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G.S. Parmar
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नीम की छाँव सा
प्यार के गाँव सा
मधु के स्वाद सा
आत्मा की नाद सा
माँ का दुलार था वो
कितना अलौकिक प्यार था वो |
कोयल की गुनगुन सा
पायल की रूनझुन सा
नदी की कलकल सा
झरने की छलछल सा
प्रकृति माँ का सत्कार था वो
माँ का दुलार था वो
कितना अलौकिक प्यार था वो।
ग्रीष्म भोर की बयार सा,
सजीले सावन की फुहार सा
सर्दी की सुहानी धुप सा
मंडराते बसंती मधुप सा,
माँ की ममता की बौछार था वो
माँ का दुलार था वो
कितना अलौकिक प्यार था वो
जी. एस. परमार
नीमच
मध्यप्रदेश

जो देश मानवता के लिए घातक हथियार बनाकर छोटे देशों को बेंचते हैं
और विश्व शांति का उपदेश देते हैं उन पर मेरे चंदअशआर
गौर फ़रमाईयेगा

टूटे साज़ से सरगम सजाने चला हूँ |
बे सुर गले से सुरीले गीत गाने चला हूँ |

जो धुन सुनी नही कभी मैने
उसे जग को सुनाने
चला हूँ |

लड़ाकर भाई से भाई को
आज फिर सुलह कराने चला हूँ |

बाँट विश्व को अस्त्र शस्त्र
मै विश्व शान्ति बढ़ाने
चला हूँ |

खा कर शक्कर स्वयं मजे से
शक्कर निषेध का उपदेश
सुनाने चला हूँ |

चोर को बता कर ख़ज़ाने की राह ,

साहूकार को जागते रहने की
नसीहत सुनाने
चला हूँ |

बगल में छिपाकर छूरी,
जोर से रामधुन गुनगुनाने
चला हूँ |

तुम समझो न समझो मुझे
व्यापारी हूँव्यापार बढ़ाने चला हूँ |
जी एस परमार
नीमच मध्यप्रदेश

🌮अन्नदाता 🥞

सूखी रोटी, फटे कपड़े |

कड़ी धूप, टूटे छकड़े, |

रूठी किस्मत ,फूटे घर,

स्वाभिमान और उठे सर |

इतना सहा, कब तक सहूँ,

मेरी पीड़ा, अब क्यों न कहूँ |

किसने ऐसी, मेरी दशा बनाई ,?

आहें मेरी,क्या सरकारें सुन पाई?

दुःख की चादर ,रोता मन,

कष्टों की छाँव, सोता तन |

गाँधी बाबा, फिर आ जाओ,

रिसते घाव, फिर सहला जाओ |

जी. एस.परमार
नीमच

🌹क्या लिखुँ 🌹

क्या लिखुँ, कैसे लिखुँ,

दिल कवि मेरा सोया है |

देख कर हाल ए दुनियां,

कवि दिल मेरा रोया है |

चांद वही ,सुरज भी वही हैं ,

आसमाँ वही, तारे भी वही है |

कुछ नहीं बदला दुनियां मे बस,

केवल पहले वाला इन्सां नही है |

देश के लिए मर मिट गया अब,

वो शेर भगत आजाद नही है |

जलियाँवाले बाग मे हजारों,

प्राण मात चरणों में धर गए |

पर देश के खातिर हम सब,

लाईन में लगने से डर गए |

डरा दे अन्याय अनीति को

अब वो सुभाष कहाँ हैं ?

सौ साल पहले वाले देश भक्ति के

अब वो जज़्बात कहाँ है |

जी. एस. परमार

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🇮🇳माँ भारती 🇮🇳

वृंदावन सा वन कहाँ से लाउँ,
सुदामा सा मन कहाँ से लाउँ |

दिल तो मिल जाते हैं जग मे,
राधा सा अंतर्मन कहाँ से लाउँ

कुबेर सा धन कहाँ से लाउँ,
प्यारा सा लछमन कहाँ से लाउँ |

मिलते हैं कई सपुत जग मे,
छोटा सा श्रवन कहाँ से लाउँ |

कश्मीर सा चमन कहाँ से लाउँ ,
एमपी सा अमन कहाँ से लाउँ |

देश तो बहुत है इस दुनियाँ मे ,
भारत सा वतन कहाँ से लाउँ |


जी. एस. परमार.

🇮🇳 हिंदुस्ताँ 🇮🇳

पल पल प्रीत के गीत ढले,
डग डग प्रेमी मीत मिले |

हिम किरीट सर पे न्यारे
जिसके सिंधु चरण पखारे |

ऐसा हिंदोस्ताँ हमारा हैं |

मिटा सकी न हस्ती सदियाँ,
मात है जहाँ कल कल नदियाँ |

जहाँ पहरे देते पर्वत प्यारे,
गैया को जहाँ मैया पुकारे |

ज्ञान से इसके जग मे उजियारा है

ऐसा हिंदोस्ताँ हमारा हैं |

प्रेम जहाँ कण कण मे समाया,
गीत अमन का जिसने गाया |

इंसाँ तो क्या जिसने चाँद को भी,
चंदा मामा कह पुकारा है,

ऐसा हिंदोस्ताँ हमारा हैं |

जी. एस. परमार

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🌹 बचपन 🌹

दिल ए चमन में, मितवा तेरे भी |
यादों के सुमन, महकते तो होंगे | |
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अमीरी से भरे बचपन के दिन अब भी |
आँखों में सपना बन, चमकते तो होंगे | |
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सावन मे सड़क समंदर में चलाए जहाँज कभी |
यादों में उनकी, दिल धड़कते तो होंगे ||
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पनघट वाला पीपल, हमे याद करता होगा अब भी ||

पतझड़ मे आँसू उसके, पत्ते बन
टपकते तो होंगे | |
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बूढ़ी बारिश के श्वेत कास केशों
मे खेले कभी |

इंतज़ार मे हमारे, हौले हौले मचलते तो होंगे ||
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खोया कीमती बचपन, समय की बारिशों मे |
पाने को उसे दिन जवानी के भटकते तो होंगे ||
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जी. एस. परमार.
@gsp....
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