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Saiju N K
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If every child knows a little about the wisdom from different cultures, the world would be a happier and nicer place.
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                The Most Beneficial Yoga Practice
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A place in the woods
To contemplate existence
And my part in it
Who am I and what am I ?
One day I perhaps will know.
      photo and tanka by kristina Mikkelson Casanova
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गायत्री-माता का मनुष्य शरीर में जब प्रवेश होता है तो वह सद्बुद्धि रूप में होता है। साधक के विचार और स्वभाव में धीरे-धीरे सतोगुण बढता है और उसमें सतोगुणी प्रवृतियों का विकास होता है~
1. सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने गायत्री का चित्रण पंचमुखी और दसभुजी रूप में किया है।
ऊँ
भूर्भुवःस्वः
तत्सवितुर्वरेण्यं
भर्गो देवस्य धीमहि
धियो यो नः प्रचोदयात्
मन्त्र के यही पाँच भाग गायत्री के पाँच मुख हैं। पाँच देव भी इन पाँच मुखों के प्रतीक हैं। पाँच तत्वों से बना हुआ शरीर और पाँच प्राण, पाँच उप- प्राण, पाँच यज्ञ, पाँच अग्नि, पंच-क्लेश आदि अनेक पंचकों का रहस्य, मर्म और तत्व ज्ञान गायत्री के मुख से मुखरित होता है। जैसे पूर्व, पश्चिम आदि 10 दिशाएं होती हैं वैसे ही जीवन विकास की दस दिशाएं हैं। पाँच सांसारिक लाभ (स्वास्थ्य, धन,विद्या, चातुर्य और दूसरों का सहयोग प्राप्त करना) गायत्री की वाँईं पाँच भुजाएं हैं। इसी प्रकार पाँच आत्मिक लाभ (आत्म-ज्ञान, आत्म-दर्शन, आत्म-अनुभव, आत्म-लाभ और आत्म-कल्याण) दाहिनी पाँच भुजाएं हैं।
2. यद्यपि यह गायत्री का भावना चित्र है- अलंकारिक रूप है, जिससे यह प्रकट होता है कि गायत्री में कितने प्रकार के रहस्य छिपे हैं। वास्तव में तो माता शक्ति रूप हैं- उनका कोई रूप नहीं। वह शब्द,रूप आदि पंचभौतिक तत्वों से परे हैं। केवल ध्यान द्वारा उसको अपनी ओर आकर्षित करने के लिए किसी रूप या प्रतिमा की धारणा की जाती है। संसार का ऐसा कोई कष्ट नहीं जो गायत्री माता की कृपा से न कट सके और विश्व की ऐसी कोई वस्तु नहीं जो माता के अनुग्रह से प्राप्त न हो सके।
3. साधक किस प्रयोजन के लिए गायत्री की साधना, ध्यान, जप करना चाहता है - इस बात को दृष्टि में रख कर गायत्री मन्त्र के 24 अक्षरों की दिव्य शक्ति धाराओं को संलग्न चित्रों में अलग-अलग रूपों में दिखाया गया है। माता के किस स्वरूप का किस कार्य के लिए किस प्रकार ध्यान करना चाहिए इन चित्रों से स्पष्ट हो जाता है।
4. जो कार्य योगी बड़ी कष्ट दायक साधनाओं/ तपस्या से बहुत अधिक समय में पूरा कर पाते हैं, वह महान कार्य बड़ी सरल रीति से गायत्री के जप एवं ध्यान मात्र से स्वल्प समय में पूरा हो जाता है।
5. साधक और ईश्वर सत्ता गायत्री माता के बीच में बहुत दूरी है, लम्बा फासला है। इस दूरी को हटाने का मार्ग इन 24 अक्षरों के मन्त्र से होता है। जैसे जमीन पर खड़ा हुआ मनुष्य सीढ़ी की सहायता से ऊँची छत पर पहुँच जाता है वैसे ही गायत्री का उपासक इन 24 अक्षरों की सहायता से क्रमशः एक- एक भूमिका पार करता हुआ, ऊपर चढ़ता है और माता के निकट पहुँच जाता है।
6. शिव को योगेश्वर भी कहते हैं। योग की समस्त शक्तियों और सिद्धियों के उद्गम केन्द्र वे ही हैं। मस्तक पर चन्द्रमा तत्वज्ञान का प्रतिनिधि है। गले में सर्पों का होना-दुष्ट और पतितों को भी गले से लगाने की साधुता का द्योतक है। वृषभ वाहन मजबूती, दृढ़ता, स्थिर चित्त,श्रम शीलता एवं पवित्रता का प्रतीक है। शिव इन्हीं गुणों के समूह हैं। वे संहारक हैं - दोष, दुर्गुण, अनाचार, अविचार और अनुपयुुक्तता का संहार करते हैं। अनावश्यक का निवारण और संहार करने का कार्य ईश्वर के शिव स्वरूप द्वारा होता है।
7. गायत्री के शाम्भवी स्वरूप की साधना से जो गुण शिव के हैं, शाम्भवी के हैं उन्हीं का प्रसाद साधक को भी मिलता है। शिव के तीन नेत्र हैं। तीसरा नेत्र जिसे दिव्य - चक्षु कहते हैं, आत्म तेज से परिपूर्ण होता है। शाम्भवी स्वरूप की साधना करने से साधक/उपासक का यही तीसरा नेत्र खुलता है और उसे दिव्य-दृष्टि प्राप्त होती है।
8. पूर्ण रूप से प्रारब्ध परिवर्तन तो असम्भव है- पर माता की कृपा से इसमें अनेक संशोधन और परिवर्तन हो सकते हैं। भविष्य के लिए उत्तम भाग्य निर्माण हो सकता है। माता की कृपा से कठिन दुख दायी प्रारब्धों में संशोधन हो जाता है। अत्यन्त दुस्तर और असह्य कष्टों की यातना हल्की होकर बड़ी सरल रीति से भुगत जाती हैं।
9. ऐश्वर्य वर्द्धिनी लक्ष्मी की प्राप्ति, महाशत्रुओं से संरक्षण, अदृश्य सहायता प्राप्त करने, पारिवारिक सुःख- शान्ति व सन्तुष्ट दाम्पत्य जीवन, अच्छी सन्तान प्राप्त करने सहित जितने भी अच्छे मनोरथ हों - चित्रों में दिखाए माता के उन स्वरूपों की साधना,ध्यान, जप से उन्हें पूर्ण किया जा सकता है।
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18/05/2015
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