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SUMIT PRATAP SINGH
Lyricist & Script writer
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SUMIT PRATAP's posts

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व्यंग्य : मुस्कुराइए फिर से इलेक्शन हैं
    कूं चे, गलियां और मोहल्ले फिर से गुलज़ार होने लगे हैं।  वो   फिर से टोली बनाकर दरवाजे-दरवाजे जाकर अपनी हाजिरी दर्ज करवा रहे हैं। पाँच साल पहले चोट खाए हुए लोग नज़रें उठाकर खोज रहें हैं कि शायद कोई जाना-पहचाना चेहरा मिल जाए तो उसे कुछ पलों के लिए गरियाकर अ...

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हास्य व्यंग्य : म्हारे गुटखेबाज किसी पिकासो से कम न हैं
      अ पने देश में कला की तो कोई कद्र ही नहीं है। आए दिन कोई न कोई ऐसा सरकारी फरमान जारी होता रहता है, जो कला का मानमर्दन करने को तत्पर रहता है। अब गुटखेबाज कलासेवी जीवों को ही ले लीजिए। कलासेवा की खातिर कड़ी और ज़हरीली चेतावनी का सन्देश पढ़ने के बावजूद भी अप...

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व्यंग्य : रोमियो तुम कब आओगे
      आ जकल बहुत परेशान हैं वो और काफी नाराज भी। वो चिंता में डूबकर विचार कर
रहे हैं कि आखिर क्यों उन्हें शिकार बनाकर उन पर शिकंजा कसा रहा है। अभी तक तो
कितने निश्चिन्त थे वे सब। न कोई रोक-टोक थी और न ही कोई बंधन था। बस उनकी मनमर्जी
चलती थी। प्यार के नाम पर...

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व्यंग्य : म्हारे गुटखेबाज किसी पिकासो से कम न हैं
      अ पने देश में कला की तो कोई कद्र ही नहीं है। आए दिन कोई न कोई ऐसा सरकारी फरमान
जारी होता रहता है, जो कला का मानमर्दन करने को तत्पर रहता है। अब गुटखेबाज कलासेवी
जीवों को ही ले लीजिए। कलासेवा की खातिर कड़ी और ज़हरीली चेतावनी का सन्देश पढ़ने के
बावजूद भी अप...

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व्यंग्य : इन दिनों
     इ न दिनों जाने क्या हो रहा है। मतलब कि इन दिनों कुछ अजीब सा ही हो रहा है। इन दिनों देश की सबसे ईमानदारी पार्टी को उसकी ईमानदारी के बदले में जनता ने फिर से ठेंगा दिखा दिया। जनता ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि उस पार्टी ने देश के लिए कितना कुछ किया था। ...

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आज खुले जिम में खुले मन से सेहत सुधार अभियान पर।
#OpenGym #SumitPratapSingh
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दिल्ली पुलिस की नौकरी है
मन में ये ही सोच लो
मौज लो रोज लो
न मिले तो खोज लो।
#SumitKeTadke #SumitPratapSingh #DelhiPolice
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लघुकथा : असली वैलेंटाइन
              रो हित को खिड़की में दूरबीन से दूसरी बिल्डिंग में झाँकते हुए देखकर जतिन ने पूछा, “अबे साले किसके बाथरूम की जासूसी हो रही है?” “साले इतना भी कमीना मत समझ। मैं तो अखिल के घर पर निगाह टिकाए हुए हूँ।” रोहित दूरबीन में ही खोया हुआ बोला। “अखिल की जास...

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सहिष्णुता की खोज (पुस्तक समीक्षा)
इ न दिनों अन्य विधाओं के अलावा व्यंग्य पर ज्यादा काम हो रहा है। यह खबर व्यंग्य यात्रियों के लिए अच्छी हो सकती है, क्योंकि व्यंग्य ही साहित्य में ऐसा धारदार हथियार है जो विसंगतियों, विद्रपताओं को एक झटके में ठीक करने का सामर्थ रखता है । साहित्य में सहिष्णुता...

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पुस्तक समीक्षा : सहिष्णुता की खोज
इ न दिनों अन्य विधाओं के अलावा व्यंग्य पर ज्यादा काम हो रहा है। यह खबर व्यंग्य यात्रियों के लिए अच्छी हो सकती है, क्योंकि व्यंग्य ही साहित्य में ऐसा धारदार हथियार है जो विसंगतियों, विद्रपताओं को एक झटके में ठीक करने का सामर्थ रखता है । साहित्य में सहिष्णुता...
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