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satywan saurabh
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छंद दुखों का बन गया,जब ये जीवन गीत ! तब कविता बन के रही,मेरी सच्ची मीत!!!
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Satywan Saurabh At AIR Hisar 13/07/2016

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हरियाली को खा रहे,पत्थर होते गाँव !
बूढा बरगद है कहाँ,गायब पीपल छाँव !!
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पशु-पक्षी सब ढूंढते,रहने को आवास !!
हरियाली ने ले लिया,जंगल से सन्यास!
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झुरमुट पेड़ों के गए,है कंकरीट की भीड़ !
उड़ते पंछी खोजते,रहने को अब नीड़ !!
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आँखों को अब है नहीं,रंगो की पहचान !
बिन पत्तों औ फूल के,घर सब रेगिस्तान !!
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गुलदानों में है सजे,अब कागज़ के फूल !
खुश्बू के बदले भरी, है अंदर तक धूल!!
हरियाली को खा रहे,पत्थर होते गाँव ! बूढा बरगद है कहाँ,गायब पीपल छाँव !! ------------------------------------- पशु-पक्षी सब ढूंढते,रहने को आवास !! हरियाली ने ले लिया,जंगल से सन्यास! --------------------------------- झुरमुट पेड़ों के गए,है कंकरीट की भीड़ ! उड़ते पंछी खोजते,रहने को अब नीड़ !! -------------------------------------- आँखों को अब है नहीं,रंगो की पहचान ! बिन पत्तों औ फूल के,घर सब रेगिस्तान !! ------------------------------------- गुलदानों में है सजे,अब कागज़ के फूल ! खुश्बू के बदले भरी, है अंदर तक धूल!!
हरियाली को खा रहे,पत्थर होते गाँव ! बूढा बरगद है कहाँ,गायब पीपल छाँव !! ------------------------------------- पशु-पक्षी सब ढूंढते,रहने को आवास !! हरियाली ने ले लिया,जंगल से सन्यास! --------------------------------- झुरमुट पेड़ों के गए,है कंकरीट की भीड़ ! उड़ते पंछी खोजते,रहने को अब नीड़ !! -------------------------------------- आँखों को अब है नहीं,रंगो की पहचान ! बिन पत्तों औ फूल के,घर सब रेगिस्तान !! ------------------------------------- गुलदानों में है सजे,अब कागज़ के फूल ! खुश्बू के बदले भरी, है अंदर तक धूल!!
kavitasaurabh.blogspot.com

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जीने को अब चाहिए,ऎसे तेरा प्यार !
जैसे पानी से जुड़ा,मछली का संसार !!
--सत्यवान सौरभ

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