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Priyanka Panday
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खाली सा दिन" खाली सा दिन... लम्हा दर लम्हा अपनी ही पीठ पर खुद को उठाये फिरता बोझिल सा सदियों की शक्ल में खर्च होते से लम्हे पहरों पहर खुद ही खुद का हिसाब कर बैठते अक्सर इन खाली दिनों को भरने की तमाम नाकाम सी कोशिशों में भरी आँखें भरे मन से खाली खाली सी मुट्...
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झर झर निर्झरिणी बह निकली अलमस्त पवन के संग चली प्रिय मिलन की मन में आस लिए आतुर व्याकुल होकर निकली उत्तंग शिखर से चली निकल घाटी पत्थर पर्वत समतल सुधबुध खोकर हो रही विकल उठती गिरती जैसे पगली इक चंचल चपल चकोरी सी मनभावन मुग्ध मयूरी सी अंतस अंबुधि की आस लिए झा...
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यादें
आज भी खिलती हैं यादें तेरी गुलदाऊदी के फूलों सी अहसास के तमाम रंगों से लबरेज़ तो अचानक महसूस होती है हंसी तेरी झरते हरसिंगार सी खुशनुमा मौसम सर्द हवाएं ठंडी हथेलियाँ मुँह से निकलती भाप गर्म कॉफ़ी सब वैसा ही है कुछ भी तो नहीं बदला हाँ बहुत मद्धम हो चली है तपिश...
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बहुत ज़रूरी हो जाता है चमक से चुँधियाइ आँखों को दूर करना तेज़ रौशनी से ताकि बचा रह सके मौलिक अस्तित्व  छोटे से दिए की रौशनी का रुक कर कहीं तेज़ रफ़्तार से छुड़ा हाथ नापना अपने कदमों की गहराई खोजना तमाम छूटे निशान जो अनदेखे रहे आपाधापी में भीड़ से अलग बैठ शांत होक...
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जब भक्त रूठा
श्रद्धा सुमन कुछ मन में लिए कुछ दीप आस्था के लिए कुछ हाथ सम्मुख तुम्हारे जुडे कुछ शीश चरणों में झुके प्रबल डोर भक्ति की है संबल तुम्हारी शक्ति की है हर घडी तुम्हारा साथ है शीश पर तुम्हारा हाथ है विश्वास नहीं तोडना प्रभु भंवर में मत छोडना प्रभु सूखे पुष्प फि...
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भाव धवल और खुला गगन है लेकर स्वप्न पंख उडती जाऊं। अमर प्रेम की प्रबल प्रीत संग नवगीत नए नित रचती जाऊं।। तेरे प्रेम की पावन सरिता समरस अंतस में बहती जाए। पथ चाहे कितना ही दुर्गम हो कठिनाई बस हल होती जाए। अनंत प्रेम से संबल लेकर उत्तंग शिखर नित छूती जाऊं। अमर...
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भरोसा है खुद पर
मन छूना चाहता है आकाश भरता है उड़ान बाधाए काल गति की कब रोक पायी हैं रफ़्तार हौसलों की पंखों तुमको इज़ाज़त नहीं रुकने की तय करना है अंतहीन सफ़र पानी हैं मंजिलें और मुझे भरोसा है पंखों से ज्यादा खुद पर........... ----प्रियंका
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बदलती है तारीख़ें दिन महीने साल तलाश में चंद खुशियों की हम भटकते हैं रोज़ पर जाने क्यों रह जाता है बहुत कुछ वैसा ही बदल नहीं सकते सब कुछ पर आओ देखें थोडा सा बदल कर खुद को ही ---प्रियंका
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