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navin rangiyal
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आंखें उसकी
उदासी में भींजे हुए फाहे कोई रख जाए सिरहाने तुम्हारे तुम देखना आँखें उसकी जब दीवारों पर ओझल होने लगे उसके पीठ के निशान कहीं  तुम देखना आँखें उसकी  और शाम का आखिरी अंधेरा  उसकी शक्ल में डूबने लगे जब तुम देखना आँखें उसकी गर्मी की इन बोझिल दोपहरों से जब तुम्हा...

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उसकी चुप्पी
उसकी चुप्पी से खुलते हैं शहर गहरी खाई से ऊबकर आते हैं सवेरे  उजली हंसी में उगता है दिन  उसकी उंगलियां रफ़ मसौदा लिखती हैं संवलाई हाथ बातें करते हैं  मोत्ज़ार्ट की धुन पर ऊंघती हैं उदास दोपहरें  दिन अपनी धूप को सरकाता हैं धीमे धीमे शाम की तरफ  रात तब्दील हो जा...

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मुकुल शिवपुत्र : हाल मुकाम कहीं नहीं।
ठुमरी सुनी। ख़याल भी। इंदौर और देवास में स्टेज के सामने दरी पर बैठकर घण्टों सुना और जी भर के देखा भी उन्हें। लेकिन इन आयोजनों के दीगर कभी पकड़ में नहीं आए। बहुत ढूंढा। जुगत लगाई कि भजन खत्म होते ही पीछे के रास्ते से जाकर पकड़ लूंगा, लेकिन ग्रीन रूम के दरवाजे स...

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सेमिनरी हिल्स
धरमपेठ के अपने सौदें हैं भीड़ के सर पर खड़ी रहती है सीताबर्डी कहीं अदृश्य है रामदास की पेठ बगैर आवाज के रेंगता है शहीद गोवारी पुल अपनी ही चालबाजियों में ज़ब्त हैं इसकी सड़कें धूप अपनी जगह छोड़कर अंधेरों में घिर जाती हैं घरों से चिपकी हैं उदास खिड़कियां यहां छतों ...

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कभी यूं भी तो हो  चलने की आहटें जहां  वहीँ तुम्हारी आंख के किनारों पर शाम उंगलियों के पोर में दोपहरें हो रात गुजरे महक कर सुबह शीशे की परी हो रोज सुबह काजल से खींचों किनारों पर मुझे रात उतारो आंखों से लेंस की तरह उस आधे अंधेरे वाली हथेलियों उड़ते स्कार्फ़ की ...

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आँगना तो पर्बत भयो, देहरी भयी बिदेस
... हर शाम को ठुमरी की, धीरे- धीरे, टूटी हुई धुन बहती है. बाबुल मोरा नैहरवा छूटा ही जाए. हर शाम को एक जर्जर आवाज में इस ठुमरी के टूटे लफ्ज कान में आ गिरते थे ... जैसे कोई गुनगुनाते- गुनगुनाते हुए अपना सामान समेट रहा हो। जैसे कहीं जाने के लिए कोई सूटकेस में ...

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आंगना तो पर्बत भयो, देहरी भयी बिदेस
हर शाम को ठुमरी की, धीरे- धीरे, टूटी हुई धुन बहती है। बाबुल मोरा नैहरवा छूटा ही जाए। हर शाम को एक जर्जर आवाज में इस ठुमरी के टूटे लफ्ज कान में आ गिरते थे। जैसे कोई गुनगुनाते- गुनगुनाते हुए अपना सामान समेट रहा हो। जैसे कहीं जाने के लिए कोई सूटकेस में अपने कप...

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... देखो, मैं बारिश में चली आई
मैं आई भी तो बारिश के मौसम में चली आई और देखो बाहर तो बारिश हो भी नहीं रही है, बहरहाल पहले ठुमरी गाऊंगी, फिर कजरी, फिर दादरा और फिर जो भी आप लोग फरमाएंगे वो सुना दूंगी।  सारंगी - तानपुरे की ट्यूनिंग और कैमरों की फ्लेश लाइट के बीच फिर लगा जैसे सूखे पत्तें खर...

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... खोटा सिक्का था सुधीर
भगवानदास मूलचंद लुथरिया या भागु या फिर सुधीर। यक़ीनन बहुत कम लोगों को एक ही आदमी के यह तीन नाम याद होंगे। नाम धोखा दे सकते हैं। नाम धोखा देते भी हैं, लेकिन आदमी का अंदाज़ कभी झूठ नहीं बोलता। -अंदाज़ याद रह जाता हैं - और अंदाज़ याद रह गया। मुझे भी और तुम्हे भी। ...

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आनंद आश्रम-  लोग भागते नहीं, वो जगहें दौड़ती नहीं.  मेट्रो की रफ्तार से भागती जिंदगी में एक पल भी हाथ से छूट जाए तो इसे वक्त से पीछे हो जाने जैसा माना जाता है. लेकिन कुछ जगहें और कुछ जीवन ऐसे होते हैं जहां थम जाना ही जीवन की गति है. वे लोग भागते नहीं, वो जगह...
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