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Tejaram Dewasi
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🙏🌹जय श्री महाकाल🌹🙏
श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का आज का भोग आरती श्रृंगार दर्शन
25 जून 2017 ( रविवार )
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🌼 जय जगन्नाथ🌼
🌼 जय बलभद्र 🌼
🌼 जय सुभद्रा 🌼
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✨Happy Shri Jagannath Rath Yatra 2016✨


जबते मोहि जगन्नाथ दृष्टि परो माई ।
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अरुण खम्भ गरुङ खम्भ सिन्धु पोर झांई ।
मन्दिर की शोभा कछु वरणी न जाई ।।
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मंगल को दरस देख आनन्द हो जाई ।
जय जय श्री जगन्नाथ सहोदर बलभाई ।।
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थाल भोग लगाने की बिरियाँ जब आई ।
उखड़ा और दूध भाग प्रभुजी ने खाई ।।
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महाप्रसाद भोग खात आरती सजाई ।
अपने प्रभु नासिका पर मोतिन लटकाई ।।
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बीच में सुभद्रा सोहे दाहिने बल सोहाई ।
बाएँ हाथ लक्ष्मी छवि वरणी हू न जाई ।।
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मार्कण्डेय वट कृष्ण रोहिणी सुखदाई ।
इन्द्रदमन स्नान करत पाप सब नसाई ।।
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महोदधि चक्र तीरथ गंगा गति पाई ।
मीरा के प्रभु जगन्नाथ चरणन बलि जाई ।।

________________भक्तिमति मीराबाई

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सती की किस भुल के कारण भोलेनाथ और सती का पति-पत्नी के रूप में मिलन नहीं हुआ
भगवान शिव और सती माता पृथ्वी पर भ्रमण करते हुए महर्षि अगस्त्य के आश्रम में गए और उनके मुख से रामकथा सुन कर आत्म विभोर हो उठे। कुछ दिन वहां रहने के बाद भगवान शिव और सती माता वापस कैलाश की ओर चल पड़े।
कैलाश की ओर जाते हुए भगवान शिव विचार कर रहे थे कि किस प्रकार प्रभु श्री राम के दर्शन किए जाएं? तभी दंडकवन से गुजरते हुए उनकी दृष्टि श्री राम और लक्ष्मण पर पड़ी। रावण माता सीता का हरण कर ले गया था। श्री राम और लक्ष्मण सीता जी की खोज में भटक रहे थे। भगवान शिव उनके दर्शन कर भाव विभोर हो गए उचित समय न जानकर उन्होंने उन्हें अपने असली रूप से साक्षात्कार नहीं करवाया।
 

माता सती के मन में श्री राम के प्रति संदेह उत्पन्न हुआ। उन्होंने सोचा अगर यह सच में भगवान श्री हरि विष्णु का ही रूप हैं तो अपनी पत्नि ती खोज में दर दर क्यों भटक रहे हैं? भगवान् शिव माता सती के अंतर्मन में क्या चल रहा है जान गए।
 

उन्होंने माता सती से कहा,‘‘देवी ! यदि आपके मन में प्रभु श्री राम को लेकर कोई संदेह है तो आप उनकी परीक्षा ले सकती हैं।’’
 

माता सती ने माता सीता का रूप धारण कर लिया और श्री राम के समीप चली गई। श्री राम ने उन्हें प्रणाम किया और बोले-‘‘माता ! आप वन में अकेले ? भगवान शिव कहां हैं ?’’
 
श्री राम के उनके वास्तविक स्वरूप को जान उन्हें बड़ी आत्मग्लानि हुई और वे वापस भगवान् शिव के पास चल पड़ीं। वे जिधर भी रूख करती उधर ही उन्हें श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी एक साथ खड़े दिखाई देते और भगवान शिव, जगत पिता ब्रह्मा, इंद्र सप्तर्षियों आदि को श्री राम की चरण वंदना करते देखती। श्री राम की रची माया को देखकर वे डर गईं और सहम कर वहीं आंखे बंद करके बैठ गई।
 

कुछ समय उपरांत उन्होंने डरते डरते आंखे खोली तो सारी माया का अंत हो चुका था। वह पुन भगवान शिव के पास पंहुची तो उन्होंने पूछा," ले आई श्री राम की परीक्षा?"
 
माता सती ने झूठ बोल दिया कि," उन्होंने कोई परीक्षा नहीं ली।"
 

भगवान् शिव ने ध्यान लगाकर सारी बात जान ली। उन्होंने भगवान् श्री राम की माया को प्रणाम किया जिससे प्रेरित होकर सती के मुख से झूठ निकल गया था।
 

सती ने सीता जी का वेश धारण किया, यह जानकर शिवजी के मन में विषाद उत्पन्न हो गया। उन्होंने सोचा कि यदि अब वे सती से प्रेम करते हैं तो यह धर्म विरुद्ध होगा क्योंकि सीता जी को वे माता के समान मानते थे परंतु वे सती से बहुत प्रेम करते थे, इसलिए उन्हें त्याग भी नहीं सकते थे। तब उन्होंने मन ही मन प्रतिज्ञा की कि अब पति-पत्नी के रूप में उनका और सती का मिलन नहीं हो सकता परन्तु इस बारे में उन्होंने सती से प्रत्यक्ष में कुछ नहीं कहा। तत्पश्चात वे कैलाश लौट आए।

 

परीक्षा ली भी ताे क्या हुआ इसमें भगवान श्री राम जी का दर्शन ही ताे किया था ना परन्तु भगवान ने युग काे यह संदेश देने के लिए ही ताे फिर सती माता के जीवन की कथा में माेड़ दिया। भगवान भाेले नाथ एवं सती माता ने अपने जीवन पर इस कथा काे घटाकर यही ताे संदेश दिया है कि नारी का प्रथम धर्म है- पति व्रत धर्म का पालन करना। अपने पतिदेव की अधीनता एवं आज्ञा में रहना। अपने प्रथम वर्ष अपने सहज धर्म का पालन करना। इसे छाेड़कर भगवान के भी दर्शन करने जाएं ताे वह भगवान काे स्वीकार नहीं।
 
सती माता ने वह शरीर त्यागा तथा फिर पार्वती बनकर अपने प्रियतम भगवान भूतनाथ की सेवा के अलावा काेई कामना नहीं रखी। राजमहलाें के ऐश्वर्य काे ठुकरा दिया तथा अभावाें में रहकर सदैव के लिए पार्वती जी भगवान शंकर की अर्धांगिनी बनकर फिर युग-युगान्तर तक अपने सहज धर्म का पालन करती रही।
 

भगवान भाेलेनाथ जी के पास चाहे संसार के कृत्रिम सुख-सुविधाआें ऐश्वर्य का अभाव है परन्तु उनके पास प्रकृतिरूपी परमेश्वरी पार्वती जी सदा-सदा से निवास करती है अब क्याेंकि भगवान के पास भाव है-ब्रह्मभाव है। सच्चा, अच्छा आैर युग के अनुरूप प्रथम धर्म-सहज धर्म के पालन का सहज भाव है तभी ताे भगवान भाेलेनाथ भक्ताें पर बड़ी जल्दी प्रसन्न हाे जाते हैं क्याेंकि भक्ताें का कल्याण करना भगवान का सहज धर्म है।
 
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ऋतु चक्र का प्रवर्तक 👉 सूर्य
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सूर्य जब आर्द्रा नक्षत्र मे प्रवेश करता है तभी से औपचारिक रूप से वर्षा ऋतु का प्रारंभ माना जाता है । भारतीय पंचांग कार प्रतिवर्ष आर्द्रा प्रवेश कुण्डली बनाकर भावी वर्षा की भविष्यवाणी करते है । आर्द्रा से 9 नक्षत्र पर्यन्त वर्षा का समय माना जाता है ।

मेदिनीय सिद्धान्त के अनुसार 27 नक्षत्रो को दो होरा नक्षत्रों मे विभाजित किया गया है -

चंद्र नक्षत्र 🌙 अश्विनी भरणी कृतिका आर्द्रा पुनर्वसु पुष्य आश्लेषा मघा पूर्वाषाढ़ा उत्तराषाढ़ा श्रवण धनिष्ठा रेवती पूर्वाभाद्रपद

सूर्य नक्षत्र 🌞 रोहिणी मृगशिरा पूर्वाफाल्गुनी उत्तराफाल्गुनी हस्त स्वाति विशाखा अनुराधा ज्येष्ठा मूल शतभिषा ।

इसमे सिद्धांत यह दिया गया है कि जब सूर्य चंद्र के होरा नक्षत्र मे प्रवेश करे तो वृष्टि होती है । और सूर्य स्वयं के होरा नक्षत्र मे प्रवेश करे तो वृष्टि नही होती ।

सूर्य जब वृषभ राशि मे रोहणी नक्षत्र मे प्रवेश करता है उस दिन से लेकर 9 दिनो तक धरती का ताप मान सर्वाधिक रहता है क्योंकि सूर्य स्वयं अपने होरा नक्षत्र मे होता है । और इस काल को ही भूतपन काल (नवतपा)कहा जाता है ।

ज्येष्ठ मासे सितेपक्षे आर्द्रादि नवतारका
सजला निर्जला गेया निर्जला सजलास्तथा

उक्त श्लोक मे यह कहि भी नही कहा गया है आर्दा से 9 नक्षत्र मे नवतपा होता है बल्कि यह श्लोक वर्षा विचार खंड सूर्यसिद्धांत और नारद पुराण से लिया गया है । इसमे यह बात स्पष्ट किया गया है कि यदि ज्येष्ठ मास मे उक्त 9 नक्षत्रो मे वृष्टि होती है तो वर्षा ऋतु मे उन 9 नक्षत्रो मे वर्षा नही होता तथा इसका विपरित भी उतना ही सही है ।

लेकिन पंचांग मे इस श्लोक को अधूरा प्रस्तुत कर उसका अर्थ ही बदल दिया गया है इस श्लोक का पूर्ण रूप यह है -

दशार्द्राद्या स्त्रियस्तारा विशाखाद्यानपुसंकाः ।
तिस्त्रस्त्रियश्च मूलाद्या पुरूषाश्च चतुर्दश: ।।
स्त्रीपुंसयोर्महावृष्टि स्त्री नपुसंकयो: क्वचित् ।
स्त्री स्त्री शीतलच्छाया योगे पुरूषयोर्न च ।।
ज्येष्ठ मासे सितेपक्षे आर्द्रादि नवतारकस्तथा ।
सजला निर्जला गेया निर्जला सजलास्तथा ।।

आर्द्रा से लेकर 10 नक्षत्र स्त्री है विशाखा से तीन नक्षत्र नपुंसक है मूल से 14 नक्षत्र पुरुष है इस प्रकार यदि स्त्री नक्षत्र पर चंद्रमा हो और सूर्य पुरुष नक्षत्र में आवे तो वर्षा होती है तथा सूर्य स्त्री और नपुंसक नक्षत्र में हो तो वर्षा थोड़ी होती है । सूर्य और चंद्रमा दोनों स्त्री नक्षत्रों पर हो तो मेष छाया रहता है वर्षा नहीं होती । यदि दोनों पुरुष नक्षत्रों में हो तो भी वर्षा नहीं होती तथा ज्येष्ठ मास मे आर्द्रादि 9 नक्षत्रो मे वृष्टि होती है तो वर्षा ऋतु मे उन 9 नक्षत्रो मे वर्षा नही होता तथा इसका विपरित भी उतना ही सही है ।

अतः सूर्य जिस दिन रोहणी नक्षत्र मे प्रवेश करता है उसी दिन से 9 दिन पर्यन्त नवतपा माना जाता है।
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🌹🌞🌹🌞ॐ जय सुर्या देव ॐ 🌞🌹🌞🌹
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आज हमसब फादर्स डे मना रहे, सबसे पहले उन फौजी भाइयो के बेटा बेटियां को शुभकामनाये जिसने भारत माता के लिए क़ुरबानी दी है।और उनको शुभकामनाये जिनके पिता आज सीमा पर भारत माता की और हमारी रक्षा कर रहे है।

Happy father's day

जय हिन्द।
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खूब लडी मर्दानी वो झांसी वाली रानी थी,रानी लक्ष्मी बाई की पुण्यतिथि पर नमन ।।
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राष्ट्रभक्त @sudhirchaudhary जन्मदिन की ढेरों बधाइयाँ
आप निरन्तर आगे बढ़े भारत को शीर्ष पे ले जाए व विश्वगुरु बनाए
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