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Vijuy Ronjan
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अँधेरे की पाँखें ...
मील भर चल कर - अँधेरें ने पाँखें फैला दी, और थकी हुई सी जलती बुझती आँखें - धुँए में लिपट सी गई... एक सन्नाटे का चुप - हज़ार झरनों के फुहारों में बज उठा। अक्सर मैंने - ख़ुद को अकेले ही से जूझते देखा है... और जब थक जाता है यह अकेलापन, तो तूलिकायें बोलने लगती ...

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दृष्टिकोण
तुम्हारी आँखें- मुझे देखती नहीं... वरन मुझसे ही देखती हैं, मैं तुम्हारी दृष्टि हूँ - और तुम मेरा दृष्टिकोण। - नीहार ******************* कुछ बुझे हुये दीपक ,  जले हुये पतिंगों की राख- मेरी हथेलियों पर, सूरज ने सुबह सुबह-  ये कविता लिख दी । -नीहार *******...

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कविता १
तुम झोलियाँ भर भर ख़ुशियाँ बाँटती हो- मुट्ठी मुट्ठी  मैं संभालता हूँ उन्हें ... और , फिर भी मेरे हाथ - कुछ नहीं लगता... ख़ुशियाँ रेत हो कब, मुट्ठी से सरक जाती- पता ही नहीं चलता... मैंने सीखा है - ख़ुशियों को संभालने की ज़रूरत नहीं ... बस उन पलों को भरपूर जी...

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गज़ल
दर्द जब हद से गुजर जाता है, आँख में बादल उतर आता है। मुसाफिर है नहीं बसर उसका, थक जाता है तो घर जाता है । उसकी आँखों में झाँक देखो, लहराता समंदर नजर आता है। धूप में तप के सोना हो गया, इस तरह वो निखर जाता है । हरसिंगार सा है खिला लेकिन, हल्के हवा में भी झड़ ...

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नदी बहती रही ,
अनवरत -
उम्र बीतता रहा,
सतत -
सभ्यता शेष होती गयी,
बच रहे अवशेष -
मनुष्यता ,
शायद कभी -
यहाँ पायी जाती थी ....
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पत्ते -
हवा में तिरते रहे देर तक...
फिर जब थक गये,
तो जमीं पे गिरकर -
मिट्टी हो गये...
जिन्दगी यही है,
मिट्टी हो जाना ।
----------------------
सुबह -
खिलते फूलों को गाते देखो...
भौंरों का कोरस सुनो-
और ,
खुशबुओं की धड़कन गिन लो -
जिन्दगी का सुर ताल ,
बस यही है ।
~ नीहार 

अब खत मुझे लिखने की आदत डाल लो,
और फिर भेजने को कुछ कबूतर पाल लो ।

मोती हूँ बेशकीमती मैं ये सब लोग कह रहे,
मुझको पाना हो तो बस सीपियाँ खंगाल लो।

मैं तो हूँ इक आदमी मोम का पिघला हुआ ,
जिस शक्ल में जब भी चाहो मुझे तुम ढ़ाल लो।

यहाँ हर सड़क पर हर तरफ काई बिछी है ,
साथ मेरे तुम चलो और गिरने से संभाल लो।

कई दिनों से किसी ने मेरा हाल न है पूछा ,
दोस्त के नाते ही सही आ के मेरा हाल लो ।

नीहार जिन्दगी में सिर्फ उत्तर ही बना रहा,
तुम कभी उसके लिये कुछ तो सवाल लो ।
~ नीहार ( चंडीगढ़, २७ मई २०१४ )



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