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Sanjay Chahal
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Lives in kaithal , Sirsa , Haryana , India
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Sanjay Chahal

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yaar anmule
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 अब बच्चों को याद नहीं आते फू -फा
संजय चहल।।
    ‘देसां मैं देस हरियाणा जित दूध दही का खाणा’ कहावत वाले प्रदेश से आज पारम्पारिक पकवान लुप्त होने के कगार पर हैं। 20-25 वर्ष पूर्व ग्रामीण परिवेश में बड़े चाव से बनाए जाने वाले मालपूए, गुलगुले, सुआली, कसार, तिल के लड्डू, चूरमा, हलवा, गूंद जैसे पकवान आज दिखाई नहीं देते। रसोई के ये गहने बदलते परिवेश के साथ ही बदल गए और वर्तमान में इनकी जगह मैगी, चाऊमीन, सूप, पॉपकॉर्न जैसी चीजों ने ले ली है। सुआली की जगह अब कुरकुरे और कसार की जगह चिप्स। परिणाम स्वरूप नई पीढ़ी को बोर्नवीटा जैसे ऊर्जा वर्धक पेय पदार्थ पीकर बड़ा होना पड़ रहा है। पूर्व में इनका कोई नाम भी नहीं जानता था और शायद उन्हें कभी जानने की जरूरत भी नहीं पड़ी।
    देसी पकवान पूर्ण रूप से पोषक तत्वों से भरपूर होते थे और यही कारण था कि प्रदेश का जवान दूसरों से अलग ही दिखता था। हर प्रमुख पकवान में घी या दूध का प्रयोग होने के कारण लोग हष्ट-पुष्ट होते थे और छैल गाबरू जैसी संज्ञाए सार्थक होती थी। रोटी की थाली में स्वीट डिश के तौर पर शक्कर या बुरा घी में भिगोकर रखा जाता था और चटनी तक को घी से नहलाए बिन नहीं परोसा जाता था। इसी खान-पान के कारण ही कहावत में हरियाणा की पहचान का मुख्य बिंदू यहां का खाना ही रखा गया है।
    प्रदेश में बाहर से कोई भी आता तो यहां के खाने का जिक्र अपने घर जाकर जरूर करता था। चीन के मश्हूर यात्री हयान स्वांग ने भी यहां के खाने के बारे में जिक्र किया है। किसी विशेष त्यौहार और मौसम को करवट लेते ही यहां चूल्हों पर कढ़ाइयां चढ़ जाती थी। ऐसा लगता था जैसे कि यहां के लोग पकवान बनाने के लिए किसी बहाने के इंतजार में ही रहते हों। वर्तमान में ये सभी पकवान एक किवंदती बनते जा रहे हैं। बारिश के मौसम में अब कोई गुलगुले नहीं उतारता, त्यौहारों या उत्सवों पर कोई हलवा, मालपुए, सुआली बनाने की बजाए मिठाई की दुकान से एक डिब्बा खरीदना लोग ज्यादा पसंद करते हैं। इन मिठाइयों में मिलावट और नकलीपन के कारण स्वाद तो खारा होता ही है है साथ में स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ता है।  जबकि देशी पकवानों में इसके ठीक विपरित होता था।
हलवे से होता था मेहमान का स्वागत
    हलवे में ताकत भरपूर मात्रा में होती है, साथ में खाने में भी बड़ा स्वादिष्ट होता था। पहले मेहमानों को पेस्ट्री, कोल्ड-ड्रिंक और पेटिज नहीं खिलाई जाती थी बल्कि इनका  स्थान अकेला हलवा लेता था। चूरमा-देशी घी की ताकत और मां के प्यार से बनाए गए इस चूरमे को खाने से जो आनंद आता था वो आज के प्रसिद्ध खानों में से किसी में भी नहीं है। तिल के लड्डूओं का स्वाद भी निराला था। जब तिल तैयार हो जाते तो जब तक बच्चों को तिल के लड्डू बनाकर दिए नहीं जाते थे, तब तक जिद्द पकड़े रहते।
त्यौहारों पर विशेष बनते थे ये पकवान-
     मालपूए, गुलगुले, कसार  जैसे स्वादिस्ट पकवान विशेष रूप से त्यौहारों, वर्षा ऋतु अथवा सावन के महीनों में बनाए जाते थे क्योंकि ऐसे समय इन पकवानों को खाने का मजा ही कुछ और होता था। साथ ही इन पकवानो का इस्तेमाल प्रसाद के रूप में भी किया जाता था। प्राचीन समय की अवधारणा को मानते हुए कई जगहों पर लोग माता- मढ़ी को पूजते थे। उस समय वे लोग प्रसाद के रूप में ये पकवान चढाते थे। दीवाली, होली जैसे प्रमुख त्यौहारों पर तो लोग इन पकवानों का इस्तेमाल मिठाईयों के तौर पर करते थे। बदलते युग के कारण हरियाणा का  ढांचा भी बदलता जा रहा है, जिसके चलते आज के बच्चों की खाने के प्रति पसंद भी भिन्न होती जा रही है। आजकल के बच्चों से अगर उनके खाने की पसंद पूछी जाए तो वे कहते हैं- पेटीज, पेस्ट्री, आईसक्रीम, गोलगप्पे, चाउमीन या फिर हॉट डाग। इसके साथ कुछ अन्य चीजें जिनसे न जाने शरीर में कितनी बीमारियां पनपने लगती हैं।
खान पान के साथ बदली बीमारियां भी
    जैसे-जैसे ग्रामीण परिवेश से ये पारंपरिक पकवान गायब हो रहे हैं वैसे-वैसे कई अनजानी सी बीमारियां भी ग्रामीण माहौल में प्रवेश कर रही हैं। मसलन मधुमेह, हृदयघात, उच्च रक्त चाप जैसी शहरी बीमारियां अब गांवों में भी सहज ही देखी जा सकती हैं। इन बीमारियों का सीधा संबंध बदलते रहन सहन एवं खान पान से ही है। आतंड़ियों का कैंसर और लीवर के ज्यादातर रोग बदलते खान-पान का ही परिणाम हैं। जैसे-जैसे खान-पान बदल रहे हैं वैसे-वैसे उपरोक्त बीमारियों के मरीजों की संख्या में भी वृद्धि हो रही है जो भविष्य के लिए खतरनाक संकेत है।
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दिन की शुरुआत होती थी गुड़ और टींडी के साथ
पकवान थे सेहत के राज
हरियाणा के नौजवानों की   शारीरिक बनावट ही इन खानों की वजह से अलग ही होती थी
संजय चहल।।
    हरियाणा ऐसा प्रदेश जिसका नाम सुनते ही देश ही नहीं विदेशों से आए पर्यटकों को भी यहां के वातावरण, वेशभूषा, और सबसे ज्यादा खान-पान की अनुभूति महसूस होने लग जाती है। लेकिन आज के इस प्रतिस्पर्धात्मक और वैज्ञानिक युग में यह खान-पान अपना अस्तित्व खोता जा रहा है। आज के इस मशीनी युग के चलते परम्परागत वस्तुआें का अस्तित्व खत्म होता जा रहा है। लेकिन हरियाणा इन्हीं वस्तुओं और खान-पान की वजह से ही प्रसिद्धी प्राप्त कर पाया है। यहां के खेतों में लगे गुड़ के कोल्हू से जब पर्यटक गर्म-गर्म गुड़ खाकर अपने आपको निहारते थे तो बार-बार हरियाणा आने का मन उन पर्यटकों का करता रहता था। हरियाणा के इस मनोहरी वातावरण को देखकर चीन के एक प्रसिद्ध यात्री हयुनांगच्यांग ने भी इस प्रदेश के खान-पान,रहन-सहन व रीति-रिवाजों की प्रशंसा की है। इस प्रदेश को भारतीय संस्कृ ति का आदि स्त्रोत भी माना जाता है। क्योंकि इस प्रदेश का व्यवहार,सादापन,खान-पान भारतीय संस्कृति का प्रतीक है अथवा हम कह सकते हैं कि हरियाणा प्रदेश अपनी संस्कृति, तीज-त्यौहारों, मेलों और खान-पान के कारण ही प्रसिद्धी प्राप्त कर पाया है। अगर हम खान-पान की बात करें तो इस प्रदेश में गुड़, लस्सी और टींडी अर्थात मक्खन विशेष रूप से प्रसिद्ध थे। इन पकवानों से शरीर को ताकत भी मिलती थी। खान-पान के इन पकवानों के सेवन से हरियाणा का व्यक्ति भरी सभा अथवा भीड़ में सबसे अलग दिखाई देता था।
गुड़ और मक्खन खाने के थे शौकिन
    किसान तो सुबह से ही अपने खाने की शुरुआत गुड़ और टींडी के साथ ही करते थे। इसके बाद दोपहर को भी खाने के वक्त लस्सी और रोटियों के साथ गुड़ और मक्खन जरूर खाते थे। ये खाने ताकतवर तो थे ही साथ में दोपहर के वक्त आराम करने के लिए जो समय मिलता उसमें आरामदायक समय निकालने के लिए ये खाने बहुत अच्छे थे, क्योंकि इनके खाने के बाद अच्छी नींद भी आती थी।
गुड़ से बनते थे पकवान
    गुड़ के द्वारा अलग-अलग तरह के पकवान भी बनाए जाते थे। माल-पूड़े , गुलगले ,सुहालÞी आदि कुछ अन्य महत्वपूर्ण पकवान ऐसे थे जिन्हें गुड़ द्वारा तैयार किया जाता था। इन पकवानों में चीनी की अपेक्षा गुड़ का ही इस्तेमाल किया जाता था। क्योंकि इन पकवानों को भरपूर स्वादिष्ट बनाने के लिए गुड़ ही सर्वश्रेष्ठ होता था।
बैलों से चलते थे कोल्हू:-
    प्रदेश भर में लगे हुए कोल्हू को चलाने की प्रक्रिया बैलों द्वारा की जाती थी। सुबह-सवेरे किसान अपने बैलों को चारे-पानी से तृप्ती दिलवाकर और खुद गुड़ और टींडी अर्थात मक्खन व लस्सी से बाजरे की रोटी खाकर अंधेरे मुंह अथवा सुबह चार बजे के करीब ही खेतों की ओर निकल जाते थे। बैलों को सुबह जाते ही कोल्हू पर लगे जुए में जोत दिए जाते थे। जो बैलों को एक किस्म का इशारे करने का काम था। बैल भी उस प्रतिक्रिया के बाद से समझ जाते और कोल्हू का कार्य शुरू हो जाता था।
बच्चे भी नहीं रहते थे पीछे:-
    इन खानों का लालच केवल किसानों को ही नहीं था, बल्कि बच्चे भी बडेÞ चाव से इन खानों को खाते थे। कई बच्चे तो गुड़ खाने के इतने लालची होते थे कि वे खेतों में कोल्हू पर पहुंच जाते थे। हालÞी अर्थात किसान की नजरे ईधर-उधर हुई नहीं के बच्चे पीछे से गुड़ की पूरी की पूरी पेड़ियां ही उठा लाते थे।
पकवान थे सेहत के राज:-
    हरियाण के नौजवानों और बडेÞ-बूढों के सेहत के असली राज ये खाने ही होते थे। देशभर में हरियाणा के व्यक्ति की पहचान अलग से ही हो जाती थी। क्योंकि हरियाणा के नौजवानों की शारीरिक बनावट ही इन खानों की वजह से अलग ही होती थी।
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Rang Dikhati Hai Yeh Zindagi Kitne
Gaer Bhi Ho Jaate Hai Ikk Pal Mein Apne
Na Jana Kabhi Sapno Ki Duniyaa Mien
Toot Jata Hai Dil, Toot Te Hain Jab Sapne…
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yaaran bin nayio sarna
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हमें आत्म मंथन की जरुरत: चहल
    कुछ अवांछित लोग आज मीडिया के क्षेत्र में घुसपैठ कर चुके हंै, जिससे पत्रकारिता जैसा क्षेत्र बदनाम हो रहा है। हमें इस पर आत्ममंथन की गहन आवश्यकता है। मीडिया आज पूरे समाज को आईना दिखा रहा है पर विडंबना यह है कि आईने के पीछे रहकर ये खुद की छवि नहीं देख पा रहा। आज जरूरत है मीडिया को भी आईना दिखाने की और इस क्षेत्र में आए उन तमाम असामाजिक तत्वों को बाहर खदेड़ने की, जिन्होंने इस पाक समाजसेवी उद्देश्य को पेशा बना दिया है। हमें उन लोगों का विरोध करना होगा, जिनकी वजह से पूरी पत्रकार कौम बदनाम होती है।
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18 मई, संजय दत्त का सरेंडर मुकर्रर
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