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शब्द व्यंजना
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हिंदी साहित्य की मासिक ई-पत्रिका
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साथियों,
आज हिन्दी साहित्य मठाधीशों और प्रकाशकों के गठजोड़ में फंसकर अपने दुर्दिन की ओर अग्रसर है। प्रकाशन उद्योग पूँजी के हाथों का खिलौना बन चुका है। एक ओर प्रकाशन के नाम पर लेखकों से मोटी रकम वसूली जाती है तो दूसरी ओर सरकारी खरीद में पुस्तकों को खपाकर मोटा मुनाफ़ा कमाने के फेर में पुस्तकों के इतने ऊँचे दाम रखे जाते हैं कि पुस्तक आम पाठक की खरीदी-पहुँच के बाहर हो जाती है। ऊपर से रोना यह कि पाठक कम हो रहे हैं, साहित्य की किताबें खरीदने में लोगों की रूचि नहीं है। जबकि हकीकत यह है कि छोटे शहरों को छोड़ दीजिए, बड़े शहरों तक में हिन्दी साहित्य की पुस्तकों की बिक्री के लिए कोई ठीक-ठाक दुकान नहीं है। जो दुकानें हैं भी वहाँ प्रकाशकों द्वारा पुस्तक पहुँचाने में कोई रूचि नहीं दिखाई जाती है। शार्ट-कट से पैसा कमाने की लालसा ने वह बाज़ार ही गायब कर दिया जहाँ ग्राहक पहुँचकर खरीदी कर सके। प्रकाशकों द्वारा दरअसल मुनाफे के खेल में साहित्यिक पुस्तकों को पाठकों से दूर करने की यह साजिश है जिसमें सबसे अधिक शोषण लेखक का होता है। लेखक से न केवल मोटी रकम वसूली जाती है बल्कि पुस्तक बिक्री से होने वाली आय में उसकी हिस्सेदारी जिसे रॉयल्टी कहते हैं, से भी वंचित किया जाता है।
इस खेल में तथाकथित वरिष्ठ लेखक भी शामिल हैं। आज सत्ता-प्रतिष्ठानों के इर्द-गिर्द चक्कर काटने वाले ऐसे नामधारी ही प्रकाशन ठिकानों को अपने कब्जे में लिए हुए हैं जिससे इनकी दाल गलती रहे। जबकि छद्म प्रतिबद्धता और वैचारिकता का मुखौटा पहने ऐसे नामचीन लेखक सत्ता-प्रतिष्ठानों से अपनी नजदीकियों को बरकरार रखने के फेर में पूँजीपतियों और ऊँचे पदों पर आसीन अधिकारियों व उनकी पत्नियों को साहित्यकार बनाने की मुहीम चलाए हुए हैं।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे अधिक नुकसान होता है नए रचनाकारों का। यह पूरा माहौल उन्हें मजबूर करता है इस या उस मठ पर माथा टेकने को। जो ऐसा नहीं करते वे हाशिए पर पड़े रह जाते हैं। दूसरा नुकसान उठाने वाला वर्ग है दूर-दराज़ के इलाकों, छोटे शहरों, गाँव-देहात में रहने वाले रचनाकार जिनके पास न तो पहुँच है, न संसाधन और न ही पैसा कि वे छप सकें। कुल मिलाकर परिणाम यह है कि प्रतिबद्ध, आम जनता के सुख-दुःख की बात करने वाली, लोक से जुड़ी रचनाएँ पाठकों तक पहुँच ही नहीं पातीं। पाठकों के सामने परोसा जाता है ढेर सारा कचरा।
ऐसे माहौल को देखते हुए बहुत से साथियों द्वारा लगातार यह महसूस किया जा रहा था कि एक ऐसा प्रकाशन होना चाहिए जिसके माध्यम से प्रकाशकों द्वारा लेखकों-पाठकों के शोषण के खिलाफ खड़ा हुआ जा सके तथा साहित्य और पाठक के बीच विद्यमान दूरी को ख़त्म करके जनपक्षीय साहित्य का व्यापक प्रसार और प्रचार किया जा सके। प्रकाशन के माध्यम से तारसप्तक जैसे जनपक्षीय सप्तक, हिंदी साहित्य के इतिहास, युवा तथा चर्चा से वंचित किए गए अच्छे जनपक्षीय रचनाकारों के कृतित्व को पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास किया जा सके। सभी साथियों के अभिमत अनुसार वर्ष 2016 में लोकोदय प्रकाशन को शुरू किया गया। पिछले एक वर्ष के समय में हमें कई साथियों की पुस्तकें तथा पत्रिकाएँ प्रकाशन हेतु प्राप्त हुईं लेकिन प्रयोग के तौर पर हमने सिर्फ ‘प्रतिपक्ष का पक्ष’, ‘कोकिलाशास्त्र’, ‘राजनीति के रंग’ तथा ‘चलें पोरबन्दर’ पुस्तकों का एवं ‘लोक विमर्श’ तथा ‘लोकोदय’ पत्रिकाओं का ही प्रकाशन किया जिससे अपनी तैयारियों तथा कार्य-प्रणाली को अंतिम रूप दिया जा सके, उन्हें परखा जा सके और आवश्यकतानुसार सुधार किए जा सकें। तमाम मूलभूत तैयारियों को पूर्ण करने के उपरान्त अब लोकोदय प्रकाशन 1 मई 2017 से पुस्तकों का प्रकाशन प्रारम्भ कर रहा है। साथ ही, प्रकाशन ने पिछले एक वर्ष में घोषित अपनी कार्य-योजनाओं पर कार्य प्रारम्भ कर दिया है। प्रकाशन को आपके सतत सहयोग और परामर्श की आवश्यकता रहेगी।

सादर आभार!

नीरज सिंह
लोकोदय प्रकाशन

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देशिल बयना पर आज-
समीक्षा - लव कुमार लव के कविता संग्रह पर राहुल देव
अपनी मिट्टी से जुड़ी कविताएँ कविता संग्रह- मिट्टी का साहित्य कवि- लव कुमार लव प्रकाशक- सतलुज प्रकाशन, हरियाणा प्रकाशन वर्ष- 2015 पृष्ठ- 144 मूल्य- 250/- कविता
दुनिया की सबसे पवित्र और आदिम कला है| जब किसी भाषा का पहली बार आविष्कार हुआ
होगा, तो जरूर कविता में...

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deshilbayna.blogspot.com

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अरुन शर्मा अनन्त की बात
समाज में असहज परिवर्तन मनुष्य के भीतर की समाप्त होती संवेदनाएँ, बड़प्पन और अनुजता के मधुर संबंधों में विच्छेद मनुजता के लिए अत्यंत हानिकारी होता जा रहा है. भावनाएँ दिन प्रतिदिन मलिन होती जा रही हैं, स्वयं को सर्वेसर्वा बनाने की जद्दोजहद में परस्पर प्रेम - व्...
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“अपनी-अपनी हिस्‍सेदारी“ का लोकार्पण
विश्‍व पुस्‍तक मेले में दिनांक 22 फरवरी, 2015 को हिन्‍दी अकादमी,
दिल्‍ली के प्रकाशन सौजन्‍य से मंजुली प्रकाशन द्वारा सद्यय प्रकाशित सुश्री संगीता
शर्मा  ‘ अधिकारी ’ के प्रथम कविता संग्रह “ अपनी-अपनी हिस्‍सेदारी “ का लोकार्पण कार्यक्रम प्रात: 11 बजे, लिखावट,...
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जनवादी लेखक संघ का सातवाँ राज्य सम्मलेन मुरादाबाद में संपन्न
  जनवादी लेखक संघ का सातवाँ राज्य सम्मलेन 13 दिसम्बर को मुरादाबाद में
संपन्न हुआ| सम्मलेन का उद्घाटन करते हुए जलेस के राष्ट्री अध्यक्ष प्रख्यात
साहित्यकार दूधनाथ सिंह ने कहा कि दक्षिणपंथ ने कभी भी कोई बड़ा लेखक , कलाकार , संस्कृतिकर्मी
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शब्द व्यंजना पर आज पढ़ें कल्पना रमानी की रचनाएँ!
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जून १९५१ को उज्जैन में जन्मी कल्पना रामानी ने हालांकि हाई स्कूल तक ही औपचारिक
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