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Kishore Choudhary
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RJ and Fiction writer
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मौसम घुस आते हैं बंद अलमारियों में, अटकी हुई दराजों में, मन में और कभी - कभी अतीत तक में
घसियारा मन
घसियारा मन
hathkadh.blogspot.com
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उसके बालों में अंगुलियां फेर लेते तो क्या बात थी मगर जैसी दुनिया मिली है वह ख़ूबसूरत तो है पर बेहद मुश्किलों से भरी है। कितने जतन कितने ही काम मनचाहे की राह में दीवार बने खड़े रहते हैं।
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हमारे पास सोचने को बहुत कुछ था मगर हमें फुरसत न थी। यूं भी सोचने से होता ही क्या?

वो है तो है, नहीं है तो नही
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I use Neighbourly to ask my neighbours questions and get useful answers.
Try it out with me? https://nbly.app.goo.gl/share
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होता तो कितना अच्छा होता कि हम रेगिस्तान को बुगची में भरकर अपने साथ बड़े शहर तक ले जा पाते पर ये भी अच्छा है कि ऐसा नहीं हुआ वरन घर लौटने की चाह खत्म हो जाती.
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हम निरंतर प्रयत्न करते हैं. परिणाम हमारे प्रयासों के अनुरूप हो तो हम समझते हैं कि करने से होता है किन्तु जब परिणाम निरंतर कुछ और ही प्राप्त होता है तब हम नियति जैसी बात पर विश्वास करने लगते हैं.
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हम किसी को बुलाना चाहते हैं मगर ऐसे नहीं कि उसका नाम पुकारें। हम उसके बारे में सोचते हैं कि वह आ जाए। वह बात करे। किन्तु हम इन बुलावों को मन में ही छुपाए रखना चाहते हैं।
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फिर कहानी शुरू
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कहानियां मगर सच्ची कहानियां
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