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Uttamrao Kshirsagar (उत्‍तमराव क्षीरसागर)
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जो आग होना चाहते हैं / सुलगते हैं बरसों / यह जानकर भी / कि‍ राख हो जाऍंगे
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अंकित हैं तुम्हारी पगध्वनियाँ
मेरी नींद में अंकित हैं तुम्हारी पगध्वनियाँ यह सत्य नहीं तो कुछ अंश तो है सच का मैं देख सकता हूँ तुम्हें अपने अवचेतन एकांत में मुग़ालते से बचने के लिए चेत जाता हूँ तुम्हारे गुनगुनाने और थिरकने से कहीं ज्यादा मेरी साँसों में हैं गुज़रनेवाली हवा का उधम यह तब ...

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