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Sushil Swatantra
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चौथी दुनियाँ में प्रकाशित मेरी दो कविताएँ
चौथी दुनियाँ में प्रकाशित मेरी दो कविताएँ अंक: 21-27 दिसम्बर 2015 1. मुठभेड़ ======= कंधे पर दुनाली रखते हुए कुछ तो सोचा होगा तुमने माँ के बुझे हुए चेहरे को देखकर पिता की पथराई आँखें देखकर भाई के शरीर पर उभरे हड्डियों को देखकर अत्याचारियों की हंसी देखकर दुपट...

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मेरा पहला कविता संग्रह "संभावनाओं का शहर"
साथियों, मेरा पहला कविता संग्रह "संभावनाओं का शहर" अब आपके सामने है| Raja Deori  भाई का बेहतरीन पेंटिंग के लिए आभार व्यक्त करता हूँ| उनकी पेंटिंग ने मेरे कविता संग्रह "संभावनाओं का शहर" के आवरण को सजीव बना दिया | शब्दारंभ प्रकाशन  से यह किताब आई है | इसके ल...

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भीड़तन्त्र में अख़लाक़
तुम्हीं तो थे जिसको माँ के गर्भ से तलवार घोंपकर बहार निकाला गया था कबाब के माफिक भुना गया था तुम्हें याद है अख़लाक़ तेरह बरस पहले भी मीनारों, मेहराबों और गगनचुम्बी पताकों में दादरी सा मनहूस सन्नाटा पसर गया था हाशिमपुरा, गुजरात, मुजफ्फरनगर, मेरठ, त्रिलोकपुरी औ...

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तुम्हारी ऊँगली पकड़कर
तुम्हारे हाथों से पैदा हुए कोयला खदानों पर भागते-दौड़ते बच्चे जब तुम्हें चाची कह कर पुकारते होंगे पूरे कोयलांचल की कालिमा तुम्हारे मातृत्व-भाव से लाल हो जाती होगी  घर से ड्यूटी रूम का फासला तुम्हारे घुटने के दर्द को नापने का पैमाना रहा है घर पर बच्चों को छोड़...

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प्रभात ख़बर में मेरी दो कविताएँ प्रकाशित हुई हैं  | आप भी पढ़िए ...

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11 मई 2014 को प्रभात ख़बर में छपीं मेरी दो कविताएँ
प्रभात ख़बर में 11 मई 2014 को मेरी दो कविताएँ छपीं हैं | निम्न लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है |   http://epaper.prabhatkhabar.com/270481/Ravivaar/Raviwar#dual/4/3 http://epaper.prabhatkhabar.com/c/2825190 

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ताकि इसी बहाने में बचा रहूँ
उम्मीद से लिपटी हुई सुबहों  और हताश शामों के बीच रोज कुछ ऐसा घटित जो रहा है जो मुझे जीवन के और करीब ला रहा है खत्म होती संवेदनाओं की धरती से बस एक कंकड़ चुरा कर रख रहा हूँ रोज ताकि इस जमीन के अवशेष से फिर रच सकूँ एक नई धरती ताकि इसी बहाने में बचा रहूँ विध्वं...
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