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Ashok Kumar Pandey
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सन्तोष कुमार चतुर्वेदी की कुछ नई कविताएँ
संतोष कुमार चतुर्वेदी इस परम्परा के कवि हैं जहाँ लोक और जन दो अलग अलग श्रेणी नहीं अपितु एकमेक होकर सामने आते हैं. उन्हें पढ़ते हुए क़स्बाई संवेदना का ग्लोबल विस्तार लगातार महसूस होता है और इसीलिए भाषा उनके यहाँ अलग से कुछ करने की कोशिश करने की जगह बहुत स्वाभा...
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निदा नवाज़ की कविताएँ
निदा कश्मीर में रहते हैं. बल्कि यह कहना बेहतर होगा कि दक्षिणी कश्मीर के पुलवामा में रहते हैं ; एक ऐसे इलाक़े में जहाँ लोगों को अब कभी भी गोलियाँ चलने या ग्रेनेड फटने की आदत सी पड़ चुकी है. वह ख़ुद इनका शिक़ार हो चुके हैं लेकिन मनुष्यता के प्रति ज़िम्मेदारी की तर...
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अमित उपमन्यु की ताज़ा कविता
अमित की कविताएँ आप पहले भी असुविधा पर पढ़ चुके हैं. लेकिन यह कविता अपनी भाषा और अपने बनक में पिछली कविताओं से काफी अलग है. बल्कि यों कहूँ कि यह आज में ज़्यादा विन्यस्त है. यह सहज भी है कि जिस तरह की घटनाएँ लगातार समाज में चल रही हैं उसमें एक संवेदनशील युवा उद...
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कुलदीप नैयर को वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी की श्रद्धांजलि
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कुलदीप नैयर - एक क़द का उठ जाना
● ओम थानवी कुलदीप नैयर का जाना पत्रकारिता में सन्नाटे की ख़बर है। छापे की दुनिया में वे सदा मुखर आवाज़ रहे। इमरजेंसी में उन्हें इंदिरा गांधी ने बिना मुक़दमे के ही धर लिया था। श्रीमती गांधी के कार्यालय में अधिकारी रहे बिशन टंडन ने अपनी डायरी में लिखा है उन द...
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लौट जाती है उधर को भी नजर क्‍या कीजे - कुमार अम्बुज
एडिनबर्ग वर्ड राइटर्स कांफ्रेंस , त्रिनिदाद में
मुख्य वक्ता के तौर पर दिए गए ओलिव सीनियर के ने कहा था , “ राजनीति!
व्यग्रता इस पद के संकीर्ण उपयोग से पैदा होती है. हम अक्सर राजनीति को पार्टीगत
राजनीति , चुनावी राजनीति , राजनैतिक
नेतृत्व और इनसे जुड़े विवादो...
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स्टेशन नगरीय गढ़ों के गेट होते हैं और गाँवों के लिए दीवार - शेषनाथ पाण्डेय की दो कविताएँ
शेषनाथ भाई की इन कविताओं को पढ़ना मेरे लिए विस्मयकारी था. उनके कवि रूप से लगभग अपरिचय मेरे अज्ञान का ही द्योतक है लेकिन ऐसे समय में जब कला के नाम पर निरर्थक वाक्यों और अनर्थक बिम्बों को सजाकर पेश किया जा रहा हो और प्रेम योनि-गुदा के मूर्खतापूर्ण समीकरणों में...
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कूपन में स्मृति
Maria Gorgolas  की पेंटिंग यहाँ से साभार  ·          अशोक कुमार पाण्डेय अजीब सी किताब थी वह । 2030 में छपी थी । पूरे सौ साल पुरानी! शीर्षक ही
समझ से बाहर था – स्मृति और प्रेम। उसके नीचे लिखा था- रचना।
यह शायद लिखने वाले का नाम होगा। माँ ने बताया था कि पहले ...
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अरुण श्री की ताज़ा कविताएँ
अरुण युवतर पीढ़ी के मेरे प्रिय कवियों में से हैं. भाषा के भीतर और बाहर उनकी बेचैनी और लोकजीवन में गहरे धँसा भावबोध मुझे एक पाठक के रूप से आश्वस्त ही नहीं करता बल्कि एक पाठक के रूप में आवश्यक ऊर्जा भी देता है. ये कविताएँ काफी पहले उन्होंने मुझे भेजी थीं लेकिन...
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अदनान कफ़ील दरवेश की पुरस्कृत कविता 'क़िबला'
इस वर्ष का प्रतिष्ठित भारत भूषण पुरष्कार युवा कवि अदनान कफ़ील दरवेश को वागर्थ के सितम्बर, 2017 के अंक में प्रकाशित कविता 'क़िबला' के लिए मिला है। अनुशंसा में इस बार के निर्णायक प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल ने लिखा है -  अदनान की यह कविता माँ की दिनचर्या
के आत्मीय ...
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