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Amar Nath
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परम्परायें
गॉव की शहर आ गयी हैं 'छठ' बिहारियों के पुत्र, पति की रक्षा का पर्व है। बहुतेरे त्योहार पहले से ही यहॉ जमे बैठे हैं, जैसे महानगरों में व्यापारी जमे बैठे हैं, उन्होंने छठ का एक स्टाल और लगा लिया है। हमारी नज़र में ये पर्व मात्र बाज़ार के क्रियेशन हैं पति पर प...
परम्परायें
परम्परायें
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काठ का नाम बदलो !
चेहरे : डॉ लाल रत्नाकर  नाम बदलना है तो काठ का नाम बदलो काठ को लोहा कर दो ! और लोहे को काठ। पानी को हवा कर दो। हवा को पानी ? मोदी को अडानी और अम्बानी को अमित ..! राम को रावण और कृष्ण को ईशा मसीह ! मस्जिद को मंदिर ! मंदिर को मस्जिद या गिरजाघर !              ...
काठ का नाम बदलो !
काठ का नाम बदलो !
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हिसाब अभी बाक़ी है ?
हिसाब अभी बाक़ी है ? जवाब अभी बाक़ी है !
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उम्मीद बाक़ी है ?
धूप्प अँधेरा है। उम्मीद बाकी है। तेल की धार ! घी में उतर गयी है ! और घी देसी घी में ! पेट्रोल की कीमत जोड़ दी गयी है। आम आदमी की जिंदगी ! उत्सवमय हो गयी है ! हर हाथ को काम और घर की चाभी। इन विगत कुछ सालों में। रसोई गैस घर घर पहुंचा दी गयी है। बुलेट ट्रेन से...
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मेरे भोले भले भाइयों !
मैं जानता हूँ मेरे विचार मेरे ही लोगों को रास नहीं आयेंगे ! लेकिन मेरा विश्वास है कि यदि एकबार हम भावनाओं और समाज की रूढ़ियों से किनारा कर ले तो हम समाज को बदल सकते हैं ! कईबार हमारा समाज रूढ़ियों को अन्यमनस्क भाव से इसलिये ढो रहा होता है क्योंकि उसके पास अ...
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दिवाली
परम्परा कैसी कैसी ? दशहरा,दिवाली,होली,छठ ! जन्माष्टमी जैसे त्योहार की परम्परा ! कब से चली चली आ रही है ? और कब तक चलती रहेगी ? इसी तरह ? डा.लाल रत्नाकर
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ठग !
सत्ता ठगों के हाथ में है ! देश कहॉ जा रहा है ? किसको पता है चुनाव आयोग को ! जनता जनार्दन को या वोटर को ! नहीं किसी को नहीं भक्तों को ? अब भक्तों को गारण्टी दी जा रही है । श्रद्धालुओं के नाम पर ? भक्तों के महागुरू महाठग महान हैं ! क्योंकि सत्ता ठगों के हाथ ह...
ठग !
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लुटेरे !
दिख रहे है सन्त जैसे ! लूटकर यह देश को ! बहुरूपिये ! पहचानो इन्हें ! झूठे और मक्कार हैं! पकड़ो इन्हें यह भाग जायेंगे ! लोकतंत्र के कलंक हैं यह ! पाखण्ड के पुतले हैं यह ! झूठ और जुमलों के पुल ! बॉध रहे हैं गंदी ज़ुबान से ! भगवान और शैतान की तरह ! क्या लगते ह...
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चलो एक गीत लिखते हैं।
चलो एक गीत लिखते हैं। जिसमें जीवन की सच्चाईयां हो। जो सच को उजागर करता हो। चलो एक गीत लिखते हैं। बहुत हो गया झूठे झूठे। वादे और इरादे सुनते सुनते। चलो एक गीत लिखते हैं। जो झूठ को झूठ की तरह। समझा सके और झूठ को। सत्य से मिटा सके ऐसा गीत। चलो एक गीत लिखते हैं...
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चरवाहा
चरवाहा @ डा.लाल रत्नाकर चरवाहा कैसा और किसका उनका जिनके पेट भरे हैं जिनके दिमाग़ में अपराध ने जडवत जगह बना रखी है जिन्हें वास्तव में प्रकृति के सुकोमल तंतुवों की चाह है घास भूसे से मेरा भी भण्डार भरा पड़ा है जिसकी चाभी, उसने रख रखी है जिसने ज्ञान की ठेकेदार...
चरवाहा
चरवाहा
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