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Meena Sharma
शिक्षिका भी हूँ और विद्यार्थी भी । जीवन की पाठशाला से जितना सीखा वह भूल ना जाऊँ, इसलिए लिख लेती हूँ ।
शिक्षिका भी हूँ और विद्यार्थी भी । जीवन की पाठशाला से जितना सीखा वह भूल ना जाऊँ, इसलिए लिख लेती हूँ ।
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शुक्रिया इन शेरों को साझा करने के लिए । सभी याद रह जाने वाले शेर हैं खूबसूरत !!!
इतनी मिलती है मेरी गज़लों से सूरत तेरी
लोग तुझ को मेरा महबूब समझते होंगे !!!
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बस, यूँ ही....
नौकरी, घर, रिश्तों का ट्रैफिक लगा,  ज़िंदगी की ट्रेन छूटी, बस यूँ ही !!! है दिवाली पास, जैसे ही सुना, चरमराई खाट टूटी, बस यूँ ही !!! डगमगाया फिर बजट इस माह का, हँस पड़ी फिर आस झूठी, बस यूँ ही !!! साँझ की गोरी हथेली पर बनी, सुर्ख रंग की बेलबूटी, बस यूँ ही !!! ...
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मित्र, तुम ही तो थे.....
तुम ही तो हो !!!
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सोना जरुरी है, नयी शुरुआत करनी है ,
भूलकर सारी मुसीबत, आस भरनी है ;
जिन्दगी के खेल फिर-फिर खेलने तू जा.....
चुप सो जा......मेरे मन........चुप सो जा............!!!
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कहने को तो जगत वृहद है,
परिचित पंथी, साथ सुखद है,
दिन ढलता जब, रात अवतरित,
भाषा निर्बल, शब्द संकुचित,
मन के संग रहना पड़ता है,
अपने को सहना पड़ता है,
काम क्रोध ईर्ष्या मद नद में , होना सबको शुद्ध अकेले।
सबके अपने युद्ध अकेले।
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यूँ तो मैं दर्द के सहरा से गुज़र जाऊँगा
पर तेरी आँख हुई नम तो बिखर जाऊँगा.....
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हुस्न ख़ुद्दार हो तो बाइस-ए-शोहरत है ज़रूर
लेकिन इन बातों में हो जाती है रुस्वाई भी.....
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इश्क़ है खेल नही है, जो कुछ तजुर्बा हो
सोचा इक रोज़ तुझे कह दूं, मगर जाने दे.....
बहुत खूबसूरत गजल ! बधाई !
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