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PANKAJ CHATURVEDI
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गरमी ने रंग दिखाना शुरू ही किया कि देश का जल संकट नीति निर्माताओं को पानी-पानी कर रहा है। असल में न तो हमारे यहां बरसात पानी की कमी है और ना ही उसे सालभर सहेज कर रखने की । दुर्भाग्य है कि जैसे-जैसे समाज ज्यादा उन्नत, विकसित और तकनीकी-प्रेमी होता गया, अपनी परंपराओं को बिसरा बैठा। पहले-पहल तो लगा कि पानी पाईप के जरिये घर तक नल से आएगा, खेत में जमीन को छेद कर रोपे गए नलकूप से आएगा, लेकिन जब ये सब ‘चमत्कारी उपाय’’(?) फीके होते गए तो मजबूरी में पीछे पलट कर देखना पड़ा। शायद समाज इतनी दूर निकल आया था कि अतीत की समृद्ध परंपराओं के पद-चिन्ह भी नहीं मिल रहे थे। तभी तो अब पूरे मुल्क में सारे साल, भले ही बाढ़ वाली बारिश गिर रही हो , पानी के लिए दैया-दैया होती दिखती है। भले ही रोज के अखबार मुल्क में पानी के भीषण संकट की खबरें छापतें हों, लेकिन हकीकत यह है कि भारत जल निकायों के मामले में दुनिया के सबसे धनी देशों में से एक है। तालाब, कुंए, बावडी, कुएं कुएं, नदी, झरने, सरिताएं, नाले...... ना जाने कितने आकार-प्रकार के जल-स्त्रोत यहां हर गांव-कस्बे में पटे पड़े हैं। कभी जिन पारंपरिक जल स्त्रोतों का सरोकार आमजन से हुआ करता था, उन निधियों की कब्र पर अब हमारे भविष्य की इमारतें तैयार की जा रही हैं।
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water crisis due to forgetting traditional water resources
लुप्त होती पारंपरिक जल-प्रणालियां गरमी ने रंग दिखाना शुरू ही किया कि देश का जल संकट नीति निर्माताओं को पानी-पानी कर रहा है। असल में न तो हमारे यहां बरसात पानी की कमी है और ना ही उसे सालभर सहेज कर रखने की । दुर्भाग्य है कि जैसे-जैसे समाज ज्यादा उन्नत, विकसित...
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भले ही रास्ते में धुंध के कारण जाम के हालात न हों, भले ही स्मॉग के भय से आम आदमी भयभीत न हो, लेकिन जान लें कि जैसे-जैसे सूर्य की तपन बढ़ रही है, दिल्ली की सांस अटक रही है। दिल्ली में प्रदूषण का स्तर अभी भी उतना ही है, जितना कि सर्दियों में धुंध के दौरान हुआ करता था। यही नहीं, इस समय की हवा ज्यादा जहरीली व जानलेवा है। देश की राजधानी के गैस चैंबर बनने में 43 प्रतिशत जिम्मेदारी धूल-मिट्टी व हवा में उड़ते मध्यम आकार के धूल कणों की है। इस हवा को खराब करने में गाड़ियों से निकलने वाले धुएं से 17 फीसदी, पैटकॉक जैसे पेट्रो-इंधन की 16 प्रतिशत भागीदारी है। कूड़ा जलाना व परागण जैसे कारण भी हैं। हानिकारक गैसों व सूक्ष्म कणों से परेशान दिल्ली वालों के फेफड़ों को कुछ महीने हरियाली से उपजे प्रदूषण से भी जूझना पड़ता है। विडंबना है कि परागण से सांस की बीमारी पर चर्चा कम ही होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार, पराग कणों की ताकत उनके प्रोटीन और ग्लाइकल प्रोटीन में निहित होती है, जो मनुष्य के बलगम में मिलकर अधिक जहरीले हो जाते हैं। ये प्रोटीन खून में मिलकर एक तरह की एलर्जी को जन्म देते हैं। एक बात और कि हवा में परागणों के प्रकार और घनत्व का पता लगाने की अब तक कोई तकनीक नहीं बनी है।
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In summer Delhi air is more poisonous
तापमान बढ़ते ही दम घुटेगा दिल्ली का पंकज चतुर्वेदी भले ही रास्ते में धुंध के कारण जाम के हालात न हों, भले ही स्मॉग के भय से आम आदमी भयभीत  ना हो, लेकिन जान लें कि जैसे जैसे सूर्य की तपन बढ़ रही है, दिल्ली की सांस अटक रही है। दिल्ली  में प्रदुषण  का स्तर अभी भ...
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अभी सारा देश मासूम से बलात्कार व ह्त्या और उसके बाद नगदी की ka से बेहाल है और उच्च शिक्षा में स्वायत्त के नाम पर निजीकरण और उच्च शिक्षा का व्यय आम आदमी से दूर होने जैसे मसले कहीं गुम हो गए हैं, असल में यह साजिश दो दशक पहले से चल रही है.
24 अप्रैल 2000 को देश के दो बड़े उद्योगपतियों कुमार मंगलम बिड़ला और मुकेश अंबानी ने व्यापार और उद्योग पर गठित प्रधानमंत्री की सलाहकार परिषद को एक रिपोर्ट पेश की थी, जिसमें उच्च शिक्षा को देशी-विदेशी निवेश के लिए खोल कर बाजार बनाने की सिफारिश की गई थी। इस रिपोर्ट का शीर्षक था-‘ए पॉलिसी फ्रेमवर्क फॉर रिफार्म इन एजुकेशन।’ उस रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया था कि सन‍् 2015 में 19 से 24 साल आयु वर्ग के 11 करोड़ आबादी में से महज 20 फीसदी यानी 2.2 करोड़ उच्च शिक्षा के काबिल होंगे। बिड़ला-अंबानी समिति का सुझाव था कि सरकार केवल स्कूल स्तर की शिक्षा की जिम्मेदारी ले और उच्च शिक्षा पूरी तरह निजी हाथों में दे। रिपोर्ट में यह सुझाव दिया गया था कि उच्च शिक्षा लेने वाले अधिकांश लोग पंद्रह से बीस लाख का कर्ज लें। इससे बैंकिंग प्रणाली मजबूत होगी और इस कर्ज के दबाव में नौकरी पाए युवा उद्योगपतियों की शर्तों पर काम करते रहेंगे। विडंबना थी कि उस रिपोर्ट में भारत में गरीबी और प्रति व्यक्ति औसत आय जैसे मसलों को दरकिनार कर शिक्षा को निजी हाथों में सौंपने की बात कही गई थी।
इस मसले पर मेरा आलेख आज के "दैनिक ट्रिब्युन" में . इसे मेरे ब्लॉग पर पढ़ सकते हैं pankajbooks.blogspot.in
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Privatization of Higher Education: Two decade old conspiracy
उच्च शिक्षा में ‘मनीवाद’ की स्थापना पंकज चतुर्वेदी स्तरीय उच्च शिक्षा, रोजगारोन्मुखी महाविद्यालय, स्वायत्त संस्थाएं ; भले ही आज इस दिशा में उठाए जा रहे कदमों से शिक्षा जगत असहज है और उच्च शिक्षा पर केवल धनी लोगों का एकछत्र राज होगा, लेकिन यह जान लें कि इसकी...
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house should be for residence not for investment
मकान को घर रहने दो, निवेश नहीं  पंकज चतुर्वेदी एक तरफ सरकार हर सिर पर छत के संकल्प को पूरा करने में लगी है, वहीं सरकार की ही एक रिपोर्ट कहती है कि इस समय देश के श हरी इलाकों के 12 प्रतिशत मकान खाली पड़े हैं। सन 2001 में यह आंकड़ा 65 लाख था और आज यह बढ़ कर एक क...
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सन् 1931 में कानपुर में हुए दंगों के बाद कांग्रेस ने छह सदस्यों का एक जांच दल गठित किया था। सन् 1933 में जब इस जांच दल की रिपोर्ट सार्वजनिक की जानी थी तो तत्कालीन ब्रितानी सरकार ने उस पर पाबंदी लगा दी थी। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक विविधताओं के बावजूद सदियों से ये दोनों समाज दुर्लभ सांस्कृतिक संयोग प्रस्तुत करते आए हैं। उस रिपोर्ट में दोनों संप्रदायों के बीच तनाव को जड़ से समाप्त करने के उपायों को तीन वर्गों में विभाजित किया गया था -धार्मिक-शैक्षिक, राजनीतिक-आर्थिक और सामाजिक। उस समय तो अंग्रेजी सरकार ने अपनी कुर्सी हिलती देख इस रिपोर्ट पर पाबंदी लगाई थी। आज कतिपय राजनेता अपनी सियासती दांवपेंच को साधने के लिए उस प्रासंगिक रिपोर्ट को भुला चुके हैं। मुंबई दंगों की श्रीकृश्ण आयोग की रपट का जिन्न तो कोई भी सरकार बोतल से बाहर नहीं लाना चाहती।
इस हफ्ते हमारा विमर्श का मसला दंगे और उसके पीछे का स्वार्थ है , यह आलेख मेरे ब्लॉग पर विस्तार से पढ़ें pankajbooks.blogspot.in
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Communal riots are against nationalism
दंगे देश को पीछे ढकेलते हैंे  पंकज चतुर्वेदी   जिस व्यापार, धंधे, प्रापर्टी, मानव संसाधन और सबसे बड़ी बात भरोसे का निर्माण करने में इंसान व मुल्क को दशकों लगते हैं, उसे बर्बाद करने में पल भी लगता। महज कोई क्षणिक आक्रोश, विद्वेश या साजिश की आग में समूची मानवत...
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बुंदेलखंड की असली समस्या अल्प वर्षा नहीं है, वह तो यहां सदियों, पीढ़ियों से होता रहा है। पहले यहां के बाशिंदे कम पानी में जीवन जीना जानते थे। आधुनिकता की अंधी आंधी में पारंपरिक जल-प्रबंधन तंत्र नष्ट हो गए और उनकी जगह सूखा और सरकारी राहत जैसे शब्दों ने ले ली। अब सूखा भले ही जनता पर भारी पड़ता हो, लेकिन राहत का इंतजार सभी को होता है-अफसरों, नेताओं-सभी को। यही विडंबना है कि राजनेता प्रकृति की इस नियति को नजरअंदाज करते हैं कि बुंदेलखंड सदियों से प्रत्येक पांच साल में दो बार सूखे का शिकार होता रहा है और इस क्षेत्र के उद्धार के लिए किसी तदर्थ पैकेज की नहीं बल्कि वहां के संसाधनों के बेहतर प्रबंधन की दरकार है। इलाके में पहाड़ कटने से रोकना, पारंपरिक बिरादरी के पेड़ो वाले जंगलों को सहेजना, पानी की बर्बादी को रोकना, लोगों को पलायन के लिए मजबूर होने से बचाना और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना; महज ये पांच उपचार बुंदेलखंड की तकदीर बदल सकते हैं।
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