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स्वामी श्रद्धानंद की हत्या सेक्युलर थी और गांधी की हत्या सांप्रदायिक ?

23 दिसंबर, 1926 को अब्दुल रशीद नामक एक उन्मादी युवक ने धोखे से गोली चलाकर स्वामी श्रद्धानंद जी की हत्या कर दी। यह युवक स्वामी जी से मिलकर इस्लाम पर चर्चा करने के लिए एक आगंतुक के रूप में नया बाज़ार, दिल्ली स्थित उनके निवास स्थान गया था। वह स्वामी जी के शुद्धि कार्यक्रम से पागलपन के स्तर तक रुष्ट था।
इस घटना से सभी दुखी थे क्योंकि स्वामी दयानन्द सरस्वती के दिखाये मार्ग पर चलने वाले इस आर्य सन्यासी ने देश एवं समाज को उसकी मूल की ओर मोड़ने का प्रयास किया था। गांधी जी, जिन्हे स्वामी श्रद्धानंद ने ‘महात्मा’ जैसे आदरयुक्त शब्द से संबोधित किया, और जो उनके नाम के साथ नियमित रूप से जुड़ गया, ने उनकी हत्या के दो दिन बाद अर्थात 25 दिसम्बर, 1926 को गोहाटी में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में जारी शोक प्रस्ताव में जो कुछ कहा वह स्तब्ध करने वाला था। महात्मा गांधी के शोक प्रस्ताव के उद्बोधन का एक उद्धरण इस प्रकार है “मैंने अब्दुल रशीद को भाई कहा और मैं इसे दोहराता हूँ। मैं यहाँ तक कि उसे स्वामी जी की हत्या का दोषी भी नहीं मानता हूँ। वास्तव में दोषी वे लोग हैं जिन्होंने एक दूसरे के विरुद्ध घृणा की भावना पैदा की ।
इसलिए यह अवसर दुख प्रकट करने या आँसू बहाने का नहीं है।“ यहाँ यह बताना आवश्यक है कि स्वामी श्रद्धानन्द ने स्वेच्छा एवं सहमति के पश्चात पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मलखान राजपूतों को शुद्धि कार्यक्रम के माध्यम से हिन्दू धर्म में वापसी कराई। शासन की तरफ से कोई रोक नहीं लगाई गई थी जबकि वो ब्रिटिश काल था।
यहाँ यह विचारणीय है कि महात्मा गांधी ने एक हत्या को सही ठहराया जबकि दूसरी ओर वो अहिंसा का पाठ पढ़ाते रहे। हत्या का कारण कुछ भी हो, हत्या हत्या होती है, अच्छी या बुरी नहीं। अब्दुल रशीद को भाई मानते हुए उसे निर्दोष कहा। इतना ही नहीं गांधी ने अपने भाषण में कहा,”… मैं इसलिए स्वामी जी की मृत्यु पर शोक नहीं मना सकता।…हमें एक आदमी के अपराध के कारण पूरे समुदाय को अपराधी नहीं मानना चाहिए। मैं अब्दुल रशीद की ओर से वकालत करने की इच्छा रखता हूँ।“ उन्होने आगे कहा कि “समाज सुधारक को तो ऐसी कीमत चुकानी ही पड़ती है। स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या में कुछ भी अनुपयुक्त नहीं है।“ अब्दुल रशीद के धार्मिक उन्माद को दोषी न मानते हुये गांधी ने कहा कि “…ये हम पढे, अध-पढे लोग हैं जिन्होने अब्दुल रशीद को उन्मादी बनाया।…स्वामी जी की हत्या के पश्चात हमे आशा है कि उनका खून हमारे दोष को धो सकेगा, हृदय को निर्मल करेगा और मानव परिवार के इन दो शक्तिशाली विभाजन को मजबूत कर सकेगा।“(यंग इण्डिया, दिसम्बर 30, 1926)। संभवतः इन्हीं दो परिवारों (हिन्दू एवं मुस्लिम) को मजबूत करने के लिए गांधी जी के आदर्श विचार को मानते हुए उनके पुत्र हरीलाल और पोते कांति ने हिन्दू धर्म को त्याग कर इस्लाम स्वीकार कर लिया। महात्मा जी का कोई प्रवचन इन दोनों को धर्मपरिवर्तन करने से रोकने में सफल नहीं हो पाया। सर्वप्रथम महर्षि दयानन्द सरस्वती ने ही शुद्धि कार्यक्रम आयोजित कर देहरादून के एक युवक को वैदिक धर्म में प्रवेश कराया। बाद में स्वामी श्रद्धानन्द ने इस कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। गांधी के सेक्युलरिज़्म के हिसाब से यह कार्यक्रम मुस्लिम विरोधी था इसलिए वे स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या को न्यायोचित ठहराने लगे। सत्य और न्याय दोनो शब्द पर्यायवाची हैं। जहां सत्य है, वहीं न्याय है और जहां न्याय है, वहीं सत्य है। फिर गांधी की हत्या को न्योचित ठहरना और हत्यारे को निर्दोष मानना उनके सत्य एवं न्याय के सिद्धान्त के दावे को खोखला साबित करता है। अहिंसा के पुजारी यदि सेक्युलरिज़्म के नाम पर हिंसा को न्यायोचित ठहराएँ तो उनके प्रवचन का क्या अर्थ। गांधी के लिए अपने विचार सही हो सकते हैं लेकिन यह जरूरी तो नहीं की सभी के लिए हों। नाथूराम के अपने विचार थे। देश का धर्म के आधार पर विभाजन की पीड़ा असहनीय थी। मुसलमानों के प्रति विशेष झुकाव के कारण हिन्दू समर्थक गोडसे की गांधी से मतभिन्नता थी। जिसके परिणामस्वरूप गांधी जी हत्या हुई। इस हत्या को भी किसी तरह से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन यदि हम गांधी जी के चश्मे से देखे तो नाथूराम को भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अपने विचार से गोडसे ने भी हिन्दू समुदाय एवं राष्ट्रहित में यह कार्य किया था। उसके समर्थक मूर्ति स्थापित करना चाहते हैं तो क्या समस्या है। यदि स्वामी श्रद्धानन्द का हत्यारा निर्दोष है तो गांधी का हत्यारा भी निर्दोष है। यह तो नहीं हो सकता कि स्वामी जी की हत्या सेक्युलर थी और गांधी की हत्या साम्प्रदायिक?
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Welcome to My Wonderful Cultural Land Bharat.

Babiya is a vegetarian crocodile only eats the temple prasada which is made of rice and jaggery and does not harm anyone.

This crocodile guards the famous Ananthapura Lake Temple in Kerala from 60 years.
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Bhagwan milega bhakti se
Adhikar milega shakti se
Jago! Jago!! Jago !!!
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भारत के इतिहास के तीन सबसे महत्व्पूर्ण युद्धों का उदाहरण देखिए |

1) ई.पुर्व 326 में पर्वतेश्वर पुरू से विश्वप्रसिद्ध युद्ध के लिए जब सिकंदर ने झेलम पार किया तो उसके पास कुल छः हजार घुड़सवार सैनिक थे | इन छः हजार सैनिकों के बल पर उसने पुरू की डेढ़ लाख की सेना को हराया | उसके बाद जंगलों की शिवि जनजाति का समूल नाश किया | योद्धा मानी जाने वाली कठ जनजाति (वे हीं, जिनकी रचना कठोपनिषद है) का समूल नाश किया और भी जाने कितना कत्लेआम किया | और यह सब किया सिर्फ छः हजार सैनिकों के बल पर |

2) पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी को हरा चुके बाबर की महत्वकांक्षाएं बढ़ीं तो एक साल बाद हीं उसने 16 मार्च 1527 को तात्कालिक बड़े भारतीय शासक राणा सांगा पर आक्रमण कर दिया | इतिहासकार रशबुक बिलियम्स के अनुसार बाबर के पास पंद्रह हजार सैनिक थे और राणा सांग के पास उसके आठगुना एक लाख बीस हजार | बाबर ने महाराणा को बुरी तरह हराया |

3) 1556 के पानीपत के दूसरे युद्ध में जब हेमू से बैरम ख़ाँ (अकबर) भिड़ा तो उसके पास सिर्फ सात हजार सैनिक थे और हेमचन्द्र के पास पुरे पौने दो लाख | हेमू डेढ़ घंटे में ही हार गया |

इन तीनों युद्धों में अत्यधिक सैन्य बल होने के बावजूद यदि भारत की हार हुई तो इसका सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण था, तीनों बार भारत ने धर्मयुद्ध किया पर बैरी अत्यधिक क्रूर था और उसने काट कर रख दिया | इसी बात को आधुनिक शब्दावली में कहें तो भारत सेकुलर था और आक्रमणकारी बर्बर | विश्व के किसी देश के किसी भी सदी का इतिहास उठा कर पढ़िए, बौद्धिकता हर बार बर्बरता के पांव तले निर्दयता से रौंदी गयी है |

डॉ नारंग की हत्या भी बर्बरता द्वारा बौद्धिकता की हत्या है | यह हत्या उस चुप्पी की सजा है जिसे नई भाषा में सेकुलरिज्म कहते हैं | ध्यान से देखिए, जिस देश में एक आत्महत्या पर चार महीने लगातार चर्चा होती है, उसी देश में यह निर्मम हत्या मुद्दा नही बन पाती तो इसका कारण हमारी वही चुप्पी है |

आपने देखा न, एक हत्या पर पचासों लाख मुआवजा लेने के बाद भी वे तीन महीने तक देश को हिलाते रह गए | क्यों ? इसलिए कि फिर किसी की हिम्मत न हो उनकी ओर आँख उठा कर देखने की |

आपने देखा न, एक कायर आत्महत्या के लिए पुरे राष्ट्र को दोषी ठहरा कर उन्होंने पुरे विश्व से भारत की शिकायत की | क्यों ? इसलिए कि मारना तो दूर, कोई उनकी ओर आँख उठा कर देखे भी नही |

आप चुप हैं तो रोज मरते हैं, वह गरजता है तो रोज मारता है | संख्या बल के भरम में मत पड़िए, सात हजार सैनिकों के साथ भारत में घुसे बाबर का खानदान भारत में डेढ़ लाख से अधिक मन्दिर तोड़ सकता है, और पुरे देश को 300 वर्षों तक (1556 से 1857 तक) गुलाम बना सकता है तो अब क्या नही हो सकता है जबकि आप और हम पहले से अधिक अकर्मण्य और कायर हुए हैं और वे पहले से अधिक क्रूर |

ध्यान से देखिएगा तो दिखेगा, डॉ नारंग की हत्या में थोड़े से आप और हम भी मरे हैं | चुप्पी तोडिए नही तो धीरे धीरे सब मरेंगे | थोडा थोडा करके पूरी तरह मर जायेंगे | चिल्ला सकते हैं तो चिल्लाइये, गरज सकते हैं तो गरजिए, बरस सकते हैं तो बरसीए, और यदि कुछ नहीं कर सकते तो रोइए, पर चुप्पी तोडिए | तभी जी पाएंगे वरना. . .
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एक पुलिस वाले का खुला पत्र समस्त देश्वासियो के नाम........

हाँ जी ! मैं पुलिस हूँ ! आपका ठुल्ला , आपका मामू !

हाँ जी ! मैं पुलिस हूँ !

जब आप बिना हेलमेट और तीन सवारियां बिठाकर अपनी बहादुरी का परिचय देने सड़क पर आते है तो कहते हैं ठुल्ले से दस बीस में निपट लेंगे।

पर जब आप सड़क पर गिर जाते हैं तो इसी ठुल्ले की नाकामी को कोसते हुए पूरी व्यवस्था को गालियां देते हैं। आपके पिताश्री आपके इन मर्दोंवाली कारनामों पर गर्व करते हैं पर जब आप किसी गरीब को ठोकर मार देते हैं तो इसी ठुल्ले को वह ऊपर वाले से फ़ोन करा मामले को रफा दफा करने का दवाब बनाते हैं।

, कभी कभार आप आपने यार दोस्तों को अपनी नयी कार में बियर का जश्न मनाते नाकाबंदी में इसी मामू पर रौब झाड़ने लगते है। बियर से भी कम दाम पर इस मामू की कीमत बताने से आप नहीं शरमाते और चालान काटने पर मोबाइल घुमाने लगते है ।

जब कोई बदमाश आपकी इसी कार में बैठी गर्ल फ्रेंड को घूरने लगता है तब इसी मामू से उम्मीद करते है कि वह इन बदमाशों से लोहा ले और आपका मोबाइल भी शायद साइलेंट हो जाता है। कुछ देर मामू की औकात का मजाक उड़ाती आपकी दोस्त भइया प्लीज़ पर उत्तर आती हैं।

आपका दोस्त मोटरसाइकिल पर बैठ लड़कियों के दुपट्टे भले खींचता रहे पर मेरी नासमझी पर आपको बड़ा क्रोध आता है ...

जी हाँ , मैं वही आपका ठुल्ला , आपका मामू पुलिस वाला हूँ । मैं वही हूँ , जब आप टीवी स्क्रीन पर पॉपकॉर्न खाते हुए आतंकवादी हमले देख रहे थे , मैं कसाब की एके 47 की गोलियां अपने सीने पर ले रहा था।

किसी ठेले के सामने कार रोक कर ट्राफिक जाम करने के पहले सोचिये की कौन निकम्मा और असली में कौन देश का ठुल्ला है। आप तो सौ सौ की नोट निकाल लेते हो पर मैं तो एक पानी की बोतल भी नहीं खरीद सकता।

भूख बेबस कर देती है खोमचेवाले से दो तीन दोना उठा लेने की क्योंकि १० घण्टे किसी अनजान जगह पर खड़े होने पर कोई टिफ़िन लेकर नहीं आता।

आप अपने मोहल्ले की टूटी सड़क के लिए ठेकेदार से नहीं लड़ पाते। राजनेताओं से उनके वादों के सवाल नहीं पूछ पाते। गली के माफिया से बच कर रहते हैं। सामने जा रही लड़की की छेड़खानी भी आपके लिए मनोरंजन लगती है। थिएटर हो या रेलवे , ब्लैक की जगह खुद खोजते हैं।

पर एक पुलिस के सिपाही से उम्मीद करते हैं वह चौवीसों घंटे आपके साथ मौजूद रहे । बीच बाजार हो रहे अपराधो को नज़रअंदाज़ कर देते हैं और बाहुबलियों की जीप पर खड़े नारे लगाते हैं पर मेरी लाठी से चूक हो तो मोमबत्तियों का जुलस बड़ी संजीदगी और जिम्मेदारी से निकालते हैं। कोई भी जुलुस निकले , नेताओं के भाषण हो , आप सडको पर आ जाते हैं और मुझे धुप सहते हुए आपकी सुरक्षा आपके ही लोगों से करनी है। आप अपने घरों में आराम से त्योंहार मनाते है

और बेचारे आपका यह मामू बिना छुट्टी किये आपकी खुशियों में कोई दखल ना पड़े उसके लिए सड़कों पर खड़े यातायात व सुरक्षा व्यवस्था में तैनात खड़ा रहता हूँ। जिसकी फाईलों में मैं कई अपराध दर्ज़ किये , जिसे मैं ढूंढता हूँ जान की बाजी लगा कर , उसे ही आप चुनाव जीता देते हैं और फिर मेरी ड्यूटी लगती है उसके साथ साये की तरह रहने की और सल्यूट मारने की।

बहुत पहले एक गाना गाया जाता था " इनकी ना मानो सिपहिया से पूछो ", बड़ा विश्वास होता था इस सिपहिया पर. जब बच्चे रोते थे तो कभी माएं हमारा डर दिखाती है की चुप हो जा नहीं तो पुलिस आ जायेगी। कितना आदर और भय होता था लोगों में जैसा राजकपूर ने गाया था " आधी रात को मत चिल्लाना नहीं तो पकड़ लेगा पुलिसवाला " वह ज़माना कहां और कब चला गया।

चाहे आप ठुल्ला कहें या मामू पर कितना सुरक्षित महसूस करते है जब वह हमें देख लेते हैं। मुझे इसके साथ यह भी देखना है की आप किसी बहकावे में आकर दंगा फसाद न करें। मुझे यह भी संभालना है की किसी राजनैतिक या सामाजिक समस्या पर आप भीड़ न जमा करें . मुझे चाक चौबंद होना की मंत्रीमहोदयजी की कार बिना किसी रूकावट के इस सिग्नल से निकल जाए। मुझे रेड अलर्ट किया गया है की आप के बीच कोई आतंकवादी गतिवधियां ना हो जाए। कुछ लोगों के वादविवाद में भी मुझे दखल देकर शान्ति बनाये रखना है। मैं अकेला चार किलो की बन्दूक कंधे पर लादे और हाथ में लाठी लिए इन सब जिम्मेदारियों को निभा रहा हूँ। मुझे बड़ा सतर्क होना है क्योंकि इस चौराहे पर खड़ी उस मूर्ति पर कोई कबूतर ना बैठ जाए। कहीं गन्दा हो जाएगा तो लोगों की किसी कोई भावना को आहत पहुंचेगी।

आप इस चिलचिलाती धुप में भले न निकले , सर्दियों में अपने कम्बल से न निकले या फिर बारिश होते ही छत के नीचे भागे पर मुझे तो इसी चौराहे में खड़ा होना है।

आपको नागरिक जिम्मेदारी पता है या नहीं पर उम्मीद यही की जाती है पूरे संविधान का हर शब्द का पालन मैं कर सकूँ। इस चौराहें पर दसों घंटो खड़ा होने के बाद मुझे यह भी ध्यान रखना है की हर एक चीजों का विस्तृत विवरण लिखूं ताकि अदालतों में बड़े बड़े कालेजों में पढ़े बड़ी बड़ी पदवी वाले लोग उस पर बहस कर सकें। यदि उन्होंने थोड़ी भी गलती निकाल ली तो मेरी निंदा करने कई लोग इस चौराहे में खड़े हो जायेंगे। आपके घर में ट्यूब वाली टीवी से कब एलईडी वाली पतली टीवी आ गयी पता नहीं चला पर मुझे तो अपनी वही लाठी लिए सौ साल पहले का कानून और हजार संसोधन को बखूबी याद रखना है।

देश के प्रधानमंत्री कहते है स्मार्ट बनो। कभी उन्होंने देखा है टेन्ट में सोते हमें। कभी झाँका है हमारी खण्डहर सी बैरकों में। जब आप लोग ऑफिसियल काम से जाते हैं तो होटलों में रहते हैं। हम जब अपराध की खोजबीन या दुर्दांत अपराधियों को भी लेने जाते हैं तो बस स्टैंड या रेल के प्लेटफॉर्म पर सोते हैं।

पर क्या आप जानते हैं की हर साल 2730 से अधिक सिपाही सर्विस के दौरान प्राकृतिक मौत के शिकार होते हैं ? हमें तो सरकारी अस्पताल के लाईन में भी लगना होता है। आप चौंकिए नहीं यह जान कर की हर साल तनाव से 235 पुलिसवाले आत्महत्या कर लेते हैं ? सिर्फ महाराष्ट्र में एक साल में 40 पुलिसवालों ने ख़ुदकुशी की।

आप ठुल्ला और मामू का मजाक करने के पहले यह भी जान लें की हर साल 740 से अधिक मामू और ठुल्ले आपकी जान बचाने के लिए अपने आप को शहीद कर देते हैं और 3750 से अधिक घायल हो जाते हैं। सिर्फ पिछले पांच साल में सरकार कितनी बदली वह तो नहीं जानते पर यह जान लें की 4000 पुलिस वाले अपनी जान पर खेल गए थे। पिछले पांच साल में 10000 सिपाही आपके पत्थरों , हिंसक भीड़ और जनांदोलन में घायल हुए और 80 से ज्यादा लोगों ने उग्र भीड़ के सामने अपनी जान गँवा दी।

आपका देश चल सके और इस देश के तथाकथित वीईपी जिनके साथ फोटो खिंचवा कर सोशल साइट्स में अपलोड कर आप अपनी महत्ता बढ़ाते हैं की दिन रात सुरक्षा में मेरे जैसे 47500 से भी अधिक लोग लगे हैं उनकी कारों के इर्दगिर्द भागते रहने और उनके घर की चौकीदारी में।

किसी इलेक्शन वोटिंग डे में आप देर से उठते हैं छुट्टी समझ कर पर आपने हमें तो बंदोबस्त में देखा होगा सूरज निकलते ही किसी सड़क की मोड़ पर जानते हुए की रात भी ढल जायेगी घर जाते हुए। यदि अपने शहर के बाहर जाएँ तो वर्दी , जूते , हेलमेट और जालीदार जाल लिए सिर्फ 60 रुपये के दैनिक भत्ता के लिए खड़े रहते हैं , जिसमे आप क्या खिला सकते हैं खुद ही समझ लें। चलिए ! आपने मेरी इतनी सुनी इसके लिए शुक्रिया ! कहीं देर हो गयी तो निलंबित हो जाऊँगा !

इस देश में देश की हर समस्या के लिए सिर्फ खाकी सस्पेंड होता है या ट्रांसफर।...

यही मैं हुँ,यही मेरी अंतिम सच्चाई हैं.......
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दूसरे विश्वयुद्ध में ब्रिटेन ने गुलाम भारत से जो उधार लिया था उसका आंकड़ा आज के हिसाब से 150 अरब डॉलर से कम नहीं होगा | लेकिन उसे लौटाने की बात कभी किसी ने नहीं की |

बीती नौ मई को दूसरे विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की विजय की 70वीं जयंती मनाई गई | अमेरिका जैसे कई देशों के बहिष्कार के बीच मॉस्को में हुए इस आयोजन में भारत के राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी भी मौजूद थे | रूस पर इस युद्ध की मार सबसे ज्यादा पड़ी थी | दुनिया भर में चली इस लड़ाई में कुल मिला कर जो छह करोड़ लोग मरे थे, उनमें से दो करोड़ तत्कालीन सोवियत संघ के सैनिक व निवासी थे |

दूसरे विश्व युद्ध की मार भारत पर भी कम नहीं पड़ी थी | आंकड़े बताते हैं कि भारत के करीब 25 लाख सैनिकों ने इसमें भाग लिया था | लड़ाई के दौरान इनमें 24 हजार से भी ज्यादा मारे गए | घायल या लापता होने वालों की संख्या इससे करीब तिगुनी थी | लड़ाई का खर्च गुलाम भारत के करदाताओं ने भी उठाया | आज के हिसाब से देखा जाए तो यह रकम 150 अरब डॉलर से कम नहीं होगी | लेकिन न तो भारत ने कभी यह उधार वापस मांगा, न ही ब्रिटेन ने कभी इसकी कोई चर्चा की |

जर्मनी के तानाशाह एडोल्फ़ हिटलर ने एक सितंबर 1939 की सुबह पौने पांच बजे पोलैंड पर अकारण हमला कर जब द्वितीय विश्वयुद्ध छेड़ा था, तब भारत अंग्रेज़ों का उपनिवेश था | भारत का इस युद्ध से कुछ लेना-देना नहीं था | तब भी उसे बहुत कुछ देना पड़ गया | दो ही दिन बाद तीन सितंबर को दिन में 11 बजे ब्रिटेन ने और पांच बजे फ्रांस ने भी जर्मनी के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी | दोनों देश पोलैंड की स्वाधीनता के संरक्षक थे | इसी दिन भारत की ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार की ओर से वाइसरॉय लॉर्ड लिनलिथगो ने कांग्रेस पार्टी और मुस्लिम लीग के नेताओं और देश की जनता को बताया कि भारत भी जर्मनी के विरुद्ध युद्ध की स्थिति में है, उसे ब्रिटेन के हाथ मज़बूत करने होंगे |

जवाहरलाल नेहरू और महात्मा गाँधी ने भारत पर थोपी गई इस एकतरफा युद्ध-घोषणा का ज़ोरदार विरोध किया | उनका कहना था कि ब्रिटेन यदि भारतीय जनता का समर्थन चाहता है तो उसे पहले बताना होगा कि युद्ध खत्म होने के  बाद भारत के प्रति उसके 'लक्ष्य और आदर्श'  क्या होंगे | दरअसल ब्रिटिश सरकार प्रथम विश्व युद्ध के समय भी स्वतंत्रता का प्रलोभन देकर भारत को युद्ध में घसीट चुकी थी | कांग्रेस के नेता फिर किसी झांसे में नहीं आना चाहते थे |

25 लाख भारतीय ब्रिटेन के लिये लड़े :- ब्रिटेन का साथ नहीं देने की नेहरू-गाँधी की नीति और 1942 में महात्मा गाँधी के 'अंग्रेज़ों भारत छोड़ो' आंदोलन के बावजूद भारत के 25 लाख से अधिक लोग ब्रिटिश सेना में भर्ती हो कर अलग-अलग एशियाई, यूरोपीय और अफ्रीकी मोर्चों पर लड़े | 30 अप्रैल 1945 को हिटलर द्वारा बर्लिन के अपने बंकर में आत्महत्या कर लेने के एक ही सप्ताह बाद आठ मई को जर्मन सेना 'वेयरमाख़्त'  के तीन उच्च कमांडरों ने बिना शर्त आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए | इसके साथ ही यूरोप में युद्ध का अंत हो गया | लेकिन एशिया में लड़ाई तब तक चलती रही जब तक छह अगस्त 1945 को हिरोशिमा और नौ अगस्त को नागासाकी पर गिरे अमेरिकी परमाणु बमों ने जापान को तीन सितंबर 1945 के दिन विधिवत आत्मसमर्पण करने पर विवश नहीं कर दिया |

द टेलीग्राफ में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि युद्ध का अंत होते-होते ब्रिटेन पर कुल तीन अरब पाउंड-स्टर्लिंग का जो कर्ज चढ़ गया था उसमें 1.24 अरब की रकम भारत से आई थी |

यह युद्ध तब तक 24,348 भारतीय सैनिकों के प्राणों की भी बलि ले चुका था | 64,354 घायल हुए और 11,754 का कोई पता नहीं चला | जापान में रासबिहारी बोस, जर्मनी में नेताजी सुभाषचंद्र बोस और मलाया-सिंगापुर में कैप्टन मोहन सिंह ने ब्रिटिश सेना से पलायन करने वालों या जापानियों और जर्मनों द्वारा युद्धबंदी बनाये गये भारतीय सैनिकों को मिला कर लगभग 40 हज़ार सैनिकों की एक 'आज़ाद हिंद फ़ौज़' बनाई थी | यह फौज नेताजी बोस के नेतृत्व में अंग्रेज़ों से लड़ते हुए भारत की पूर्वी सीमा तक पहुंच गयी थी | ये फ़ौज़ी तब तक लड़ते रहे, जब तक जापान ने अमेरिकी परमाणु बमों की मार से हार कर घुटने नहीं टेक दिये |

खर्च भारत के मत्थे :- 1914 से 1918 तक चले प्रथम विश्वयुद्ध की तरह दूसरे विश्वयुद्ध के समय भी भारतीय सैनिकों की संख्या सभी मित्र राष्ट्रों के सैनिकों के बीच सबसे अधिक थी | इस बार भी इन सैनिकों के खाने-पीने, अस्त्र-शस्त्र और लड़ने का सारा ख़र्च गुलाम भारत के करदाताओं को उठाना पड़ा | उस समय ब्रिटिश मुद्रा पाउन्ड-स्टर्लिंग के कुल भंडार का एक-तिहाई भारत के पास हुआ करता था | ब्रिटेन की सरकार ने उसमें से जो धन निकाला या उधार लिया, उसे कभी नहीं लौटाया | स्वतंत्र भारत की सरकारें इतनी दानवीर निकलीं कि उन्होंने इस पैसे का न कभी हिसाब-किताब मांगा और न ही कभी इसे लौटाने की बात की | द टेलीग्राफ में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि युद्ध का अंत होते-होते ब्रिटेन पर कुल तीन अरब पाउंड-स्टर्लिंग का जो कर्ज चढ़ गया था उसमें 1.24 अरब भारत से आया था | आज के हिसाब से देखा जाए तो यह आंकड़ा 150 अरब डॉलर से कम नहीं होगा |

इस प्रसंग में इस समय कर्ज के बोझ से कराह रहे यूनान (ग्रीस)  का उदाहरण लिया जा सकता है | उसका जर्मनी के साथ एक प्रमुख झगड़ा यह है कि द्वितीय विश्वयुद्ध के समय जर्मनी ने यूनान पर क़ब्ज़ा करके वहाँ के राष्ट्रीय बैंक से ज़बरदस्ती जो उधार लिया था, उसे आज तक लौटाया नहीं | इस उधार और युद्ध के कारण हुए नुकसान को यूनानी वित्त मंत्रालय आज 279 अरब यूरो के बराबर बताता है | जबकि यूनान पर आज जो बाहरी कर्ज है, वह कुल मिलाकर 240 अरब यूरो के बराबर है | दूसरे शब्दों में, जर्मनी यदि वह क्षतिपूर्ति कर दे तो यूनान अपने सारे ऋणभार से मुक्त हो जाये |

भारत में विदेशी बैंकों में रखे काले धन को लेकर चौतरफ़ा गुहार तो है, पर दूसरे विश्वयुद्ध में ब्रिटेन ने गुलाम भारत से जो उधार लिया उसे लौटाने की बात कभी किसी ने नहीं की|

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और जर्मनी में रहते हैं)
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