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Jitendra tayal
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जीवन के अनुभव और मन की भवनाओ को कलमबद्ध करने का एक प्रयास
जीवन के अनुभव और मन की भवनाओ को कलमबद्ध करने का एक प्रयास

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मत समझो हमको इस मिट्टी मे अकेले है                     संस्कारो के इसमे रमते कितने ही मेले
है ये मिट्टी है मथुरा की और काशी की याद रहे इसमे राम कृष्ण भी खेले है ये मिट्टी नही है मिट्टी ये है चन्दन गाता हूं मातृ भूमि के चरणो मे अभिनन्दन गाता हूं  ……………………….१...

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कल सपने मे मुझको घर की मिट्टी दिखी है
कल सपने मे मुझको घर की मिट्टी दिखी है                     फिर   कलम उठाकर मैने इक चिठ्ठी लिखी है बडे - बुजुर्गो के चरणो मे वंदन लिखा है जाने क्यो   बुझा - बुझा   है ये मन लिखा है कौन हूं मै ये मुझको कौन बतायेगा समझ ना आये क्या कहता है दर्पण लिखा है सुबह सवे...

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मेहनत का जहां में .. दूसरा सानी नही             
है पसीना खून से बढकर कोई पानी नही
॰॰
 लक्ष्य से दूर हैं, लगते मजबूर हैं
   जब तलक  दिल मे हमने ठानी नही

नीचे लिंक लिक कर पूरा पढें...
http://tayaljeet-poems.blogspot.in/2015/07/blog-post_18.html

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शबनम लबो से टपका दिये तुम
तुम   सुबह   सवेरे   जो   भीग     के   निकले                             कितने   ही   अरमां     इस   दिल   मे   मचले जमाने का हमको ख्याल जो आया पागल दिल भी लगा था सम्भलने पर शबनम   लबो   से   टपका   दिये   तुम सांसे   हमारी   ही   अटका   दिये   तुम         ...

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सोने के खान मिलते है
किसी को बुजुर्गो से सोने के खान मिलते है                   किसी से विरासत मे बडे सम्मान मिलते है ॰॰ जिन्दगी की राह बताना आसान नही इतना कम के ही राहो में पुख्ता निशान मिलते है ॰॰                                             भले ही खो गये जिन्दगीयों की भीड में...

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याद आता है
संग यारो के अमरूद चुराना , याद आता है                                    बारिश में साईकिल चलाना , याद आता है खो तो गये है इस नयी जिन्दगी मे पर क्या खूब था गुजरा जमाना , याद आता है ................ क्या खूब था गुजरा जमाना , याद आता है क्लास मे वो देर से आना ...

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.......सोने खरे रहते है
जब तक हम लोगो के पैरों में पडे
रहते है                 सच है की उनकी ही नजरों में गिरे
रहते है ॰॰ फलदार होते है अक्सर जो झुकते
है अदब से छांव भी नही देते जो अकड कर खडे
रहते है ॰॰   गैरत और अकड में अन्तर है बहुत
थोडा सा ही जाना जिसने भी, वो अपने पैरो पर
खडे ...

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............ सिकन्दर हो गये
जब से पांव हमारे चादर के अन्दर
हो गये                     हम तो बिना जंग के ही सिकन्दर
हो गये ॰॰ जमें से कतरे मेहनत के ही पास
थे अपने ऐसे घुले, घुलकर कतरे भी समन्दर
हो गये ॰॰ जब से पाया धीरज का नन्हा सा मोती
यहां कुछ न बदला, बस पापी से कलन्दर
हो गये ॰॰ जरा ...

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काला धन - जनता की नजर में
भाग-१ सेठ जी ने कारोबार जमाया                                जाने कितनो को उल्लु बनाया सम्बन्धो को खूब भुनाया अफसरो को भी खिलाया साम-दाम-दणं-भेद सब लगाया कुल मिलाकर खूब माल कमाया चलते चलते सेठ जी का बेटा बडा हो गया सेठ जी की पकी फसल सा खडा हो गया बेटा बोला ...
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