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इदिक़ा राय अभी भले ही महज़ आठवीं की छात्रा हैं किंतु इनकी कविताओं ने जैसे बचपन से बाहर देखना शुरू कर दिया है । इदिक़ा की कविताओं की यह दृष्टि नतीजा है स्कूल पाठ्यक्रम के साथ साथ अन्य साहित्यिक कृतियों का निरंतर अध्ययन । बाक़ी फ़ैसला आप पाठकों का ॰॰॰॰॰
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जन्मदिन पर विशेष

कहानी में सौन्दर्य या कलात्मक प्रतिबिम्बों की ही खोज को बेहतर कहानी का मानक मान कर किसी कहानी की प्रासंगिकता तय करना भी वक्ती तौर पर साहित्य में परम्परावादी होने जैसा ही है | तीव्र से तीव्रतम होते संचार और सोसल माद्ध्यम के समय में वैचारिक प्रवाह और भूचाल से गुजरती कहानी भी खुद को बदल रही वह भी यदि गहरे प्रतीक और कला प्रतिबिम्बों के गोल-मोल भंवर में पाठक को न उलझाकर सीधे संवाद कर रही है वह सामाजिक ताने-बाने में पल-प्रतिपल घटित होती उन सूक्ष्म घटनाओं को सीधे उठाकर इंसानी वर्गीकरण और संवेदनाओं को तलाश रही है बल्कि खुद के वजूद के लिए संघर्ष के साथ उठ खड़ी हो रही है | कहानी का यह बदलता स्वरूप साहित्यिक मानदंड को भले ही असहज करे किन्तु वक़्त की दरकार तो यही है |

“हमरंग” की सह-संपादक 'अनीता चौधरी' की ऐसी ही एक कहानी......उनके जन्मदिवस पर बधाई के साथ | - संपादक
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'औरत होने की सज़ा' जैसी बहुचर्चित किताब के लेखक, स्त्रिवादी प्रवक्ता, साहित्य समीक्षक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता "अरविंद जैन" के जन्म दिन पर 'हमरंग' परिवार की ढेरों बधाइयों के साथ आज पढ़ते हैं उन्हीं की यह कहानी॰॰॰॰॰ 'मुझे ऐसा लगा जैसे नाटक खत्म होने के बाद, कलाकार 'ग्रीन रूम' में कपड़े बदलने और चेहरे पर पुता रंग-रोगन उतारने में लगे है। निर्देशक-सूत्रधार बाहर खड़े, सिगरेट फूँक रहे हैं और दर्शक संवाद दोहराते घर लौट रहे हैं। पता ही नहीं चला नायिका कब आकर, पीठ पीछे खड़ी हो गई। गर्दन पर ओस में भीगी नरम दूब से स्पर्श ने सचेत किया। देखते ही कहने लगी "शुक्रिया..कैसी लग रही हूँ?" कमरे का तापमान नियंत्रित करते हुए बोला "सच में 'अच्छी लड़की' लग रही हो।" उधर से संवाद "ये कुर्ता अब कोरा कहाँ है...?" मैं 'ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया' गुनगुनाते हुए, पहाड़ी नदी और बर्फीले तूफ़ान में घिरे, जीवन के बारे में विचार करने लगा। अनुभूति बड़बड़ाती रही "तपती देह ही जीवन है,वरना ठंडी लाश। माथे पर लगा चंदन ना सूखे, तो समझना गिद्ध आसपास ही मंडरा रहे हैं।"
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"अरविंद जैन" के जन्मदिन पर विशेष 'औरत होने की सज़ा' जैसी बहुचर्चित किताब के लेखक, स्त्रिवादी प्रवक्ता, साहित्य समीक्षक सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता "अरविंद जैन" से उनकी क़ानूनी कार्य व्यस्तताओं के बीच उनके स्त्रिवादी समीक्षात्मक लेखन पर बातचीत की मुंबई विश्वविद्यालय की शोधार्थी "संकल्पना" ने ॰॰॰॰ ।
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हमारे भारतीय फिल्म निर्देशकों को यदि हॉलीवुड की बराबरी करनी है तो अभी भी उनसे बहुत कुछ सीखना बाकि है । 3D /3डी इफेक्ट के चमकीले रैपर में निर्देशक और निर्माताओं ने जो चॉकलेट आपको दिया है बस उसे चाटते रहें। रेडिएशन से नुकसान केवल मानव प्रजाति को या हमारे वायुमंडल को ही नहीं हुआ है अपितु उस गिरैया को भी हुआ है जो अब दिल्ली जैसे महानगरों से कब का पलायन कर चुकी है। यह फ़िल्म उन पक्षियों के लिए भी खासी संवेदनशील नहीं दिखाई पड़ती।
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एकाध प्रश्न उठा है कि 'शह की जीत' का विषय क्या है? एक शब्द में कहूं तो 'हिंदुस्तान' वैसे इसका फ्लैप विख्यात आलोचक डा. प्रियम अंकित ने लिखा है। उससे काफी कुछ साफ़ होता है, पढ़ें -
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‘सृजन संवाद’ की नवंबर मास की गोष्ठी में रांची से आये 'दक्खिन टोला' जैसी चर्चित कहानी संग्रह के कथाकार कमलेश ने अपनी कहानी 'पत्थलगड़ी' का पाठ किया। कमलेश को सुनने स्थानीय लेखक, साहित्यकार व साहित्यप्रेमी एकत्र हुए। 'पत्थलगड़ी' जल, जंगल और जमीन बचाने की कहानी है। यह आदिवासियों के अंदर के उनके प्रकृति प्रेम और उसके प्रति समर्पण को दर्शाती कहानी है। इस कहानी में इस बात का जिक्र है कि किस प्रकार एक आदिवासी परिवार की तीन पीढ़ी जंगल और पहाड़ को बचाने के लिए अपनी जिंदगी कुर्बान कर देती है। आज भी यह आम धारणा बनी हुई है कि जल, जंगल, जमीन की बात करने वाले को पुलिस और सरकार माओवादी मानती है। पिछले दिनों खूंटी में हुए पत्थलगड़ी प्रकरण को संदर्भ कर लिखी गयी यह अदभुत कहानी है।
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उत्तर प्रदेश के गोरखपुर ज़िले के एक गाँव ब्रह्मपुर में पैदा हुए लेखक बालेंदु द्विवेदी ने एक सीधी सरल रचना मदारीपुर जंक्शन के जरिए साहित्यकारों के बीच अपनी पहचान बनाई है। उनके लिखे उपन्यास मदारीपुर जंक्शन में गांव की सौंधी मिट्टी की महक के साथ ही जीवन की कटु सच्चाई भी सामने आती है। प्रसिद्ध कवि एवं आलोचक अशोक चक्रधर ने इस उपन्यास की प्रशंसा में यह लिखा है कि 'मदारीपुर गांव उत्तर प्रदेश के नक्शे में ढूंढें तो शायद ही कहीं आपको नजर आ जाए, लेकिन निश्चित रूप से यह गोरखपुर जिले के ब्रह्मपुर गांव के आस-पास के हजारों-लाखों गांवों से ली गई विश्वसनीय छवियों से बना एक बड़ा गांव है। जो अब भूगोल से गायब होकर उपपन्यास में समा गया है। हाल ही में अपने कलम कार्यक्रम के लंदन सीरीज़ में,फाउंडेशन ने 'मदारीपुर जंक्शन' उपन्यास से प्रसिद्ध हुए कथाकार बालेन्दु द्विवेदी को आमंत्रित किया। दिनांक 11 नवम्बर,2018 को लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में कलम कार्यक्रम आयोजित हुआ जिसमें प्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार तेजेन्द्र शर्मा सहित हिंदी के अनेकों विद्वान उपस्थित रहे।कार्यक्रम का संचालन युवा साहित्यकार शिखा वाष्र्णेय ने किया। प्रस्तुत है 'मदारीपुर जंक्शन' उपन्यास के लेखक और युवा साहित्यकार बालेंदु द्विवेदी से विशेष बात-चीत एक साक्षात्कार के रूप में -
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युवा छात्र, संस्कृत कर्मियों की बनती यह सामाजिक दृष्टि अपने दौर की एक सुखद छाँव की अनिभूति से भर देती है, कुछ यही एहसास कराती हिन्दू कॉलेज में बी.ए.(आनर्स) सैकंड इयर के छात्र ‘अनुपम त्रिपाठी‘ की यह कविता …..
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