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Ravi Kumar Sinha
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जनता के नब्ज को पकड़ पाने का इल्म शायद अभी भी हमारे देश में मीडिया और बुद्धिजीवियों के बस की बात नहीं है। लोकसभा के चुनावों में अपार सफलता पाने वाली भाजपा दिल्ली के चुनावों में अपना वजूद बचाने का संघर्ष करती दिखी। न तो लोकसभा चुनावों में न ही इस विधानसभा चुनाव में कोई जनता के मूड को सही-सही टटोल सका। केजरीवाल की सफलता ने साबित कर दिया कि कोई भी पाटभर्् जनता को हल्के में नहीं ले सकती। जनता का प्यार कब किसे मिल जायेगा ये शायद जीतने वाली पार्टियां भी सही-सही नहीं बता सकती है।
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हरियाणा और महाराष्ट्र में आये ताजा परिणामों से एक बात तो साफ़ हो ही जाती है कि भाजपा का का ग्राफ अभी ऊपर की ओर जा रहा है। दोनों राज्यों में भाजपा का आधार काफी कम था। खासकर हरियाणा में तो भाजपा को कभी भी गंभीरता से नहीं लिया गया था। पर इन नतीजों ने एक बार फिर से देश के विश्लेषकों में पेशानी पर बल डाल दिया है। कई इसे मोदी की जीत बता रहें हैं तो कइयों को यहाँ मोदी लहर का खत्म दिख रहा है। स्पष्ट है मीडिया और विश्लेषक इस समय दो विभिन्न प्रकार की भाषाएँ बोल रहे हैं। भाजपा विरोधी और भाजपा समर्थक शायद मीडिया भी दो भागों में बंट गया है। ये विभाजन लोकतंत्र कर लिहाज़ से कोई सार्थक छवि पेश नहीं कर रहा है पर शायद देश को मीडिया का ये चेहरा कुछ और समय के लिए देखने को मिल सकता है।
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राजनीति में संभावना तो हमेशा से देखी जाती रही है पर संभावनाओं पर राजनीति भी महाराष्ट्र में जबर्दस्त ढंग से खेली गई। राज्य की तमाम पार्टियों ने एक मायने में अकेले चलने का फैसला कर लिया है। ऐसा नहीं है कि ये पार्टियां गठबंधन को बनाये रखने की कोशिश कर रही थी बल्कि हर पार्टी कहीं न कहीं गठबंधन को तोड़ने के लिए ही काम कर रही थीं। भाजपा-शिवसेना की विचारधारा पर आधारित दोस्ती हो या कांग्रेस, राष्ट्रवादी कांग्रेस का सत्ता बांटने वाली मित्रता सभी संभावनाओं के कारण ही बनी थी। अब जब इस बार गठबंधनों के टूट का मौसम है तब भी संभावनायें तलाशी जा रही है। चारो पार्टियों को यूं तो लगता है कि वक्त उनका है पर क्या ये होे पायेगा इसकी भी चिंता जरूर है।
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कई व्यक्ति है जो अपना पूरा जीवन कुछ करने का सपना देखते हुए गुजार देते है। कई व्यक्ति ऐसे भी होते हैं जो अपने से ज्यादा दूसरा क्या कर रहा है इस पर ज्यादा ध्यान देते है। इन सब से परे कुछ लोग सिर्फ करने में यकीन रखते है। वे आलोचनाओं से घबराते नहीं हैं। भविष्य देखने की क्षमता उनमे अन्य लोगों के मुकाबले बेहतर होती है। ऐसे लोगों में अब शुमार नरेंद्र मोदी को भी किया जा सकता है। शिक्षक दिवस के मौके पर उन्होंने बच्चों के बीच जिस सरल भाषा में अपने आप को प्रस्तुत किया वो एक ऐसी पहल थी जिसे आज से पहले कोई नहीं कर पाया था। विरोधी भले ही इसे एक पी आर एक्सरसाइज के रूप में देख रहे हों मगर इस रूप में भी बच्चों तक पहुँच पहले किसी भी राजनीतिज्ञ ने नहीं बनाई थी।
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कहते हैं कि डूबते को तिनके का सहारा। इस कहावत को अगर आज के राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो लालू और नीतीश पर बिल्कुल खरा उतरता है। यहां दोनों एक साथ डूब रहे थे और उन्हें अचानक एक साथ तिनका के रूप में एक-दूसरे का साथ मिल गया। फिलहाल उपचुनाव में उनकी जीत एक छोटे से तालाब से उनके सफलतापूर्वक निकलने जैसा है। मगर विधानसभा चुनाव जो कि एक विशाल नदी की तरह होगी उसमें घुसकर निकलना अभी बाकी है। पर इतना जरूर है कि ये परिणाम लोकसभा चुनावों के बाद से मुश्किलों में चल रहे लालू और नीतीश के मुंह पर एक मुस्कान जरूर बिखेर दी है।
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दुश्मन को कोई भी दूसरा दुश्मन हमेशा अपना अच्छा दोस्त होता है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आजकल इसी जुमले को अमलीजामा पहनाने में लगे हैं। भाजपा के रूप में हालिया बने दुश्मन से लड़ने के लिए उनकी पार्टी ने अपने कुछ सबसे पुराने राजनीतिक दुश्मनों में शुमार राजद और कांग्रेस से गठजोड़ किया हे। इस गठबंधन की नैतिकता और उपयोगिता पर ढेर सारा चर्चा होता रहेगा मगर नीतीश कुमार की राजनीतिक दुश्मनी किस कदर अचानक पलटी मार ली इस पर भी बहस होगा। सत्रह सालों के गठबंधन के बाद भाजपा और जदयू दोनों एक दूसरे के लिए इतने अछूत हो गये हैं कि नीतीश ने पार्टी में चल रही गुटबाजी और बगावत को भी नजरअंदाज कर दिया है।
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पिछले साल दिसंबर में जनता ने दिल्ली में जो खंडित जनादेश दिया था वो आज भी उनका उनका पीछा कर रहा है। इसके विपरीत देश में पूरी की पूरी राजनीति बदल गयी। एक पार्टी को जनता ने पूर्ण बहुमत दिया जो कि सरकार चला रही है और शायद जनता को इस बात का इत्मीनान है कि अच्छा या बुरा चाहे जो भी हो कम से कम राजनीतिक अस्थिरता तो नहीं रहेगी। देश का ये मिजाज ऐसा लगता है कि दिल्ली को देखकर ही आया होगा। तीन पार्टियों के बीच पीस रही दिल्ली की जनता राजनीतिक अस्थिरता का एक ऐसा दौर देख रही है जो उनके लिए बेहद घातक है।
बहस: July 2014 Archives
बहस: July 2014 Archives
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जीत हमेशा से सुखद हुआ करती है। और अगर वो जीत कड़ी मेहनत के बाद सामने आई हो कहना ही क्या, सुख की मात्रा कई गुना बढ़ जाती है। लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी की जीत इसी श्रेणी में आती है। कई नेताओ की कड़ी मेहनत के बाद भारतीय जनता पार्टी को वो मुकाम मिल गया जिसकी शायद किसी ने कल्पना भी न की हो। प्रधानमंत्री और बाकी मंत्रियों को उनके मेहनत का इनाम तो पहले ही मिल चूका था, पर वो व्यक्ति जिसने भारतीय जनता पार्टी को एक प्रदेश में सबसे ज्यादा सीटें दिलवाई उसे भी सम्मानित करना था। अमित शाह को वो सम्मान मिल गया है। उन्हें भारतीय जनता पार्टी का अध्यक्ष बना दिया गया है। सेनापति के सम्मान से पार्टी पुरे सेना यानि पार्टी के कार्यकर्ताओं के मनोबल बढ़ने की उम्मीद कर रही होगी।
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विवादों का आगमन कब और कैसे होगा कोई नहीं जानता है। हमारे देश का आम आदमी, जो अपने बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में दिन रात लगा रहता है, विवादों से हमेशा दूर रहना चाहता है। राजनीतिक और अपराधिक विवादों की जिस देश में बहुतायत हो वहां ऐसा करना आम आदमी के लिए शायद उचित भी है। मगर इस बार विवाद थोड़ा हटकर है। विवाद धार्मिक है। विवाद साईं बावा से जुड़ा हुआ है। जो व्यक्ति अपने जीवन शायद किसी विवाद में न पड़ा हो उसे पहले तो देशवासियों ने मंदिर में पूजा के लिए रखकर भारी इज़्ज़त दी और अब इसी देश में उनके पूजा होने और भगवान होने पर बहस की जा रही है।
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पहली पारी में एक सफल केन्द्रीय मंत्री का दायित्व निभाने के बाद नीतीश कुमार ने दूसरी पारी में मुख्यमंत्री मे रूप में अपने बेहतरीन फार्म में दिखे। इन दोनों पारियों में ऐसा कहीं से भी नहीं लगा कि नीतीश कोई गलती कर रहे हैं। जनता उनके गुण गा रही थी, सहयोगी उनके उठाये गये कदमों की प्रशंसा कर रहे थे, मीडिया भी उन्हें विकास के मोर्चे पर पूरे अंक दे रहा था और विपक्ष पूरी तरह से हताश, निराश और बिखरा हुआ था। लगभग 8 साल तक इसी स्थिति में चलने के बाद अचानक नीतीश कुमार अपने फैसलों से पार्टी के भीतर, मीडिया में और जनता के बीच हर जगह घिरने लगे हैं। जहां जनता ने लोकभा चुनाव में पार्टी को अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंचा दिया है वहीं उनके शान में कसीदे पढ़ने वाले उन्हीं के दल के विधायक बगावत का झंडा बुलंद कर रहे हैं।
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