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manoj kumar meena
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श्री हनुमच्चरित्र वाटिका
( ५७ )
कुंभकर्ण के मारे जाने पर रावण अत्यन्त शोकमग्न हो गया ! तथा आर्त होकर उच्च स्वर से रोने लगा ! हाय ! मेरी दाहिनी भुजा गिर गयी ! अब मैं संसार में कैसे जीऊँ ?

उसने देवता, यक्ष तथा नागों को जीत लिया था! स्वर्गाधिपति इन्द्र भी उसके सामने युद्ध नहीं कर पाया !

इससे पहले वह युद्ध में जहाँ भी भेजा गया कभी भी पराजित नहीं हुआ था लेकिन वही कुंभकर्ण चीटियां जिस प्रकार हाथी को मार दें उसी प्रकार मनुष्य, वानर और रीछों द्वारा मारा गया !

मैं समझता हूँ कि ईश्वरेच्छा साथ न दे तो कितना भी बड़ा बल सफलता का हेतु नहीं बन सकता है ! हाय ! ये कैसी काल की विडम्बना है कि वह अनन्त शौर्य वाला कुंभकर्ण शान्त हुआ ऐसी बात मैं सुन रहा हूँ !

कुछ लोग कहते हैं कि सैन्य सहित खरदूषणों को मारने वाला राम, विष्णु ही है ! हाय उसीने मुझ रावण को रूलाने के लिये मेरे अनुज को मार डाला है ! हाय मैं मारा गया !

उसी प्रकार देवताओं को जीतने वाले अनेक राक्षसों के होते हुए भी भगवान शंकर के समान जिसने मेरा पुर जलाया, उसी हनुमान ने मेरे भाई का महान शूल तोड़ डाला तथा उसे हताश कर डाला !

मेरे भाई के वध के कारण ये ही दोनों हुए हैं और तीसरा कोई नहीं ! हाय मुझे मृत्यु के समान दुख देने के लिए ये दोनों कहाँ से आ गये हैं !

भाई के बिना मेरे जीने से क्या लाभ ? अब किंकर्तव्य विमूढ़ हुए मुझको युद्ध में देह त्याग देना चाहिये ! हाय ! हा भैय्या ! तुम कहाँ हो ? मुझे यहाँ शोक समुद्र में डुबाकर कैसे चले गये ?

हे पाठकगण, यह बताईये कि हनुमान जी की कृपा का पात्र हुए रावण को शोक कैसे हो सकता है ? कर्मयोग में सिद्धि को प्राप्त हुए रावण ने तनिक भी शोक नहीं किया था !

किसी भी मुख्य योद्धा के मरने पर रावण दसों मुखों से महान शोक करता था ! तथा उसका वह शोक देखकर स्वाभाविक ही दूसरा योद्धा युद्ध के लिए उत्साहित हो जाता था !

युद्ध के परिणाम ठीक नहीं हैं यह देखकर राक्षसों ने पराभव निश्चित है, यह स्पष्ट अनुभव किया और इसलिए वे अपनी सदगति के लिए वीर मृत्यु के लोभी होकर क्रमश: स्वयं ही युद्ध के लिए जाते थे !

शोक के निमित्त से रावण ने अपने अत्यन्त गूढ़ अर्थ से युक्त समुचित शब्दों द्वारा सभी राक्षसों को उसी यथार्थ दृष्टी को बताया जिसको पहले मेघनाथ को उसने बताया था !

उसी दृष्टी को जो धर्मनिष्ठ थे तथा जो झुठ से डरते थे उन्हीं अधिकारियों ने जाना तथा अन्य राक्षसों ने रावण को अत्यन्त शोकमग्न देखकर अपनी सहानुभूति व्यक्त की !

अस्तु रावण के महान शोक देखकर उसके कुछ भाई तथा पुत्र साँप के समान उत्तेजित हुए और या तो जय प्राप्त करेंगे नहीं तो मृत्यु को वरण करेंगे ऐसा निश्चय करके रण में चले गये !

उस समय देवान्तक, त्रिशिरा, नरान्तक तथा अतिकाय ये चार रावण पुत्र एवं मत्त और महोदर ये दो रावण के भाई अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्ध करने के लिए रण में चले गये !

रावण के पुत्र नरान्तक को अंगद ने मार डाला तत्पश्चात अतिकाय और लक्षमण जी भिड़ गये ! उस भिड़न्त में असुर मारा गया ! नील ने महोदर का काम तमाम कर दिया ! तथा महाउद्यमी रिषभ ने महोदर के भाई मत्त को यमधाम भेज दिया !

तब तक हनुमान जी ने देवान्तक और त्रिशिरा इन दोनों रावण के पुत्रों को मार डाला ! ये दोनों भाग्यवान राक्षस हनुमान जी के पुण्यकरों से मुक्ति को प्राप्त हुए !

उन सबके मारे जाने पर रावण ने पुन: अत्यन्त शोक व्यक्त किया ! तब इन्द्रजीत ने उसे प्रणाम करके कहा कि हे पिताजी ! आज मैं रण में आपका प्रिय कार्य करूँगा !

तब उस विग्य असुर ने ब्रह्मास्त्र प्राप्ति के लिए विधिवत हवन किया तथा ब्रह्मास्त्र मन्त्र से अपना रथादि साधन भी अभिमन्त्रित करके वह युद्ध के लिए चला गया !

तब उस यशोलोलुप ने वानरों को मारने के लिए उस ब्रह्मास्त्र का आवाहन किया ! वह ब्रह्मास्त्र जब प्रकट हुआ तब सम्पूर्ण भूमण्डल अस्त्र की दीप्ति से डर गया तथा बेचैन हो गया !

तब रण में वह अदृश्य होकर अपने रथ घोड़े और अस्त्रों सहित आकाश में गया ! और वहीं से ब्रह्मास्त्र मन्त्र से अभिमन्त्रित भयंकर तीक्ष्ण बाणों की वर्षा करने लगा !

रामचन्द्र जी अपने शरीर पर बाणों की वर्षा झेल रहे थे ! उसी प्रकार लक्षमण जी भी शान्ति से उसे सहन कर रहे थे ! बेचारे वानर हाय ! हाय ! करने लगे ! कुछ तो भय के मारे वहीं ढेर हो गये जहाँ बैठे थे !

कपियों में जो बलवान थे वे हाथ में वृक्ष तथा पर्वत शिखर लेकर आकाश में गये परन्तु वे मेघनाथ को देख नहीं पाये अत: निराश होकर व्यथित मन से लौट आये !

हनुमान जी ने रामचन्द्र जी के यश की तरफ देखकर रावण, मेघनाथ तथा कुंभकर्ण पर कभी भी घातक प्रहार नहीं किया था !

हनुमान जी मुझपर प्रहार नहीं कर रहे हैं यह देखकर दुष्ट मेघनाथ ने समझा कि मैं उत्तम वर प्राप्ति के प्रभाव से सुरक्षित हूँ ! अत: उसने हनुमान जी को कुछ भी नहीं समझा तथा उसके ह्रदय में पुन: विजयाशा उत्पन्न हुई !
क्रमश:
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हरि सुमरन से हरि मिलें करो पूरा विश्वास !
कुछ दिन में हो जाओगे तुम दुनियां में खास !!
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श्री हनुमच्चरित्र वाटिका
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उसने देवता, यक्ष तथा नागों को जीत लिया था! स्वर्गाधिपति इन्द्र भी उसके सामने युद्ध नहीं कर पाया !

इससे पहले वह युद्ध में जहाँ भी भेजा गया कभी भी पराजित नहीं हुआ था लेकिन वही कुंभकर्ण चीटियां जिस प्रकार हाथी को मार दें उसी प्रकार मनुष्य, वानर और रीछों द्वारा मारा गया !

मैं समझता हूँ कि ईश्वरेच्छा साथ न दे तो कितना भी बड़ा बल सफलता का हेतु नहीं बन सकता है ! हाय ! ये कैसी काल की विडम्बना है कि वह अनन्त शौर्य वाला कुंभकर्ण शान्त हुआ ऐसी बात मैं सुन रहा हूँ !

कुछ लोग कहते हैं कि सैन्य सहित खरदूषणों को मारने वाला राम, विष्णु ही है ! हाय उसीने मुझ रावण को रूलाने के लिये मेरे अनुज को मार डाला है ! हाय मैं मारा गया !

उसी प्रकार देवताओं को जीतने वाले अनेक राक्षसों के होते हुए भी भगवान शंकर के समान जिसने मेरा पुर जलाया, उसी हनुमान ने मेरे भाई का महान शूल तोड़ डाला तथा उसे हताश कर डाला !

मेरे भाई के वध के कारण ये ही दोनों हुए हैं और तीसरा कोई नहीं ! हाय मुझे मृत्यु के समान दुख देने के लिए ये दोनों कहाँ से आ गये हैं !

भाई के बिना मेरे जीने से क्या लाभ ? अब किंकर्तव्य विमूढ़ हुए मुझको युद्ध में देह त्याग देना चाहिये ! हाय ! हा भैय्या ! तुम कहाँ हो ? मुझे यहाँ शोक समुद्र में डुबाकर कैसे चले गये ?

हे पाठकगण, यह बताईये कि हनुमान जी की कृपा का पात्र हुए रावण को शोक कैसे हो सकता है ? कर्मयोग में सिद्धि को प्राप्त हुए रावण ने तनिक भी शोक नहीं किया था !

किसी भी मुख्य योद्धा के मरने पर रावण दसों मुखों से महान शोक करता था ! तथा उसका वह शोक देखकर स्वाभाविक ही दूसरा योद्धा युद्ध के लिए उत्साहित हो जाता था !

युद्ध के परिणाम ठीक नहीं हैं यह देखकर राक्षसों ने पराभव निश्चित है, यह स्पष्ट अनुभव किया और इसलिए वे अपनी सदगति के लिए वीर मृत्यु के लोभी होकर क्रमश: स्वयं ही युद्ध के लिए जाते थे !

शोक के निमित्त से रावण ने अपने अत्यन्त गूढ़ अर्थ से युक्त समुचित शब्दों द्वारा सभी राक्षसों को उसी यथार्थ दृष्टी को बताया जिसको पहले मेघनाथ को उसने बताया था !

उसी दृष्टी को जो धर्मनिष्ठ थे तथा जो झुठ से डरते थे उन्हीं अधिकारियों ने जाना तथा अन्य राक्षसों ने रावण को अत्यन्त शोकमग्न देखकर अपनी सहानुभूति व्यक्त की !

अस्तु रावण के महान शोक देखकर उसके कुछ भाई तथा पुत्र साँप के समान उत्तेजित हुए और या तो जय प्राप्त करेंगे नहीं तो मृत्यु को वरण करेंगे ऐसा निश्चय करके रण में चले गये !

उस समय देवान्तक, त्रिशिरा, नरान्तक तथा अतिकाय ये चार रावण पुत्र एवं मत्त और महोदर ये दो रावण के भाई अत्यन्त क्रुद्ध होकर युद्ध करने के लिए रण में चले गये !

रावण के पुत्र नरान्तक को अंगद ने मार डाला तत्पश्चात अतिकाय और लक्षमण जी भिड़ गये ! उस भिड़न्त में असुर मारा गया ! नील ने महोदर का काम तमाम कर दिया ! तथा महाउद्यमी रिषभ ने महोदर के भाई मत्त को यमधाम भेज दिया !

तब तक हनुमान जी ने देवान्तक और त्रिशिरा इन दोनों रावण के पुत्रों को मार डाला ! ये दोनों भाग्यवान राक्षस हनुमान जी के पुण्यकरों से मुक्ति को प्राप्त हुए !

उन सबके मारे जाने पर रावण ने पुन: अत्यन्त शोक व्यक्त किया ! तब इन्द्रजीत ने उसे प्रणाम करके कहा कि हे पिताजी ! आज मैं रण में आपका प्रिय कार्य करूँगा !

तब उस विग्य असुर ने ब्रह्मास्त्र प्राप्ति के लिए विधिवत हवन किया तथा ब्रह्मास्त्र मन्त्र से अपना रथादि साधन भी अभिमन्त्रित करके वह युद्ध के लिए चला गया !

तब उस यशोलोलुप ने वानरों को मारने के लिए उस ब्रह्मास्त्र का आवाहन किया ! वह ब्रह्मास्त्र जब प्रकट हुआ तब सम्पूर्ण भूमण्डल अस्त्र की दीप्ति से डर गया तथा बेचैन हो गया !

तब रण में वह अदृश्य होकर अपने रथ घोड़े और अस्त्रों सहित आकाश में गया ! और वहीं से ब्रह्मास्त्र मन्त्र से अभिमन्त्रित भयंकर तीक्ष्ण बाणों की वर्षा करने लगा !

रामचन्द्र जी अपने शरीर पर बाणों की वर्षा झेल रहे थे ! उसी प्रकार लक्षमण जी भी शान्ति से उसे सहन कर रहे थे ! बेचारे वानर हाय ! हाय ! करने लगे ! कुछ तो भय के मारे वहीं ढेर हो गये जहाँ बैठे थे !

कपियों में जो बलवान थे वे हाथ में वृक्ष तथा पर्वत शिखर लेकर आकाश में गये परन्तु वे मेघनाथ को देख नहीं पाये अत: निराश होकर व्यथित मन से लौट आये !

हनुमान जी ने रामचन्द्र जी के यश की तरफ देखकर रावण, मेघनाथ तथा कुंभकर्ण पर कभी भी घातक प्रहार नहीं किया था !

हनुमान जी मुझपर प्रहार नहीं कर रहे हैं यह देखकर दुष्ट मेघनाथ ने समझा कि मैं उत्तम वर प्राप्ति के प्रभाव से सुरक्षित हूँ ! अत: उसने हनुमान जी को कुछ भी नहीं समझा तथा उसके ह्रदय में पुन: विजयाशा उत्पन्न हुई !
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