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आस-पास या पूरे सामाजिक परिवेश में हर क्षण स्वतःस्फूर्त घटित होती घटनाएं या वाक़यात किसी ख़ास व्यक्ति के इर्द-गिर्द ही घटित होते हों ऐसा तो नहीं ही है | सामाजिक संस्कृति में मानवीय संवेदनाओं से उत्पन्न होते ऐसे दृश्य दुनिया ज़हान में हर पल नज़र आते ही हैं | किन्तु सामाजिक रूप से गैर-जरूरी मानकर अनदेखी की जाने वाली इन उत्पत्तियों में, इंसानी ज़ज्बातों को झकझोर देने वाले इंसानी पहलुओं को पकड़ लेने की संवेदनशील दृष्टि ‘शक्ति प्रकाश’ के पास है | घटना या चरित्रों के अलावा सजीव भाषाई मौजूदगी के साथ, खूबसूरत रचनात्मक अंदाज़ में लेखकीय स्मृतियों की कोख से निकलती यह लघुकथाएं वर्तमान के लिए सम्पूर्ण सामाजिकता के सांस्कृतिक ताने-बाने का पुनर्पाठ हैं | – संपादक
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कश्मीर के ऐतिहासिक दस्तावेजों और संदर्भों से शोध-दृष्टि के साथ गुज़रते हुए “अशोक कुमार पाण्डेय” द्वारा लिखा गया ‘कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास’ आलेख की चौथी क़िस्त आज पढ़ते हैं | – संपादक

अली शाह के छोटे भाई शाही खान उसे सत्ता से अपदस्थ कर ज़ैनुल आब्दीन के नाम से गद्दी पर बैठा और उसने अपने पिता तथा भाई की साम्प्रदायिक नीतियों को पूरी तरह से बदल दिया. उसका आधी सदी का शासन काल कश्मीर के इतिहास का सबसे गौरवशाली काल माना जाता है. जनता के हित में किये उसके कार्यों के कारण ही कश्मीरी इतिहास में उसे बड शाह यानी महान शासक कहा जाता है. ज़ैनु-उल-आब्दीन का सबसे बड़ा क़दम धार्मिक भेदभाव की नीति का ख़ात्मा करना था. अपने पिता और भाई के विपरीत उसने हिन्दुओं के प्रति दोस्ताना रुख अपनाया और उन्हें धार्मिक स्वतंत्रता दी.
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‘स्त्री देह आज हाई टेक्नोलॉजी के माध्यम से विभिन्न तरीकों से मनोरंजन के साधन के रूप में उपलब्ध हो रही है। स्त्रीदेह का वस्तुकरण पुरानी मान्यताओं, नैतिकता के मानदंडों को ध्वस्त कर हर क्षेत्र में स्थापित हो रहा है। इक्कीसवीं सदी में व्यापार और सर्वव्यापी मीडिया के हाथों में वस्तु बनी स्त्रीदेह के सवालों ने स्त्री अधिकारों के लिये होने वाले विमर्शों को नया मोड़ दे दिया है। जैसे समलैंगिकता (लेस्बियनिज़्म) को देह की स्वायत्तता और अधिकार की परिधि में लाने की पैरोकारी अनेक नारीवादियों ने की है। इन सभी बहसों का स्वरूप और विस्तार भविष्य तय होगा।’

‘डा० नमिता सिंह‘ के द्वारा, स्त्री आन्दोलन के इस विस्तृत विमर्श को निरंतर किस्तों में प्रकाशित आलेख की ‘छटवीं क़िस्त’ के बाद अगली क़िस्त जल्द ही आप पढेंगे ….| – संपादक
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यूं तो कोई भी इतिहास सत्ता लौलुपताओं से उत्पन्न, वर्गीय संघर्षों से रक्त-रंजित, मानवीय त्रासदियों के बड़े दस्तावेज के रूप में ही मिलता है | कुछ इतिहास सभ्यताओं की तरह ज़मीदोज़ हैं, हो गये या फिर कर दिए गए, यह सब खुद इतिहास बनकर वक़्त की स्मृतियों में दर्ज है | वहीँ कुछ, स्मृतियों में तारीखों में होते रहे बदलावों, साजिशों, घटनाओं के साथ मानवीय अवशेषों को खुद में समेटे आज भी अनिर्णीत रूप में जीवंत हैं | इन्हीं में से, सैकड़ों वर्षों की लम्बी यात्रा कर चुका ‘कश्मीर’ महज़ एक शब्द या एक राज्य का नाम भर नहीं बल्कि वक़्त के क्रूर थपेड़ों से जूझते हुए यहाँ तक पहुंचा एक ऐसा पथिक है जो अपने समय की झोली में संस्कृति, परम्पराएं, लालच, युद्ध, टीस-कराहटें, चीख-पुकार, गीत-संगीत, धारणाओं और किम्ब्दंतियों का बड़ा खजाना अपनी धरोहर के रूप लिए हुए है…… | अन्याय इतिहासों की तरह जीवंत कश्मीर के कृति-विकृत बदलाव झेलते सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनैतिक चेहरे को अनेक इतिहासकार स-समय लिपिवद्ध भी करते रहे | इसी कश्मीर के ऐतिहासिक दस्तावेजों और संदर्भों से शोध-दृष्टि के साथ गुज़रते हुए “अशोक कुमार पाण्डेय” “कश्मीरनामा: इतिहास की क़ैद में भविष्य” शीर्षक से किताब लिख रहे हैं | कई वर्षों की लम्बी मेहनत के बाद, मूर्त रूप लेती यह किताब भी जल्द ही हमारे सामने होगी किन्तु इससे पूर्व ‘अशोक कुमार पाण्डेय’ द्वारा लिखा गया ‘कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास’ आलेख यहाँ पढ़ते हैं | संक्षिप्त रूप में लिखे जाने के बावजूद भी बड़े बन पड़े इस आलेख को हम यहाँ साप्ताहिक किस्तों के रूप में आपके समक्ष लाते रहेंगे | – संपादक
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विभिन्न भारतीय कला संस्कृतियों में, पूर्वोत्तर भारतीय कला “आल्हा” लोक गायन में अपने छन्द विधान एवं गायन शैली की दृष्टि से विशिष्ट दिखाई पड़ती है । माना जाता रहा है कि इसे सुन कर निर्जीवों की नसों में भी रक्त संचरण बड़ जाता है | किन्तु अन्य लोक कलाओं की भाँति ‘वीर रस की अभिव्यक्ति में गाथा गायन की लोक-कला “आल्हा” भी तकनीकी प्रभाव और सरकारी उपेक्षा के चलते हासिये पर है | ऐसे में वर्तमान आधुनिक कविता को आल्हा के छंद विधान में लिखने का ‘शिव प्रकाश त्रिपाठी‘ का प्रयास निश्चित ही सराहनीय और अनूठा है | आज हमरंग पर ‘आल्हा‘ शैली में लिखी गईं उनकी कुछ कवितायें ….| – संपादक
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अपनी किताब ‘असग़र वजाहत –चुनी हुई कहानियां’ के पर एक चर्चा के लिए कानपुर आये लेखक डाक्टर असग़र वजाहत | वैसे कानपुर शहर उनके लिए अजनबी नहीं है । ननिहाल होने के नाते उनके ताल्लुक के तार यहाँ के एक मोहल्ले राम नारायण बाज़ार से जुड़े रहे हैं। इसलिए उन्हें कानपुर की उस गली के खस्ते ,समोसे, जलेबी ….सब याद रहते हैं | शायद कानपुर यात्रा के दौरान वे यह सब खाना पसंद भी करते हैं। उनका औरा इतना वाइब्रेंट है कि सारा माहौल गर्मजोशी से भर जाता है । जितने लोग भी मौजूद हों सब श्रोता होते हैं और वो वक्ता ..सबको लगता है कि उन्हें वजाहत साहेब ने बहुत तवज्जो दी क्योंकि वो सबसे बराबर मुखातिब होते रहते हैं । ये उनकी सहजता है कि अगर सामने वाले ने बहुत पढ़ा लिखा ना भी हो तो बात करने के दौरान किस्से, चुटकुले सुनाते हुए वो किसी को अपने बड़े लेखक होने से आतंकित नहीं करते हैं ।
यहीं उनसे साहित्यिक, राजनीतिक और सामाजिक विभिन्न पहलुओं पर लम्बी बातचीत की ‘अनीता मिश्रा’ ने……
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भारतीय साहित्य का इतिहास विश्व भर में सर्वाधिक प्राचीन, प्रौढ़ और कालमय हैं। साहित्यिक आदान- प्रदान तथा राष्ट्रीय चेतना को विकास के लिए भी अनुवाद एक सशक्त उपादान है। आदान- प्रदान की प्रक्रिया जीवन के सभी क्षेत्रों में निरंतर होती है। इस प्रक्रिया से ही मनुष्य सुसंस्कृत, सुबुद्ध एवं समृद्ध हो सकता है।
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भीष्म साहनी कहते हैं, ‘‘जो रचना मात्र लेखक के मस्तिक की उपज हो वह अक्सर अधमरी रचना होती है, भले ही लेखक शिल्प और शब्दों का लंबा-चैड़ा ताना-बाना बुन रहा हो। लेखक का अपना सत्य जीवन के सत्य से निराला नहीं होता। न ही जीवन का सत्य और लेखक का सत्य दो अलग-अलग सत्य होते हैं। एक ही सत्य होता है और वही जीवन का सत्य होता है। उसको साहित्य वाणी देता है।’’ प्रेमचंद की तरह भीष्म साहनी का भी यह मानना था कि लेखक राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है और अपनी इस बात को वे एक इंटरव्यू में इस तरह से सही ठहराते हैं, ‘‘लेखक का संवेदन अपने समय के यथार्थ को महसूस करना और आंकना है। अंतद्वंद्व और अन्तर्विरोध के प्रति सचेत होना है। इसी दृष्टि से उसकी पकड़ समाज के भीतर चलने वाले संघर्ष पर ज्यादा मजबूत होती है। और परिवर्तन की दिशा का भी भास होने लगता है। इसी के बल पर वह राजनीति से आगे होता है और पीछे नहीं।’’

‘जाहिद खान’ की इस आलेखीय सिलसिले की चौथी क़िस्त में आज मुलाक़ात करते हैं ‘भीष्म साहनी’ से ……
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