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Kundan Kumar Karna
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गजल
भाव शुद्ध हो त मोनमे भय कथीके छोड़ि मृत्यु जीव लेल निश्चय कथीके जे सृजन करै सफल करै से बिसर्जन छूछ हाथ सब चलल ककर छय कथीके शक्तिमे सदति रहल कतौ आइ धरि के किछु दिनक उमंग फेर जय-जय कथीके तालमेल गीतमे अवाजक जरूरी शब्दमे सुआद नै तखन लय कथीके जाति धर्मके बढल अहंक...

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गजल
हटितो नै देरी सटितो नै देरी सत्ताके खातिर कटितो नै देरी छन भरिमे दुनिया बटितो नै देरी बढ़लाहा टिरबी घटितो नै देरी निष्ठा जे जागल डटितो नै देरी लड़की हो चंचल पटितो नै देरी संकटमे कोढिया खटितो नै देरी देहक की निश्चित लटितो नै देरी नवका छै कपड़ा फटितो नै देरी बि...

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गजल
दर्शनके लोलसा जागल घोघ उघारू प्रिय राति पूनमके छै निहोरा नै आइ नकारू प्रिय छल पिआसल ई मोन लिअ ने छातीसँ सटा हमरा आश पूरा मिलनक करू दुन्नू हाथ पसारू प्रिय फूल झाँपल पत्तासँ शोभा फुलबारिक नै दै छै माथ परके चुनरी गुलाबी आस्तेसँ ससारू प्रिय प्रेम जीवन प्रेमे जग...

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गजल
बढलै देश-देश बीच हथियारक प्रतिस्पर्धा राष्ट्रियताक नाम पर अहंकारक प्रतिस्पर्धा मानवताक गप्प लोक कतबो करै जमानामे देखल बेवहारमे तिरस्कारक प्रतिस्पर्धा पेन्टागनसँ कोरिया सहनशीलता कतौ नै अछि मिसियो बात लेल भेल ललकारक प्रतिस्पर्धा साहित्यिक समाजमे चलल राजनीति स...

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बाढि सनके विपति प्राकृतिक की राजनीतिक ?
- कुन्दन कुमार कर्ण   बेलायती वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विनक विकासवादी सिद्वान्त अनुसार पृथ्वी पर रहल सम्पूर्ण जीवित प्राणी जियबाक लेल संघर्ष करैत रहै छै आ जे संघर्षमे सफल भ' जाइ छै सएह जियबै छै । मुदा, जखन प्रकृति आ राज्य दुन्नू कोनो समुदायके विपरीत भ' जाइ तँ ...

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गजल
भरल बरिसातमे नै सताउ सजनी किए छी दूर लग आबि जाउ सजनी मिलनके आशमे अंग-अंग तरसै बदन पर वुँद नेहक गिराउ सजनी पिआसल मोन मधुमासमे उचित नै जुआनी ओहिना नै गमाउ सजनी जियब जा धरि करब नेह हम अहीँके हियामे रूप हमरे सजाउ सजनी खुशीमे आइ कुन्दन गजल सुनाबै मजा एहन समयके उ...

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गजल-59
अपनके अपना हिसाबे बुझू रचलके रचना हिसाबे बुझू असलमे सब किछु रहै छै कहूँ सृजनके सृजना हिसाबे बुझू हिया पर शब्दक असर जे पड़ै गजलके गहना हिसाबे बुझू कहाँ भेटत सोच उठले सभक धसलके धसना हिसाबे बुझू जरनिहारोके कतहुँ नै कमी जरलके जरना हिसाबे बुझू अतीतक नै याद कुन्द...

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गजल
जे कल्पनामे डुबा दै ओ छथि कवि जे भावनामे बहा दै ओ छथि कवि शब्दक मधुरतासँ करि मति परिवर्तन जे दू हियाके मिला दै ओ छथि कवि साहित्य मानल समाजक अयना छै जे सोचके नव दिशा दै ओ छथि कवि खतरा प्रजातन्त्र पर जौँ-जौँ आबै जे देश जनता जगा दै ओ छथि कवि संसार भरि होइ छै झ...
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