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Sandhya Rathore Prasad
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मौसम मचाए बड़ा शोर , ओ सजना
मौसम मचाए बड़ा शोर , ओ सजना काली घटाए घनघोर , ओ सजना बादल के कारें कारें नैना जो हैं कजरारे बूँदे गिरायें चहूँ ओर , ओ सजना काली घटायें घनघोर ओ सजना नीले से पर फैलायें बरखा संग झूम ये  गाएं जंगल में नाचें देखो, मोर ओ सजना काली घटायें घनघोर ओ सजना सजनी ये रस्...

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बादल पे पाँव मेरे - Edited
बादल पे पाँव मेरे,  सपने मैं देखूँ तेरे सूझे न कुछ भी  मुझको        अब  तो  साँझ और सवेरे, कोई तो बताये मुझको  ये क्या हुआ रे ? ख़ुद से ही
करती हूँ मैं , दिन दिनभर कितनी बातें ... आँखो ही आँखों में अब, कटने लगी है रातें ... देखो न पलकों में
 तेरा    सपना को...

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बादल पे पाँव मेरे


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चाहतों के सभी धागों को तोड़कर -A song
चाहतों के सभी धागों को तोड़कर तू चला प्यार के वादों को तोड़कर कोई नहीं आता यहाँ ,  गुमशुदा से ख़्वाब है मीलों है ख़ामोशी ,   कोई नहीं  आवाज़ है तू मुझे आवाज़ दे  तू मेरा तो नाम ले आऊँगी मैं तेरी बाँहों में  दौड़कर रास्ते तनहा यहाँ , मंज़िले बर्बाद  है इस सफ...

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ख्वाबों को हुई है तेरी जुस्तजू


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बलखाती इन बेलों से लिखी आयत उसे पढ़ा लेना
बलखाती इन बेलों से लिखी आयत उसे पढ़ा लेना  चाँद हथेली दे जाए तारों से नाम कढ़ा लेना  ‪शाम ढलें से  जलता सूरज पिघला  गीले पानी में ‬ ‪सुबह उसे तुम पोंछ पाँछ कर फ़लक पे  फिर  चढ़ा देना ‬ रात क़रीने से तुम्हारे,  बिस्तर पे रख आई हूँ  जागती रहती उन आँखों को तुम...

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देते दस्तक
"फटीचर ज़िन्दगी, फटीचर ख्याल ,  कुछ बेतुके से, अटपटे सवाल  कभी ये   ज़िन्दगी हुई  कुची- कुची सी   तो हो गया देखो कोई बवाल"  बस यही सार है लेखन का , अब ऐसा कहाँ हो पाता है की आप हमेशा अच्छा ही लिखे - क़ाहिर हम सिर्फ गिटिर पीटर करते है - इसे कायदे से लिखना ही नह...

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बेफ़िक्र और बेवजह
बेफ़िक्र और  बेवजह   ख़ुशबुओं की तरह,    ले चल मुझे ऐ   हवा   चाहे जहाँ ...जिस तरह   ख़ाली  सी  सड़कों सी     है मेरी ......  तनहाइयाँ   अंधेरो   में खो    गई है    कहीं मेरी  ......   परछाइयाँ   खो गई    शोर में  ......     खामोशियाँ जिस तरह   ......   आ च...

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जिया और समाइरा
" सुन   सानवी ,  तुझे   पता है समाइरा     मैडम की शादी तय हो गई है   ?"   प्रीत बोली।   " क्या बात कर रही है ? मगर , तुझे कैसे पता , मैं तो कल ही कॉलेज   गई थी , कोई बोला भी नहीं मुझसे   " सानवी     बोली।   " वो तो मुझे पता नहीं ! लेकिन , गज़ब हाँ !   समाइरा...

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फिर भी क्यों है तेरी चाह सी ....
ये सफ़र नहीं मेरा , ये तो घर नहीं मेरा न मुसाफ़िर मेरे  , न ये मंज़िल मेरी राह की ..... फिर भी चल रही हूँ मैं ,  गिर संभल रही हूँ मैं है  न कोई   यहाँ , बस है मैं और मेरी आवारगी । बिखरे रंग कई  तेरे संग कई  मन  में बजने लगे थे जलतरंग कई यूँ न कंकर उठा और न हलच...
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