहा है। पर वह करेगा अब। सही गलत से परे खुद की आत्मा को मारकर। सपनों के सारे मालों का ध्वस्त हो जाना बेहतर है साथ होकर भी साथ ना होने से।
सोचना, खूब सोचना। सोचना तड़प को। सोचना इंतज़ार को। सोचना खुद को।
अपने हिस्से का इंतज़ार मैं रातभर के कच्ची नींद से उलझे बुरे सपनों में रंग दूंगा।

वह जानता है कि रिश्ते उगाये नहीं जा सकते। और जाने क्यों फिर भी उसे लगता है कि ‘सब कुछ होना बचा रहेगा’
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‘आज रंग है ऐ मां रंग है री
ऐ री सखी मोरे महबूब के घर रंग है री’
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मैं सोचता हूं कि मना कर दूंगा। कितना मुश्किल होता है, ना कहना। कौन जीने देता है किसी को अपने हिस्से का जीवन। कौन ही समझ पाता है किसी को।
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शाम भर सोचता रहा कि दिनों बाद मैं किसी से आज लम्बी देर तक बात करूंगा। लास्ट बार मैंने किसी से फोन पर कब बात की थी। मुझे याद नहीं। हाँ एक दोस्त को किया था और उसने नहीं उठाया था। एक दोस्त का आया था भागते-दौड़ते याद नहीं जाने क्या बात की थी। और फिर मैं घंटों कॉन्टेक्ट लिस्ट देखता रहा। शाम में कोई बिस्तर से उठा ले गया। मैं उसकी बातें घंटों सुनता रहा। हम सब जीवन में क्या कमाते हैं? मुझे ये आज तक नहीं समझ आया।

वो सोचता है आपके जीवन में कितने बड़े-बड़े लोग हैं ये आपकी सफलता है। मैं शायद कोई दो साल बाद उसके साथ बैठा हूं। एक पैग से ही मेरा मन उकता जाता है, दारू से नहीं उसके साथ से। लड़कियाँ, राजे-महाराजे, नेता ये सब आस-पास होना और उनके जैसा होना उसके लिए कितनी गर्व की बात है। मैं हर बार उसे टाल देता हूं कि किसी तरह वो मुझे घर छोड़ दे। मैं उसकी तरह कभी हो ही नहीं पाऊंगा। छोटी-छोटी बातों पर किसी को भी गाली देना, पीट देना, राह चलते लोगों के साथ बदसलूकियाँ कितनी आसानी से करते जाते हैं ये लोग। शायद दूसरों की तकलीफें उनकी कमाई है। आप अगर समझाते हैं तो बदल गये या पागल हो गए करार दे दिये जाते हैं।

मैं हमेशा सोचता हूं कि संवेदना कमाना और जब सबकुछ खत्म हो रहा हो उस वक्त कोई हो जिससे बात करते हुए सोचना ना पड़े ऐसे किसी का होना ही सबसे बड़ी कमाई है।

अभी फोन रखते हुए फिर से मैंने कॉन्टेक्ट लिस्ट देखी। सोचता हूं कि कितना असहाय हूं मैं।
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पैरों में पर होते तो पेड़-पेड़ फुदककर उन रास्तों पर हो आते। वो रास्ते जीवित से लगते हैं, कई बार मुस्काते दिखे, कितनी बार अंधेरों में उदास रोड लाइटों को तकते दिखे। इन रास्तों ने इस मकानों पर चढ़े मकानों वाले भीड़ भरे शहर में उगते और डूबते सूरज को देखा है। पहाड़ियों पर सपने देखती उनींदी आँखों को डूबता सूरज देखकर हंसते देखा है। अकेलापन ओढ़े ठिठूरते पाँवों को नापते हुए जाने कैसे चुपचाप देखते रहते हैं ये रास्ते।
मैं उड़ जाता बिना पँखों के भी कि काश रास्तों पर फिरते पाँवों ने छोड़ दी होती चुप्पियाँ।
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