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रमेशकुमार सिंह चौहान
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आजादी रण शेष है
आजादी रण शेष है, हैं हम अभी गुलाम । आंग्ल मुगल के सोच से, करे प्रशासन काम ।। मुगलों की भाषा लिखे, पटवारी तहसील । आंग्लों की भाषा रटे, अफसर सब तफसील ।। लोकतंत्र में देश का, अपना क्या है काम । भाषा अरू ये कायदे, सभी शत्रु के नाम ।। ना अपनी भाषा लिये, ना ही अप...
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कभू आय कभू तो जाय
कभू आय कभू तो जाय, सुख बादर जेन कहाये। सदा रहय नहीं गा साथ, दुख जतका घाम जनाये ।। बने हवय इहां दिन रात, संघरा कहां टिक पाये । बड़े होय भले ओ रात, दिन पक्का फेर सुहाये ।।
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कती खोजी
कती जाई कती पाई, खुशी के ओ ठिकाना ला । कती खोजी गँवाये ओ, हँसे के रे बहाना ला ।। फिकर संसो जिये के अब, नदागे लइकुसी बेरा । बुता खोजी हँसी खोजी, चलय कइसे नवा डेरा ।।
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‘‘गुरू की सर्वव्यापकता‘‘
‘‘गुरू की
सर्वव्यापकता‘‘ - रमेशकुमार
सिंह चौहान भारतीय जीवनशैली गुरू रूपी सूर्य के तेज से आलोकित है । भारतीय साहित्य   संस्कृत से लेकर विभिन्न भारतीय भाषाओं तक गुरू
महिमा से भरा पड़ा है । भारतीय जनमानस में गुरू पूर्णतः रचा बसा हुआ है । गुरू स्थूल
से सूक्ष्म,...
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मुक्तक-4 (मात्रा गणना का समान्य नियम)
मात्रा गणना का सामान्य नियम - क्रमांक १ - सभी व्यंजन ( बिना स्वर के ) एक मात्रिक होते हैं जैसे - क , ख , ग , घ , च , छ , ज , झ , ट ... आदि १ मात्रिक हैं । क्रमांक २ - अ , इ , उ स्वर व अनुस्वर चन्द्रबिंदी तथा इनके साथ प्रयुक्त व्यंजन एक मात्रिक होते हैं । जै...
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मुक्तक-3 (बहर)
बहर            मात्राओं के क्रम को ही बहर कहा जाता है ।   जिस प्रकार हिन्दी में गण होता है उसी प्रकार उर्दू में रूकन होता है । रुक्न = गण , घटक , पद , निश्चित मात्राओं का पुंज । जैसे हिंदी छंद शास्त्र में गण होते हैं , यगण ( २२२ ), तगण ( २२१ ) आदि उस तरह ही...
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