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Dr. Nilesh Heda
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इनकी कविताओं में आदिवासियों जैसा भोलापन, नदी, जंगल, खेत, खलिहानों की निर्मलता और नये जमाने का आशावाद है। नये जमाने की होने के बावजूद इनकी आधारशिला शाश्वतता के तत्वों पर टिकी है. छद्म शहरी परिवेश और उपभोक्तावाद पर प्रहार करती निलेश की कवितायें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता के स्वर में प्रार्थना बन जाती हैं।

https://www.amazon.in/Visale-Yar-Hota-Nilesh-Heda/dp/1642496340/ref=sr_1_2?ie=UTF8&qid=1522054564&sr=8-2&keywords=9781642496345
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इनकी कविताओं में आदिवासियों जैसा भोलापन, नदी, जंगल, खेत, खलिहानों की निर्मलता और नये जमाने का आशावाद है। नये जमाने की होने के बावजूद इनकी आधारशिला शाश्वतता के तत्वों पर टिकी है. छद्म शहरी परिवेश और उपभोक्तावाद पर प्रहार करती निलेश की कवितायें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता के स्वर में प्रार्थना बन जाती हैं।

https://www.amazon.in/Visale-Yar-Hota-Nilesh-Heda/dp/1642496340/ref=sr_1_2?ie=UTF8&qid=1522054564&sr=8-2&keywords=9781642496345
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SAMVARDHAN in partnership with UNDP - MOEF&CC have started a process of the 30 farmers, doing sustainable agriculture practices on their own farm. The sustainable agriculture involves complete ban of using chemical fertilizers and pesticides, in situe water conservation and so on. In long run we will be engage in the marketing of the primary produce of these farmers.
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nheda.blogspot.in
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तुम अपनी राष्ट्रवाद की दुकान
हमेशा खुली रखना
इससे ही पकेगी तुमने चढाई हुयी
प्रसाद की हांडी.
मुझे लेकीन थोडी बात करने दो
मिट्टी के रंग पर, 
पानी के बहाव पर
मछली के उछाल पर
नदियों की लचकती कमर पर
झुर्री वाले रहमान मामु पर.
समझना मेरी बात ध्यान से,
इन झुर्रीवाले रहमान मामू की हांडीया
राष्ट्रवाद के नारों पर नही पकती
और नाही इनके सुखे कुओं में पानी आता है.
पर तुम अपने 
नारों को बुलंदी देना
ताकी इन झुर्रीदार चेहरों की
आवाजें आना बंद हो जाये.
किसीकी आवाज को दबाने के लिये
किसी को तो उंचा बोलना ही पडेगा!
निलेश हेडा
१६ मार्च २०१६
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Waterman Rajendra Singh talking with villagers of Bambarda, Karanja, Washim during his visit to "Save River Save Life Movement". 23 May 2015.
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