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Kulbhushan Singhal (कुल भूषण सिंघल)
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||जय महादेवी पार्वती||

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताह स्मताम॥१॥

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्यै धात्र्यै नमो नमः।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरुपिण्यै सुखायै सततं नमः॥२॥

कल्याण्यै प्रणतां वृध्द्यैसिद्ध्यै कूर्म्यै नमो नमः।
नैॠत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै श्र्वाण्यै ते नमो नमः॥३॥

दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः॥४॥

अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः।
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः॥५॥

ॐ श्री दुर्गाय नमः!! ॐ नमः शिवाय !ॐ श्री दुर्गाय नमः!! ॐ नमः शिवाय !ॐ श्री दुर्गाय नमः!! ॐ नमः शिवाय !ॐ श्री दुर्गाय नमः!! ॐ नमः शिवाय !ॐ श्री दुर्गाय नमः!! ॐ नमः शिवाय !ॐ श्री दुर्गाय नमः!! ॐ नमः शिवाय !ॐ श्री दुर्गाय नमः!!

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ! ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ! ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ! ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ! ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे !

जय माता दी, जय माता जी! जय माता दी, जय माता जी !
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||जय माँ दुर्गे||

नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महाघोरपराक्रमे।
महाबले महोत्साहे महाभ्यविनाशिनि॥

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदुःखभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदाऽऽर्द्रचित्ता॥

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यंम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

शरणागतदीनार्तपरित्राणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

सर्वस्वरुपे सर्वेशे सर्वशक्तिसमन्विते।
भयेभ्यस्त्राहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा
रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां
त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्र्यन्ति॥

सर्वबाधाप्रश्मनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्र्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥

सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो, धन धान्यःसुतान्वितः
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः |

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ! ॐ ऐं ह्रीं क्लींचामुण्डायै विच्चे ! ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ! ॐ ऐं ह्रीं क्लींचामुण्डायै विच्चे ! ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे !

जय माता दी, जय माता जी| जय माता दी, जय माता जी|
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शारदिये नवरात्र के शुभ आरम्भ पर बहुत बहुत बधाई !
माँ आपकी हर मनोकामना पूरी करे !!
***********************
जय जय गिरिवर राज किशोरी !!
सीता जी द्वारा पार्वती जी की स्तुति !
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जय -जय गिरिवर राज किशोरी । जय महेश मुख चन्द चकोरी।।
जय गजबदन षडाननमाता ।जगत जननी दामिनी दुति गाता।।
नहिं तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना।।
भव भव विभव पराभव कारिनि। विश्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि।।

पति देवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस् सारदा सेष।।

सेवत तोहि सुलभ फल चारी।बरदायनी पुरारी पिआरी।।
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे ।सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।
मोर मनोरथु जानहु नीकें। बसहु सदा उर पुर सबहीं के ।।
कीन्हेऊँ प्रगट न कारन तेहीं।अस कहि चरन गहे बैदेही ।।

बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसकानी ।।
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ।।
सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजिहिं मनकामना तुम्हारी ।।
नारद बचन सदा सुचि साचा । सो बरू मिलिहि जाहिं मनु राचा ।।

मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरू सहज सुंदर साँवरो ।
करुना निधान सुजान सीलु सनेह जानत रावरो ।।
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली ।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ।।

जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाय कहि ।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ।।

मंगल भवन अमंगल हारी| द्रबहु सुदसरथ अजिर बिहारी |
दीनदयाल बिरिदु सम्भारी ! हरहु नाथ मम संकट भारी !!

राम सिया राम सिया राम जय जय राम!
राम सिया राम सिया राम जय जय राम!
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||श्री विष्णु का श्री राम के मनुष्य रूप मैं अवतरित होना||

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।।
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी।।

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता।
माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता।।
करुना सुख सागर सब गुन आगर जेहि गावहिं श्रुति संता।
सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता।।

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै।
मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर पति थिर न रहै।।
उपजा जब ग्याना प्रभु मुसकाना चरित बहुत बिधि कीन्ह चहै।
कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै।।

माता पुनि बोली सो मति डौली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।।
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।

बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग।।

मंगल भवन अमंगल हारी| द्रबहु सुदसरथ अजिर बिहारी |
दीनदयाल बिरिदु सम्भारी ! हरहु नाथ मम संकट भारी !!

राम सिया राम सिया राम जय जय राम!
राम सिया राम सिया राम जय जय राम!
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मेरा कमेंट:::>>
शब्दों का चेयन शायद आपको अच्छा नहीं लगेगा....
लकिन कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं हो सकती !
रोहिंग्या आंतकी गतिविधयों के कारण अपने देश से निकाले गए...और बिना समय गवाएं ,~~यहाँ पर भी शुरू हो गए !

और सेकुलरो के बारे में क्या कहें...जो इनको यहाँ बसाना चाहते हैं....?
सेकुलरो==>> इस बार पूरा हिन्दुस्तान एक जबान मैं कह रहा है ,
रोहिंग्या को यहाँ रहने नहीं दिया जाएगा, आप भी इनके साथ जा सकते हो |
-------------------------------------------------------------------------
http://zeenews.india.com/hindi/india/exclusive-let-plan-to-engage-jammu-rohingya-muslim-in-terrorists-activities/342246

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मेरा कमेंट:::>>
शब्दों का चेयन शायद आपको अच्छा नहीं लगेगा....
लकिन कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं हो सकती !
रोहिंग्या आंतकी गतिविधयों के कारण अपने देश से निकाले गए...और बिना समय गवाएं ,~~यहाँ पर भी शुरू हो गए !

और सेकुलरो के बारे में क्या कहें...जो इनको यहाँ बसाना चाहते हैं....?
सेकुलरो==>> इस बार पूरा हिन्दुस्तान एक जबान मैं कह रहा है ,
रोहिंग्या को यहाँ रहने नहीं दिया जाएगा, आप भी इनके साथ जा सकते हो |
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http://zeenews.india.com/hindi/india/exclusive-let-plan-to-engage-jammu-rohingya-muslim-in-terrorists-activities/342246

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मेरा कमेंट:::>>
शब्दों का चेयन शायद आपको अच्छा नहीं लगेगा....
लकिन कुत्ते की दुम कभी सीधी नहीं हो सकती !
रोहिंग्या आंतकी गतिविधयों के कारण अपने देश से निकाले गए...और बिना समय गवाएं ,~~यहाँ पर भी शुरू हो गए !

और सेकुलरो के बारे में क्या कहें...जो इनको यहाँ बसाना चाहते हैं....?
सेकुलरो==>> इस बार पूरा हिन्दुस्तान एक जबान मैं कह रहा है ,
रोहिंग्या को यहाँ रहने नहीं दिया जाएगा, आप भी इनके साथ जा सकते हो |
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http://zeenews.india.com/hindi/india/exclusive-let-plan-to-engage-jammu-rohingya-muslim-in-terrorists-activities/342246

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|| संकटनाशन गणेश स्तोत्र ||

प्रणम्यं शिरसा देव गौरीपुत्रं विनायकम।
भक्तावासं: स्मरैनित्यंमायु:कामार्थसिद्धये।।1।।

प्रथमं वक्रतुंडंच एकदंतं द्वितीयकम।
तृतीयं कृष्णं पिङा्क्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम।।2।।

लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च।
सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्ण तथाष्टकम् ।।3।।

नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम।
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम।।4।।

द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्य य: पठेन्नर:।
न च विघ्नभयं तस्य सर्वासिद्धिकरं प्रभो।।5।।

विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम्।
पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ।।6।।

जपेद्वगणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासै: फलं लभेत्।
संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय: ।।7।।

अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वां य: समर्पयेत।
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत:।।8।।

JAI GANESH !!!

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा |
माता जाकी पार्वती,पिता महादेवा ||

ॐ श्रीगणेशाय नमः | ॐ श्रीगणेशाय नमः | ॐ श्रीगणेशाय नमः | ॐ श्रीगणेशाय नमः | ॐ श्रीगणेशाय नमः | ॐ श्रीगणेशाय नमः | ॐ श्रीगणेशाय नमः | ॐ श्रीगणेशाय नमः | ॐ श्रीगणेशाय नमः | ॐ श्रीगणेशाय नमः | ॐ श्रीगणेशाय नमः |
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क्या कारण है कि श्राप और वरदान सिर्फ गरीबो के कष्ट की कमी के लिए नहीं हैं
http://awara32.blogspot.com/2015/11/hindu-dharm-rejects-blessings-curses.html

पुराण उठा लीजिये, महाभारत या रामायण देख लीजिये; सारे ग्रन्थ ऐसे अनेक प्रसंगों से भरे हुए हैं कि अमुक ऋषि, महाऋषि, मुनि-महामुनि, देवी-देवता, और स्वंम प्रभु ने कुपित होकर यह श्राप दिया, और, प्रसन्न हो कर यह वरदान दिया | तथा ना ही श्राप, और ना ही वरदान कभी मिथ्या होता है |

बहुत सुंदर !

अब प्रश्न ये है कि, मान्यता अनुसार, इश्वर तो दीन, दुखी, निर्धन पर विशेष कृपा रखते हैं, और संचार का पूरा उपयोग, हर सदी हर युग में करके, यह भी बताया गया है कि ऋषि, महाऋषि, मुनि-महामुनि, तो इश्वर से भी अधिक दीन, दुखी, निर्धन पर कृपा रखते हैं; तो फिर किसी ने यह श्राप या वरदान क्यूँ नहीं माँगा, या दिया कि गरीबो का कष्ट कम हो ?

इसका उत्तर में दूं, इससे पहले आपको यह समझना होगा कि = = >

सनातन धर्म को छोड़ कर बाकी जितने भी धर्म हैं, वे सर्जन में आस्था रखते हैं, उनके इश्वर स्वर्ग में बैठ कर ही पूरी श्रृष्टि और खासकर उनके समाज का विशेष ध्यान रखते हैं | हमारी तरह नहीं हैं, की यदि श्रृष्टि प्रलय की और अग्रसर हो, तो इश्वर स्वर्ग में बैठ कर कुछ भी सुधार नहीं कर पाते, उनको अवतरित होना पड़ता है| अवतरित होकर दिशा परिवर्तन करते हैं, और उसमें भी, क्यूंकि उनको पूर्ण सफलता नहीं मिलती, श्रृष्टि प्रलय की और अग्रसर रहती है |

स्पष्ट है की समाज से सम्बंधित किसी कार्य के लिए सनातन धर्म में इश्वर, केवल विशेष गभीर स्थिति में अवतरित होकर ही हस्ताषेप करते हैं, स्वर्ग में बैठ कर नहीं| और उसके बाद भी यह धर्मगुरुओं कि और समाज की जिम्मेदारी है की श्रृष्टि को विनाश की और नहीं बढ़ने दें इश्वर की नहीं|

फिर से समझ लीजीये = = > “धर्मगुरुओं कि और समाज की जिम्मेदारी है की श्रृष्टि को विनाश की और नहीं बढ़ने दें इश्वर की नहीं”|

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http://awara32.blogspot.com/2015/11/hindu-dharm-rejects-blessings-curses.html

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क्या कारण है कि श्राप और वरदान सिर्फ गरीबो के कष्ट की कमी के लिए नहीं हैं
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पुराण उठा लीजिये, महाभारत या रामायण देख लीजिये; सारे ग्रन्थ ऐसे अनेक प्रसंगों से भरे हुए हैं कि अमुक ऋषि, महाऋषि, मुनि-महामुनि, देवी-देवता, और स्वंम प्रभु ने कुपित होकर यह श्राप दिया, और, प्रसन्न हो कर यह वरदान दिया | तथा ना ही श्राप, और ना ही वरदान कभी मिथ्या होता है |

बहुत सुंदर !

अब प्रश्न ये है कि, मान्यता अनुसार, इश्वर तो दीन, दुखी, निर्धन पर विशेष कृपा रखते हैं, और संचार का पूरा उपयोग, हर सदी हर युग में करके, यह भी बताया गया है कि ऋषि, महाऋषि, मुनि-महामुनि, तो इश्वर से भी अधिक दीन, दुखी, निर्धन पर कृपा रखते हैं; तो फिर किसी ने यह श्राप या वरदान क्यूँ नहीं माँगा, या दिया कि गरीबो का कष्ट कम हो ?

इसका उत्तर में दूं, इससे पहले आपको यह समझना होगा कि = = >

सनातन धर्म को छोड़ कर बाकी जितने भी धर्म हैं, वे सर्जन में आस्था रखते हैं, उनके इश्वर स्वर्ग में बैठ कर ही पूरी श्रृष्टि और खासकर उनके समाज का विशेष ध्यान रखते हैं | हमारी तरह नहीं हैं, की यदि श्रृष्टि प्रलय की और अग्रसर हो, तो इश्वर स्वर्ग में बैठ कर कुछ भी सुधार नहीं कर पाते, उनको अवतरित होना पड़ता है| अवतरित होकर दिशा परिवर्तन करते हैं, और उसमें भी, क्यूंकि उनको पूर्ण सफलता नहीं मिलती, श्रृष्टि प्रलय की और अग्रसर रहती है |

स्पष्ट है की समाज से सम्बंधित किसी कार्य के लिए सनातन धर्म में इश्वर, केवल विशेष गभीर स्थिति में अवतरित होकर ही हस्ताषेप करते हैं, स्वर्ग में बैठ कर नहीं| और उसके बाद भी यह धर्मगुरुओं कि और समाज की जिम्मेदारी है की श्रृष्टि को विनाश की और नहीं बढ़ने दें इश्वर की नहीं|

फिर से समझ लीजीये = = > “धर्मगुरुओं कि और समाज की जिम्मेदारी है की श्रृष्टि को विनाश की और नहीं बढ़ने दें इश्वर की नहीं”|

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