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Umesh Mandal
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मुड़ियाएल घर

जागेश्‍वर काका दुनू परानी दरबज्‍जाक ओसारक चौकीपर बैस बेरुका चाह पीबै छला। फागुनक समए, परसु शिवराति छी। जाड़क सरपोख नहाएल समए वसन्‍ती रौद पेब सोलहन्नी तँ नहि मुदा आधासँ बेसी जाड़क जकड़न तियागि चुकल छल। एक तँ अढ़ाइ-तीन बजेक बेरुका समए, तैपर मन्‍द-मन्‍द पुर्बाक लहकी सेहो लहलहाइत। ओना चाहक रंग-रूप आ सुआदो आन दिनसँ नीक अछि। नीकक कारण अछि एक तँ बकेन महींसिक दूध तैपर जागेश्‍वर कक्काक भातीज जे दार्जिलिंगमे रहि चाहे कम्‍पनीमे नोकरी करै छैन, ओ आधा किलोक चाहक पॉकेट देने रहैन, वएह टटका चाहपत्ती। ओना, बनौनिहारि पुतोहुक लूरिमे कोनो बढ़ोत्तरी नइ भेल छेलैन। मुदा काजोक तँ शुभ संजोग होइते अछि। भरिसक सएह सुधनीकेँ भेलैन, जइसँ चाहक सेखियो आ रंगो-सुआद नीक बनलैन।
जिराएल मन जागेश्‍वर कक्काक, तँए पहिने चारि-पाँच घोंट चाह एक-लखाइत पीलैन। चारि-पाँच घोंट चाह पीला पछाइत जागेश्‍वर कक्काक मन फुरफुरेलैन। फुरफुराइते बजला-
“चाह तँ निम्‍मन बनल अछि मुदा एहेन सभ दिन हुअए तखन ने।”
जागेश्‍वर कक्काक बात सुनि रमणीकाकीक मन रमकलैन नहि, असथिरे भेलैन। असथिर होइते पुतोहुक लूरिपर मन पहुँच नचलैन। नचिते उठलैन- जँ परिवारक भनसिया नीक भोजन, नीक भोजनक अर्थ नीक वस्‍तुए-टा नहि सुआदो, बनबैथ तँ भोजन केनिहारक मनो आ पेटो परिपूर्ण हेबे करत। जखने मनो आ पेटो परिपूर्ण हएत तखने ने बातो आ विचारोमे परिपूर्णता एबे करत, जइसँ खाइ-पीबैक झगड़ा परिवारसँ मेटेबे करत। मुँहक चाहकेँ कण्‍ठसँ निच्‍चाँ उताइर रमणीकाकी बजली-
“गामक बहुत गोरे काल्‍हि जतरापर जेता।”
ओना जागेश्‍वर काकाकेँ सेहो केते गोरे तीन-चारि दिनसँ कहलकैन अछि जे शिवराति दिन वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन करए चलू। तीन-चारि घन्‍टाक रस्‍ता टेम्‍पूसँ अछि। शिवरातिसँ एक दिन पहिने दुपहरक पछाइत विदा हएब आ चारि-पाँच बजे तक पहुँच जाएब। ओत्तै रातिमे विश्रामो करब आ साँझमे शिव उपासक फलहारो करब। मुदा जागेश्‍वर काका सबहक बात सुनैत गेला, किनको किछु कहलखिन नहि। नइ कहैक कारण रहैन जे मने-मन उदयपुरक सभकेँ चिन्‍हते रहैथ, माने गौंआँ सभकेँ। जे केकरो जड़ि-छीपक ठेकान नइ अछि। बाजत किछ आ करत किछ। करनी-धरणी एहने रखने अछि आ दर्शन करत वाणीश्‍वरी भगवतीक। मुदा विचारसँ उतैर जागेश्‍वर कक्काक मनमे एलैन जे जखन गामक लोक सभ जाइए रहला अछि आ अपनो केते दिनसँ विचारैत आबि रहल छी जे वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन दुनू परानी मिलि करब, मुदा ने कहियो गर लागल आ ने जा भेल। ..ओना रमणीकाकी वाणीश्‍वरी भगवतीक स्‍थानक चर्च नइ केने छेलखिन, मुदा जतरासँ वएह मतलब रहैन। तैपर, जवाबमे जागेश्‍वर काका कहलखिन-
“जखन गामक भेड़िया-धसान लोक दर्शन करए जेबे करता तँ अपनो दुनू परानी अही लाटमे चलि कऽ दर्शन कऽ लिअ।”
पतिक विचारसँ सहमत होइत रमणीकाकी मुड़ी डोलबैत बजली-
“भेल तँ शिवरातिसँ एक दिन पहिने जाएब आ शिवरातिक परात भने चलिए आएब। मोटा-मोटी दू दिन भेल।”
पत्नीक विचारमे सहमत जतबैत जागेश्‍वर काका बजला-
“हँ से तँ सएह भेल। काल्‍हि बारह बजेक पछाइत निकलब आ तेसर दिन बारह बजेसँ पहिने घुमि कऽ आबिए जाएब।”
पतिक विचारमे अपन विचार सटबैत रमणीकाकी बजली-
“जखन दुनू परानी घरसँ निकैल बाहर जाएब तखन बेटो-पुतोहुकेँ जना देब नीक हएत। ओना अपनो दुनू परानी बहुत दिनसँ, बहुत दिनसँ कि सभ दिने वाणीश्‍वरी भगवतीक आराधना-उपासना करिते आबि रहल छी तँए भगवतीए धाममे उपासक फलहारो करब तँ जिनगीक परीछे देब हएत किने।”
पत्नीक विचार सुनि जागेश्‍वर कक्काक मन फुला गेलैन। फुलाइते बजला-
“जखन उदयपुरक लोक जाइक मन बना लेलैन तखन संग-साथमे अपनो दुनू परानीक जाएब उचिते हएत। मुदा ओ सभ अपन-अपन सवारीक बेवस्‍था करता, अपना दुनू गोरे अलग बेवस्‍था करब।”
ओना जागेश्‍वर काका पत्नीक अभ्‍यन्‍तरक बात अपनो बुझै छला। अपना बुझैक कारण बेवहारिक छेलैन। बेवहारिक ई जे कहैले तँ सभ (गौंआँ) वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन करए जेता मुदा घरसँ बाहर धरिक जे बोली-वाणीक रूप बना नेने छैथ, से की अपने वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन करता, ओ तँ अप्‍पन दर्शन भगवतीकेँ देथिन। मुदा जे हौउ, एके गाममे सभ रहै छी, मुदा...।
अपन विचारकेँ तहियबैत अबोध जकाँ जागेश्‍वर काका बजला-
“जेना-जे विचार हएत से करब।”
शुरूमे उदयपुर छोटे गाम छल। मुदा मिथिलांचलक घर-घराड़ीकेँ कमला-कोसीक बाढ़ि कम उपटान उपटौलक सेहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए। केतेको निम्‍मन गामक मनुखक घराड़ी चौर भऽ माछ-कौछुक घराड़ी बनि गेल अछि जेकरो तँ नकारल नहियेँ जा सकैए। मुदा तँए ईहो तँ नहियेँ कहल जा सकैए जे बत्तीसोअना गाम अहिना भऽ गेल अछि। खएर जेतए जे भेल से भेल, मुदा उदयपुरक उदयमे सभ दिन बाढ़ि ऐछे। ने यमुना तीरक उपद्रव आ ने कोसी-कमला घाटक घटवारिसँ भेँट, जइसँ गाममे कहियो कोनो विघटन किए हएत। तँए दिन-दिन बढ़िते गेल। आने-आन गामसँ उजरल-उपटल लोको आ उदयपुरक महत बुझनिहारो तँ आबि-आबि उदयपुरमे बसले छैथ। तैसंग नव-नव एबो करिते छैथ। गाममे वास-भूमिक कमियोँ छइहे नहि जे घराड़ीक अभावक दुआरे कियो बसि नइ सकै छैथ, आकि अपनामे रग्‍गड़े-झग्‍गड़ करता। तँए कि गाममे निचरस खेत नइ अछि, कोनो धार-धूर नइ अछि, ओ गामे ने वास-भूमि भेल। तँए केतबो परिवार आन गामसँ आबि बसता तैयो उदयपुरमे वासक कमी नहियेँ हएत। ..अनुकूल मौसम बनने जहिना बरखा होइए, अनुकूल मौसम बनने जहिना वसन्‍त अबैए, अनुकूल मौसम बनने जहिना ठनका खसैए तहिना वास-भूमिक अनुकूलते ने घरवासकेँ गामवास सेहो बनबैए। जखने घरवास गामवास बनए लगैए तखनेसँ ने विचारवासी विवेकवासी बनि वास करए लगैए। से तँ गाममे ऐछे।
जहिना श्रीपंचमीमे वीणा पुस्‍तक-धारिणी सरस्‍वतीक आ हाथ सजलक संग लक्ष्‍मीक पूजा[1] एके दिन एके समए– प्रभात वेलाक शुभ मुहूर्त्तमे लोक करै छैथ तहिना ने जिनगियोक प्रभात वेला अछि।
वाणीश्‍वरी भगवती धामक धरमशालामे दुनू परानी जागेश्‍वर काका एकटा कोठली सबा रूपैआ दैछना दऽ कऽ लेलैन। तीन मंजिला मकानक नमहर धरमशाला ऐछे, जइमे छोट-पैघ अनेको कोठली भीतर अछि। उदयपुरक तँ मात्र पनरहे-बीसटा यात्री छैथ जे आनो-आनो गामक अनेको यात्री रहितो धरमशालाक किछु कोठली खालीए अछि। ओना, धरमशालाक भाड़ा होटल आकि भाड़ाबला आन मकान जकाँ बेसी नहियेँ अछि। तेकर कारण अछि ई धरमशाला वाणीश्‍वरी भगवतीक स्‍थानक छिऐन। जे स्‍थानक चन्‍दा-चढ़ौआसँ बनल अछि। भाड़ा नामक किछु ने छै मुदा ओकर रख-रखावक जे बेवस्‍थामे खर्च होइ छै, बस ओही रूपक भाड़ा बनल अछि।
सूर्यास्‍त भऽ गेल। स्‍थानक अप्‍पन बिजली बेवस्‍था, माने जेनरेटरक बेवस्‍था तँए स्‍थान भरिमे माने वाणीश्‍वरी भगवती-मन्‍दिरक संग आरो केते छोट-पैघ मन्‍दिरो तँ ऐछे। तैसंग पण्‍डा-पुजेगरीक रहैक वासक संग नमहर धरमशलो अछि आ बीचक जे अगनेय अछि, जइमे रंग-रंगक दोकान-दौरी अछि, तैबीच भरि राति एके रंगक इजोतक बेवस्‍था तँ चाहबे करी, जे ऐछे। पावर-हाउसक बिजली जकाँ नहि, जे कखन रहत आ कखन नइ रहत। होइतो तँ ऐछे जे दिनमे जखन बिजली इजोतक जरूरत नइ रहै छै तखन बिजलियो रहैए आ रातिमे जखन अन्‍हार होइ छै तखन रहबे ने करैए। तइसँ सैयो कच्‍छे वाणीश्‍वरी भगवतीक स्‍थानक तँ ऐछे। दिनमे जखन इजोतक खगता नइ रहै छै तखन जेनरेटर बन्न रहल आ जखन जेते काल खगता भेल, तेते काल चलल। यएह ने जिनगीक ओ उपलब्‍धिक पड़ाव छिऐ जेतए लोककेँ अपन जिनगीक काज अपना हाथमे आबि जाइए, जइसँ अपन मनोनुकूल कार्यक्रमक बीच जिनगीक चक्की चलैत रहैए।
सूर्यास्‍त होइते भगवतीक सिंह दुआरिक घड़ी-घण्‍ट बाजल। घड़ी-घण्‍ट बजिते सभ उपासी–शिवक उपास केनिहार आकि केनिहारि–क मनमे उपासनाक फलहारक आशा जगलैन। जहिना तुलसी बाबा कहने छैथ जे, जेहने जेकर मनक भाव रहत तेहने रामक दर्शनसँ भेँट हएत। ‘रामो रामो’ कहनिहारक कमी अछि, केतौ ठक-ठाकुर-चोर मिला जपैए तँ केतौ रस्‍ता-पेरामे रामक जप लुटाइए! लूटि लिअ जेकरा जे लूटैक अछि। भगवती स्‍थानक घण्‍टीक अवाज सुनि रमणीकाकीक मन चपचपाइत थलथला कऽ जलजला गेलैन। जलजलाइते पति दिस तकैत रमणीकाकी बजली-
“गामेसँ फलहारक सभ फल अनने छी। पहिने दुनू परानी नहा कऽ नव वस्‍त्र पहिर लिअ, पछाइत डाली साजि भगवतीक मन्‍दिरमे फल चढ़ा दुनू गोरे शिवरातिक उपासनाक फलहार कऽ लेब।”
होइते अहिना छै जे भूखल आगू किछु खेबाक वौस आ पियासल आगू पानि आबि गेलापर जहिना मनमे सब्रक बीजक अंकुर जगैए तहिना जागेश्‍वर काकाकेँ सेहो भेलैन। कोठलीक खिड़की खोलि जागेश्‍वर काका गौंआँ यात्रीक कोठली दिस तकला तँ देखलैन जे किनको अपन घरक फलहारक फल नइ छैन, तँए सभ झोरा लऽ लऽ दोकान दिस जा रहल छैथ...।
अवसरक लाभ उठबैक परियास करैत, समयक उपयोग करैत जागेश्‍वर काका बजला-
“नहेला पछाइत ने भगवतीक डाली सजब। अखन सभ यात्री फलहारक फल कीनैले दोकान-दौरी टहैल रहल छैथ, स्‍नानक घाट खाली अछि...।”
दुनू परानी जागेश्‍वर काका नहेला पछाइत नव वस्‍त्र धारण केलैन। पुरना वस्‍त्र घाटपर खीच-फखारि कऽ पानि गाड़ि कोठरीमे पसाइर लेलैन।
थर्मशमे गाइक दूध, पाकल केरा, दारीम, आ खीरा मोटरीसँ निकालि रमणीकाकी काकाकेँ कहलखिन-
“सभ अपने चास-वासक छी।”
एक तँ यात्राक पछाइत स्‍नानक सुख, तैपर सँ वाणीश्‍वरी भगवतीक सरोवरक घाट टपल जागेश्‍वर काका रहबे करैथ, मन गुदगुदा गेलैन। गुदगुदाइते बजला-
“भगवतियोकेँ अपन-चास-वासक फल देख मने-मन खुशी हेबे करतैन।”
ओना जागेश्‍वर काका संगी-साथी जकाँ वाणीश्‍वरी भगवतीकेँ बुझि बजला मुदा से रमणीकाकीकेँ नीक नइ लगलैन। ओना, अनसोहाँतो नहियेँ लगलैन, मुदा एक धान एक चाउर होइतो किछु एहनो तँ ऐछे जे सुगन्‍धित अछि, एकर माने ईहो नइ जे सभ सुगन्‍धिते अछि। मुदा ईहो केना कहल जाएत जे चाउरक जे अपन सुगन्‍ध अछि ओ कोनो चाउरमे नइ अछि। ओ तँ उपरारिमे उपजल सतरिया धानक चाउर हुअए कि तुलसी फुलक आकि चौरीमे उपजल बेलौर-दसरिया आकि पाखैरे-पिच्‍चैर किए ने हुअए मुदा चाउरक जे अपन गुण-धर्म-सुगन्‍ध छै ओ तँ छइहे। ओना मने-मन जहिना जागेश्‍वर काका चाउर-गुड़ चिबबै छला तहिना रमणियोँ काकी चिबैबते छेली, मुदा बजली नहि, अपन फलहारक ओरियानमे अपनाकेँ लगौने सभ फलकेँ ओरिया-ओरिया सैंत-सैंत डाली सजबैत रहली।
..डाली सजिते जागेश्‍वर काका टोन मारलैन-
“जे सभ फल वाणीश्‍वरी माएकेँ चढ़ेबैन से तँ मंत्र जकाँ कहि देबैन किने?”
ओना जागेश्‍वर कक्काक मनमे होइत रहैन जे भरिसक पत्नीकेँ ईहो बात नीक नइ लगतैन, मुदा से विपरीत भेल, रमणीकाकीकेँ नीक लगलैन। दुनू खीरापर हाथ रखि बजली-
“ई भेल लत्तीक फल। जेकरा डाँड़मे, अपन फल जकाँ तागतो ने छै जे अपने भरे ठाढ़ो हएत मुदा फल तँ एहेन ऐछे जे गाछक सैयो फलसँ नम्‍हरो आ सुअदगरो ऐछे।”
बिच्‍चेमे टोन दैत जागेश्‍वर काका बजला-
“मुदा खीरा मीठ कहाँ होइए?”
रमणीकाकीकेँ सुतरलैन। बजली-
“मीठ केकरा कहै छै से अखैन नइ कहब। जाबे आन यात्री नहेता-सोनेता तइसँ पहिने अगुआ कऽ भगवतीक दर्शन करब बेसी नीक हएत।”
हत्‍थो भरि गौरिया केराकेँ दहिना हाथसँ उठा रमणीकाकी निंगहारि-निंगहारि देखए लगली जे पाल परक कलकतिया-आम जकाँ ठाम-ठीम खोंइचा दगि गेल अछि। बिच्‍चेमे जागेश्‍वर काका टोनियबैत बजला-
“केरा सड़ल जकाँ बुझि पड़ैए!”
झपटैत रमणीकाकी बजली-
“सड़ल नइ अछि, परसाएल अछि। असल तँ यएह भेल जे परसाद बनि परसाइबला सेहो छी। तोहूमे आम-लतामक गाछ जकाँ कि कोनो हड्डी-पसलीबला गाछक फल छी। जल-जल, थल-थल, पल-पल गाछक पेटसँ निकलल फल छी।”
ओना रमणीकाकीक बात सुनि जागेश्‍वर काका भकचका गेला। भक-चकीमे पड़ल मनकेँ जाबे सोझरबैथ तइ बिच्‍चेमे दारीमकेँ देखबैत रमणीकाकी बजली-
“केते सुन्‍दर पृथ्‍वी अकारक गोल फल झाड़-झाड़ीमे नुकाएल रहैए।”
रमणीकाकीक मुहसँ निकैलते जागेश्‍वर काका बजला-
“कोनो कि झाड़ीक-झाड़मे फलेटा नुकाएल रहैए, फलक तरोमे फलहार नुकौने रहैए। तेहेन भारी चोर अछि जे खीरा आकि लताम जकाँ गुद्दा-बीआ आकि रस-खोंइचा एकबट्ट केने रहैए, सजनी जकाँ कोठरी बना-बना अपनाकेँ सजने रहैए।”
ओना रमणीकाकीक मनमे उपकैत रहैन जे कहिऐन- मुँहक दाँत जहिना रजो छी आ चोरो छी, तहिना ने दारिमो अछि, मुदा बकबासमे समैकेँ हाथसँ छोड़ब नीक नहि, तँए रमणीकाकी चुपे रहि थर्मश निकालि दूधक रंग देखए लगली। बकेन गाइक दूध...।
डाली साजि रमणीकाकी जागेश्‍वर काकाकेँ कहलखिन-
“चलू, भगवती-माइक दर्शन काइए ली। फलहारोक बेर उनैह जाएत।”
रमणीकाकीक बात सुनि जागेश्‍वर काका बजला-
“हम तँ नहेला पछाइतेसँ दर्शन करैले तैयार छी मुदा बीचमे अहीं ने लटघाँइर लगौने छी।”
पतिक बात रमणीकाकी सोल्‍होअना नइ सुनि पेली। आँखि उठा तकली तँ सोझे पतिक मुँह पटपटाइत देखली, जेना मने-मन कियो मंत्र-जप करै छैथ, तहिना। वाणीश्‍वरी भगवती जेना आगू आबि ठाढ़ भऽ अपन रूप दर्शन करबए लगल होनि तहिना रमणीकाकी अनसून भऽ गेली। अनसून होइते मन नाचए लगलैन। नचिते आँखिक सोझमे भगवतीक तीन रूप चमकए लगलैन। मनुखमे देव जोग वएह ने भेल जे विचारकेँ विवेकक कसौटीक मुखाड़ी बान्‍हि बाइन बना भूमिक रणभूमिमे जीवन यात्रा करैत चलए।
वाणीश्‍वरी भगवतीक दर्शन आ फलहार केला पछाइत दुनू परानी जागेश्‍वर काका धरमशालाक ओइ कोठरीमे आबि बैसला, जे सवा रूपैआ दैछना दऽ दू दिन रहैले नेने छला। भरल मन दुनू परानीक रहबे करैन। रौतुका खेबोक खगता नहियेँ बुझि पड़ैन। जागेश्‍वर काका पत्नीकेँ कहलखिन-
“एक बेर गौंओं-घरूओकेँ देख अबए चलू।”
एक तँ ओहुना रमणीकाकी पति भक्‍त, तैपर वाणीश्‍वरी भगवतीक स्‍थान, बिनु ‘हँ’ ‘हूँ’ बजने उठि कऽ ठाढ़ भऽ गेली। दुनू परानी जखन कोठरीसँ निकैल आनो-आनो यात्री आ अपन गौंआँ-यात्रीकेँ देखलैन तँ मने-मन हँसी लागए लगलैन। मुदा ने कियो हँसबे केला आ ने किछु बजबे केलैन। चुपचाप देख-सुनि कऽ अपन कोठरी आपस आबि गेला।
जहिना अनुकूल मौसम पौने प्रकृतिमे सेहो अनुकूलता आबि जाइ छै, तहिना दुनू परानी जागेश्‍वर काकाक बीच सेहो ऐलैन।
..पत्नी दिस देखैत जागेश्‍वर काका बजला-
“अनेरे दुनियाँक नीक-अधला देखै पाछू अपन जिनगी आ कर्तव्‍य छोड़ि मुँह तकैत रही, हमरा बुझने से नीक नहि।”
जहिना केकरो-केकरो ठोरेपर बरी पकैए, माने कोनो बातक विचार लगले कऽ देब, तहिना रमणीकाकीकेँ सेहो भेलैन। बजली-
“एकरा के काटत।”
पत्नीक समरथनमे जागेश्‍वर कक्काक मन हरिया गेलैन। हरिया ई गेलैन जे विधातो नारी-पुरुखक भेद रचि दुनूकेँ दू दिशामे मोड़ि देलैन। तैठाम जँ पति-पत्नी ओइ भेदकेँ सहीट बनबैत जिनगीक संगी बनि जीवन-यात्रा करै छैथ तँ ओ निसचिते ने नीक भेल।
जागेश्‍वर काका बजला-
“बेकती रूपमे नर आ नारी भेल, दुनूक सम्‍बन्‍धे ने घर-परिवारक निर्माण करत। जे सभ नरक जिनगीक दायित्त्व बनिते अछि।”
बिच्‍चेमे रमणीकाकी बजली-
“पुरुख-नारीक सम्‍बन्‍ध ओइ परिवार-ले अनिवार्य भेल जे अतीत-सँ-भविस धरिक परिवार भेल, मुदा परिवार तँ असगरोक होइ छै आ निसचिन्‍तसँ लोक जीवन-यात्रा करैए।”
पत्नीक विचार सुनि जागेश्‍वर काका बजला-
“हँ, से तँ भेल मुदा ओ चलन्‍त परिवार भेल। चलन्‍त परिवार ई जे जेत्तै रहब तेत्तै परिवार भेल, कोनो गाम-समाज आकि देश-कोस नइ भेल। मुदा जे भेल से भेल, अपना तँ से नहि अछि। तँए जे अछि तहीले ने विचारबो करब आ करबो करब।”
जागेश्‍वर कक्काक विचार रमणीकाकीकेँ जँचलैन। जँचिते बजली-
“अखन जइ धाममे छी ओ तँ तखने धर्मस्‍थल हएत जखन ओइ मर्मकेँ मर्मस्‍थलमे बसा कर्मस्‍थलमे समरपित करब।”
रमणीकाकीक विचार नीक जकाँ जागेश्‍वर काका नइ बुझला। एकर माने ई नहि जे जागेश्‍वर काकाकेँ बुझैक अवगैत नइ छेलैन। विचार व्‍यक्‍त कएल जाइए पात्रक माध्‍यमसँ। जँ एक रंग पात्र रहल तँ एक-धारामे चलैए आ जँ पात्रमे भेद रहल, अन्‍तर रहल तँ केतौ-केतौ बाधा-रूकाबट होइते अछि। सएह जागेश्‍वर काकाकेँ भेलैन। मुदा कनियेँ-कालक पछाइत जेना मनक ओझरी सोझरा गेलैन तहिना मन विहुँसलैन। विहुँसैत जागेश्‍वर काका बजला-
“जहिना नर-नारीक बीच परिवार बनल अछि तहिना ने एक नर दोसर नरक धारा भेल।”
ओना रमणीकाकी अखन तक नरक माने ‘पुरुख’ बुझै छेली आ नारीक माने ‘महिला’। मुदा जागेश्‍वर काका नरक अद्वैत रूपमे चर्च केने छला, द्वैत रूपमे नहि। माने ओकर खण्‍डित रूपमे नहि। तँए रमणीकाकीकेँ कनी बुझैमे भेद भेबे केलैन।
निर्मल-निरजल रमणीकाकीक हृदय, बजली-
“नीक नहाँति नइ बुझि पेलौं।”
हँसैत जागेश्‍वर काका कहलखिन-
“द्वैत-अद्वैतक बीच परिवार चलैए। कखन ‘द्वैत’ ‘अद्वैत’ हएत आ ‘अद्वैत’ ‘द्वैत’, यएह ने..?”
पतिक विचार सुनि रमणीकाकी रमैत जिनगीमे रमि गेली।

शब्‍द संख्‍या : 2352, तिथि : 11 अक्‍टुबर 2016

[1] कृषि कार्य हेतु हर ठाढ़ कएल जाइए

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