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suprem trivedi
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न हम कल जान पाये थे, न आगे हम ये जानेंगे
बड़ी बेदर्द दुनिया है, बड़ा ज़ालिम ज़माना है, न मैडम ने ये समझा था, न साहब ने ये जाना है, लगेगी भूख ऐ अहमक, तो अंतड़ी आग उगलेगी, ये कातिल पेट तेरा है, तुझे ये खुद पलाना है. किसी ने भीख बांटी थी, किसी ने जोश बांटा है, जो तू है होश का दरकर, तुझे कब होश बांटा है? य...
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Bahujan Lokpal Bill -- 3 September 2011 at 22:52   और
तो बुराई क्या है? न तो वे ट्विटर- फेसबुक प्रधान मध्य-वर्ग का
प्रतिनिधित्व करते हैं और न ही उनके लिए मीडिया पलके पांवड़े बिछाए १० दिन
लगातार उनके हक की लड़ाई को कवरेज देगा. क्योंकि वे जिस वर्ग का
प्रत...
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फिर चार लाइने हैं ...
फिर चार लाइने हैं ... घर के ब्रह्माण्ड-मंत्री के आदेश (वे कभी-कभी इसे डिमांड भी कहती हैं) पर। लाइने काफी पुरानी पर अप्रकाशित हैं।    सहेज के रखे हैं मैंने इस दिल के टुकड़े, के कभी न कभी तू इस दिल में बसी थी . सात तालों में रखा है वो रास्ते का पत्थर, जिससे मै...
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फिर चार लाइने हैं...
फिर चार लाइने हैं... वो फ़नकार है बड़ा , उसका बड़ा नाम है तहख़ाने में उसके हड्डियाँ तमाम हैं उन्हें फिर से वज़ीर चलो मिल के हम चुन लें सुनते हैं सर पे उनके तगड़ा इनाम है                      ---विद्रोही भिक्षुक
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जीवन जीने के 101 तरीके
प्रस्तुत है मेरी नयी कहानी। ये कहानी कन्फ्यूस्ड है. मेरी तरह। पूर्ण-विराम और पीरियड में कन्फ्यूस्ड, कहानी और नोवेल में कन्फ्यूस्ड, अदि और अंत में कन्फ्यूस्ड। और इसके साथ ही मैं नाता तोड़ता हूँ अपनी सभी अपूर्ण, अनंत, अगम्य, अगोचर और अन-लोकेटैबल कहानियों से . ...
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