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Rakesh Pathak
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सुलझा हुआ शख्स समझते है मुझे लोग, उलझा हुआ सा कोई मुझमे दूसरा भी है !..
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क्यूँ पूछते हो इतना अटपटा सा
सवाल मुझसे ???
क्यूँ बार-बार रख देते हो
एक नयी शर्त ------?
मेरे तुम्हारे बीच
रिश्तों की भी एक नदी भी बहती है -??
पर
हर बार एक नयी जिद्द ???
क्या यह रिश्तों की तल्खी से उपजा
रिसता हुआ मवाद तो नहीं ???
तेरे यह सवाल --??
तेरे यह शर्त ---??
और वह जिद्द भी ....??
बोराया हुआ " मान" कब का ढ़ल चूका
और थोपी गयी पूर्वजों की प्रतिष्ठा भी --
वजूद की धमनियों में
प्रायश्चित का रक्त संचार नहीं दौड़ता कभी ...??
जो हर बार आँखे उलीच
दिखा देते हो अपना वहशीपना --!!!
Rakesh

कहकहे ख्बाबों के अब किस्से हुए..
दर्ज लम्हों के कित्ते ही हिस्से हुए....

....इक याद की बानगी यूँ देखी मैंने....
साथ वालो से कालिब के सिकचे हुए...

रस्म हल्दी के उस आँगन थे गिराय गए...
.......जिस आँगन से मन के जिरचे हुए...

रिबायत थी उनके यहाँ रसूल पूजने की ...
उस घर से रसूल थे ब जब्र निकाले हुए ...

ख़ुर्द कर दी बा कलम खुद एक क़िवाले में सब
आज उस घर से निकलने के, बाहर चर्चे हुए...! राकेश

खुद गढ़ती है मूरत अपनी, खुद ही मिटा देती है...!
.......ममता में माँ अपना सब कुछ लुटा देती है...!!
राकेश

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रेत के भुरभुराहट की तरह नहीं ढ़हता प्रेम ....!!
तुम सिर्फ रेत नहीं हो जो फिसल जाओगे वक्त के साथ... तुम वह भी नहीं जो ढ़ह जाता है एक छोटी सी चोट से... या वह जो भुरभुरा कर बदल लेता है अपना वजूद... तुम हवा भी नहीं हो जो बहा ले जाओगे हमें इस समंदर से दूर... कि... सागर के प्रेम से पगा हूँ मैं रत नमी से इस कदर ...

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गंगा के तट पर उपजी एक प्रेम कथा का कुछ भाग
याद है तुझे ? जब पहला ख़त भेजा था मैंने ..! हाँ !! तब भी क्या समय था ! तेरे शब्दों और ख्यालों में ही तो जीता था मैं .. !!!! कितने ही पत्र लिखे मैंने ...! आरजु विनती कर करके थक गया था मैं..! पर तुम कहाँ सुनती थी ..? पर आज देखो न ...साथ हो तो लग ही नहीं रहा .....
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