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Monika Bhatt
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घोंसला रोज़मर्रा के काम काज करते हुए सामने के खाली फ्लेट की खिड़की पर नज़र गयी तो देखा कि कबूतर तिनके एकत्रित कर रहे है. लगभग रोज ही मेरी वहा नज़र जाती और मैने देखा की १०-१५ दिन मे कबूतरों ने घोसला बना लिया और अंडा भी दिया कुछ दिन में अंडे से बच्चे निकल आए....

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मैं एक औरत हूँ मैं एक औरत हूँ इतिहास में जिसे कभी पाँच पतियों को सौंपा गया तो कभी जुएँ में हारी गयी. कभी बहन हूँ कभी माँ हूँ कभी बेटी तो कभी पत्नी.हर रूप में हर किरदार में मुझे छला जाता है कभी कोख में ही खत्म कर दिया जाता है तो कभी बाहरी दुनिया में छोटी सी ...

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मैं एक औरत हूँ मैं एक औरत हूँ इतिहास में जिसे कभी पाँच पतियों को सौंपा गया तो कभी जुएँ में हारी गयी. कभी बहन हूँ कभी माँ हूँ कभी बेटी तो कभी पत्नी.हर रूप में हर किरदार में मुझे छला जाता है कभी कोख में ही खत्म कर दिया जाता है तो कभी बाहरी दुनिया में छोटी सी ...

झिरी
झिरी..... हाँ झिरी ही तो नाम था उसका. बिखरे बाल,फटे कपड़े,साँवला रंग हमेशा हाथ में एक डंडा रखती थी और आते जाते लोगो के पीछे दौड़ती थी. बच्चे स्कूल से लौटते तो उसे मुँह चिढ़ाते और वो उन्हे दूर तक खदेड़ आती. कोने के चबूतरे पर बैठती थी आते जाते कोई रोटी दे जाता तो खा लेती तो कभी सब्जी वाले के ठेले से सब्जी छीन कर खाती. कुछ दिनो से कुछ ज़्यादा ही भूख लगती थी झिरी को. कुछ औरतों को बात करते सुना--अरे लगता है पेट से है झिरी देखो तो किसी ने इस पागल को भी नहीं छोड़ा....... बेचारी.... न जाने किसने किया ये दुष्कर्म. इसे तो खुद नहीं मालूम की इसे क्या हुआ हैं.
कुछ ही महीनों में झिरी नौ माह का पेट लिए घूम रही थी. मोहल्ले के लोग उसे खाना दे जाते. उसे ये समझ नही आता था की उसे क्या हुआ हैं अब स्कूल के बच्चो के पीछे भाग नहीं पाती थी. कपड़े भी पूरा तन नहीं ढँक पाते थे. और एक दिन सुबह झिरी चबूतरे पर बेसूध निढाल पड़ी थी शायद रात को ही बच्चे को जन्म देने में दम तोड़ चुकी थी. बच्चा अभी जीवित था मोहल्ले के एक दंपत्ति ने जिनकी संतान नहीं थी उसे गोद लेने की घोषणा की... चलो बच्चे को पालनहार मिल गये. लेकिन झिरी उसका क्या? जिसे ये भी नहीं मालूम था की वो माँ बनने वाली है. जिसे ये नहीं पता था की उसके साथ अन्याय हुआ हैं. उसे किस बात की सज़ा मिली इस बात की-कि वो एक पागल है या इस बात की-कि वो पागल होनें के साथ एक औरत है...... असहाय औरत???????
मोनिका भट्ट

आज फिर कोई वैदेही को देखने आ रहा था. पूरे घर में साज सजावट और मेहमानों के स्वागत की तैयारियाँ हों रही थी. माँ वैदेही को हर बार की तरह शिक्षा दे रहीं थी __ देख बेटी ये रिश्ता बहुत अच्छे घर से आया हैं इस बार तू कोई नया ड्रामा या हंगामा खड़ा मत करना और वैदेही आशंका और डर से मन ही मन चिंतित हों रही थी. ये कोई नई बात नहीं थी इसके पहले भी वैदेही को कई लड़के देख चुके थे व सभी ने उसे पसंद भी किया था मगर हर बार वैदेही ने इनकार कर दिया. दरअसल वैदेही जब मात्र 8 साल की थी तब किसी अपने ही रिश्तेदार ने उसके साथ अनुचित व्यवहार किया था. यह बात वैदेही के अलावा कोई नहीं जानता था क्योंकि रिश्तेदार ने उसे डरा धमकाकर चुप कर दिया था व किसी से कुछ भी न कहने की हिदायत दी थी. जिसे वैदेही आज भी नहीं भुला पाई थी. उसे पुरुष जाति से नफरत हो गई थी यहीं कारण था कि वैदेही अब शादी नहीं करना चाहती थी.

बचपन की वो घटना याद आते ही वैदेही काँप जाती उसे अब किसी पर भरोसा नहीं रहा. पुरुष जाति केवल नारी को अपनी हवस का शिकार बनाते हैं और बाद में फेंक देते हैं बस यहीं विचार वैदेही के मन में घर कर गए थे. उसका आत्मविश्वास खो चुका था. कहीं भी जाने से डरती थी वैदेही. हर किसी को शक़ की निगाह से देखती थी. मगर हर बार शादी के लिए मना करना और माँ का दिल दुखाना अब वैदेही के लिए मुश्किल था. माँ बार बार वैदेही को समझा रही थी. विनती कर रही थी कि इस बार अपनी विधवा माँ का मान रख लेना और लड़के वालों के सामने अच्छी तरह पेश आना और हों सके तो माँ के लिए ही सही इस बार हाँ कह देना. वैदेही अनेक तरह की आशंकाओं से घिरी हुईं लड़के वालों के सामने खड़ी थी. हर बार की तरह इस बार भी लड़के वालों ने वैदेही को देखते ही पसंद कर लिया और हाँ कह दी. वैदेही ने भी माँ की चिंता को कम करने का सोच हाँ कह दिया. शादी की तैयारियाँ शुरु हुई और वो दिन आया जब वैदेही घर से विदा हुई. माँ वैदेही से लिपट कर खूब रोई लेकिन फिर भी उनके चेहरे पर संतोष के भाव थे जो विदाई के दुख से अधिक गहरे थे. ससुराल में सभी ने वैदेही का बहुत अच्छे से स्वागत किया. धन की कोई कमी न थी आलीशान कोठरी और नौकर चाकर थे. 

पर वैदेही को ये सब वैभव की चाह न थी वह तो आज तक जिस सोच जिस डर में जी रहीं थी उससे बाहर आना चाहती थी. पर वैदेही को यहाँ भी किस्मत ने दगा दिया उसके पति ने सिर्फ उसकी खूबसूरती देख उससे शादी की थी उसकी भावनाओं के लिए पति के दिल में कोई जगह न थी. वैदेही पहली ही रात अपने पति की जबरदस्ती का शिकार हुई और ये सिलसिला अब आम होता गया.पहले से ही आहत वैदेही मन हि मन घुटने लगी पर अपने दिल की व्यथा किससे कहें. सब कुछ चुपचाप सहन कर वैदेही मात्र एक शरीर बन गई जिसकी आत्मा बहुत पहले मर चुकी थी. वैदेही की व्यथा उसके दिल के एक कोने में बंद होकर रह गई जो कभी बाहर न निकल सकीं.

आज कितनी ही ऐसी वैदेही हैं समाज में जिन्हें किसी अपने ने छला हैं जो किसी अपने की ही हवस का शिकार बनी और जिंदगी भर के लिए मौन हों गई. ऐसी कई वैदेही जो पुरुष वर्ग से घृणा करती हैं जिन्हें अब किसी पर भरोसा नहीं. जिनकी जिंदगी पल भर में तबाह हों गई. आए दिन समाचार पत्रों में बलात्कार दुराचार की खबरें आती हैं. ज्यादातर को अपनों ने ही शिकार बनाया हैं. कही मज़बूरी में काम कर रही नौकरानी के साथ तो कभी मासूम बच्ची के साथ दुराचार किया जाता हैं. 

मैं सवाल करती हूँ पुरुष वर्ग से क्या नारी का आत्मसम्मान, भावनाएँ, उसकी इच्छाए कोई मायने नहीं रखती? क्या नारी एक शरीर मात्र हैं? आधुनिकता का चोला पहने लोग भी नारी को वस्तु समझते हैं. कितनी ही नारियों को उनके पति ने ही शिकार बनाया कितनों को देवर, जेठ, या किसी रिश्तेदार ने. ? कहाँ खो गया हैं हमारा जमीर हमारे संस्कार? क्यों हमारी सोच इतनी गंदी हों गई हैं? हमारे देश में नारी को देवी माना गया वहीं दूसरी और इस तरह मात्र दिखावे की वस्तु समझ कर उपयोग किया गया. मात्र कुछ क्षण का आनंद पुरुष को इतना अंधा बना देता हैं कि उसका विवेक ही मर जाता हैं? आखिर क्यों? और कब तक.........????

प्रेषक 
मोनिका दुबे (भट्ट)

मैं एक औरत हूँ

मैं एक औरत हूँ इतिहास में जिसे कभी पाँच पतियों को सौंपा गया तो कभी जुएँ में हारी गयी. कभी बहन हूँ कभी माँ हूँ कभी बेटी तो कभी पत्नी.हर रूप में हर किरदार में मुझे छला जाता है कभी कोख में ही खत्म कर दिया जाता है तो कभी बाहरी दुनिया में छोटी सी उमर में ही किसी अपने के द्वारा रौंदा जाता है. कभी बड़े भाई की तरक्की के लिए बलिदान माँगा जाता है. कभी घर की गरीबी मजबूरी बनती हैं. कभी माँ के रूप में बच्चो से छली जाती हूँ कभी पत्नी के किरदार में पति की मार खाती हूँ. मुझे आगे बढ़ने का कोई हक नही मुझे शिक्षा नही दी जाती जो देते भी हैं शिक्षा तो समाज आगे नही निकलने देता
नौकरी काबिलियत पर मिले तो भी फब्ती कसी जाती है की औरत है इसलिए मिल गई और उसी नौकरी मे जानबूझकर कभी आगे बढ़ाने का प्रलोभन देकर तो कभी पीछे धकेलने के लिए औरत होने का फ़ायदा उठाया जाता है मेरी देह को गंदी दृष्टि से देखा जाता है मेरी मर्ज़ी के बिना मुझे छुआ जाता है. कभी बस मे कभी ट्रेन मे कभी रास्ते मे मुझपर गिद्ध दृष्टि डाली जाती है मुझे गंदी गंदी गालियो मे शामिल किया जाता है. मुझे अवसर कहा जाता है जो मिले उसकी जो लपक ले उसकी. कभी ससुराल मे दहेज ना लाने पर जलाया जाता है तो कभी पढ़े लिखे पति के पैरो की जूती बनाया जाता है.
में आत्मविश्वास से खड़ी होती हू तो मुझे गिराने की कोशिश की जाती है विवाह ना करू तो मेरे चरित्र पर उंगली उठाई जाती है और करू तो मेरा अस्तित्व मिटाने की कोशिश की जाती है. मेरे कदम घर से बाहर निकले तो मेरे उत्तरदायित्व को लेकर सवाल खड़े किए जाते है. चारदीवारी मे केद रहू तो मेरी पहचान खो जाती है. मे एक वस्तु की तरह हू जब मर्ज़ी होगी तब मुझसे मन बहलाया जाता है मुझ पर हॅसा जाता है जोक्स बनाए जाते है मेरी सोच मेरे पहनावे पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है. मुझे खरीदा जाता है बेचा जाता है और खुद की मजबूरी से बिकु तो गुमनाम बस्ती मे धकेल दिया जाता है.
कोई भी रिश्ते मे बँधी रहू पर एक औरत हू ........ वो औरत जिसके बिना सृष्टि की कल्पना नही की जा सकती जो देवी दुर्गा है तो चन्ड़ी भी जो अपना सम्मान अपनी मर्यादा जानती है जो हर क्षेत्र मे अपनी उपलब्धि दर्ज करा रही है वही औरत आज भी अपनी पहचान अपनी मर्यादा अपना सम्मान बचाने के लिए समझौते करती है आज भी अपने सपनो को तोड़ती है अपने पँखो को कटा पाती है लाख कहे जाने के बावजूद की हमने विकास कर लिया औरतो की स्थिति बहुत अच्छी है आज... नही... आज भी औरत बहुत पीछे है औरत को औरत होने की बहुत बड़ी सज़ा दी जाती है......समाज से बस एक सवाल आख़िर कब तक और क्यो??????

प्रेषक
मोनिका दुबे भट्ट

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बचपन से बेटी अपने पापा के बहुत नजदीक होती है. पापा के दिल का टुकड़ा. जरा सी खरोंच भी आ जाएँ तो पापा अपनी बिटिया की तकलीफ दूर करने को तत्पर रहते है. मै भी वैसे ही अपने पापा के बहुत नजदीक हूँ. मेरे पापा मेरे आदर्श है. बचपन से ही मेरी दुनिया अपने पापा से शुरु ...

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