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Rahul Hemraj
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और कोई ऑप्शन ही नहीं था!
उसने अपनी बात खत्म करते हुए कहा, " और मेरे पास ऑप्शन ही क्या था?" और जैसे झटका लगा! क्या सचमुच उसके पास कोई ऑप्शन नहीं था? दोस्तों की नजर से तो उसने फटे में टाँग डाली थी। झगड़ा कामवाली बाई और उसके पति के बीच का था। रोजाना मारपीट करता, पैसे छीनता और उसकी शरा...

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मैं और मेरा जेबखर्च
बच्चे अपनी जेबखर्च का पैसा कितना सम्भल-सम्भल कर खर्च करते है ​, बिल्कुल ​ ​ सिलसिलेवार। सबसे पहले वो जो उन्हें कब से चाहिए थी, फिर उसी क्रम में दूसरी और फिर तीसरी। वे और किसी बात के बारे में नहीं सोचते ये तय करने से पहले। ​ पर ये भी कि वे अपने किसी भाई-बहन ...

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और मुसीबत टल गयी
जस्टिन बीबर आए और चले गए और मुझे मुसीबत में डाल गए। ये मुसीबत जब तब पहले भी खड़ी हुई है लेकिन लगता है इस बार हल हुए बिना ये टलने वाली  नहीं । और मुसीबत ये कि क्या हम जैसों को ऐसे कॉन्सर्ट में शरीक होना चाहिए? हम जैसों का मतलब, चाहे हमारे पास कितने भी पैसे ह...

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जीने की स्टाइल
बात निकल पड़ी थी कि क्या आक्रामकता और क्रोध यानि एग्रेशन और एंगर में कोई फर्क है? मौका था पिछले महीने के पहले रविवार की हमारी नियमित बैठक का। विषय था क्रोध, क्या है और कैसे सम्भालें?  मसला नाजुक था और सब ही को छू रहा था लेकिन अपने-अपने नजरिए से सब ही ने कहा...

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बड़ी दूर तक जाता है ये
दिल्ली से जयपुर का सफर था, ट्रेन रवाना होने को थी कि एक भाई साहब भागते-दौड़ते पहुँचे। कूपे की छः बर्थ के हम पाँच मुसाफिर पहले से बैठे थे और थोड़ी-थोड़ी गप्पें लगना शुरू हो गयीं थी। बातों का सिलसिला जारी रखते हुए, हम थोड़ा खिसके कि वे भी बैठ जाएँ। हमें कहाँ ...

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शिकायत जरुरी
बहुत बड़े संयुक्त परिवार के मुखिया हैं वे। गर्व और संतुष्टि के भाव से बता रहे थे, "मैंने तो अपने परिवार की सारी लड़कियों को विदा करते समय ही कह दिया था, बेटा! कभी अपने ससुराल से कोई शिकायत लेकर मत आना। और सभी ने आज तक तो मेरी बात रखी है।" कई लोग थे हम, किसी...

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पूजा के फूल
पहाड़ी गाँव में रहती थी वो। रोजाना सुबह झरने से पानी लाना उसकी दिनचर्या का हिस्सा था। एक गडरिए की तरह दोनों कन्धों पर एक लाठी और दोनों सिरों पर एक-एक घड़ा। अकेली जान को दिन भर के लिए इतना पानी काफी होता था। पर, उसमें से एक घड़ा थोड़ा रिसता था जिसे वो हमेशा ...

सब कुछ हल नहीं करना होता और हर अनचाही स्थिति समस्या नहीं होती।

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खेल-खेल में
आज ही तो मिला था उसे खिलौना, और उसने पूरा खोल दिया था उसे। अब लगा था अस्थि-पंजर जोड़ने। ऐसा वो ही नहीं सारे बच्चे ही करते हैं। वे अचम्भित होते हैं उसे बजता, कूदता, नाचता देख और फिर रह नहीं पाते कि ये होता कैसे हैं? नतीजा, तितर-बितर हो जाता है वो बेचारा। बहु...

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इसमें उसकी कोई गलती नहीं
काम पड़ गया था उससे फिर एक बार। हर बार सोचता था अब कभी इससे दिमाग नहीं लगाऊँगा, लेकिन हर बार स्थितियाँ ऐसी बनती कि अन्ततः अपने आपको उससे बात करते पाता। इस बार फोन पर उधर से आ रही आवाज में एक विश्वसनीयता झलक रही थी, और अन्त तो इस तरह हुआ कि, "जो भी होगा मैं ...
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