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Yogesh Jadon
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बीहड़ के लिए एक शुरुआत
बीहड़ को दिल में संजोए वह बस्ती से आया है। जिस जमीन से उसका कोई नाता नहीं उसे वह अपनी कर्मभूमि बनाना चाहता है। फकीरों की सादगी लेकिन नाम शाह आलम।
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अपने गिरेबां में झांकें सूचना आयोग
योगेश जादौन
बीते आठ सालों में अगर कोई कानून सर्वाधिक सक्रिय रहा है तो वह है सूचना का अधिकार अधिनियम। इसके साथ यह •ाी सच है कि इसे लेकर लगातार बहस जारी है। सरकार और उससे जुड़ी एजेंसियां इसके पर कतरने को उतारू हैं तो जनता इसे अपने हाथ में एक हथियार की तरह मानती है। हालांकि इस अधिनियम ने उसका ऐसा कोई •ाला  नहीं किया है जिसकी जनता को उम्मीद थी।
पिछले कुछ सालों से यह चलन सा हो गया है कि कुछ संवैधानिक संस्थाओं के प्रमुख देश के राजनेता और राजनीतिक दलों पर तीखी टिप्पणी कर रहे हैं। हो सकता है कि इनमें से अधिकांश मामलों में राजनीतिक दलों की कमी रही हो, आखिर इन दलों और नेता ने देश में जो माहौल बनाया है उसमें इन पर होने वाला कोई हमला जनता को कुछ राहत •ारा मजा देता है। ऐसे में इन संस्थाओं (उनमें न्यायालयों की समय-समय पर आने वाली टिप्पणी •ाी शामिल हैं।) के लिए राजनीतिक दल साफ्ट टारगेट बन गए हैं। ऐसे में सीआईसी की राजनीतिक दलों के लेकर हाल ही में दिए गए निर्णय पर अगर खुशी जाहिर की जा रही है तो उसमें कुछ •ाी अचरज नहीं है। सवाल  सिर्फ  कानून बना देने •ार का  नहीं उसे लागू करने का है। आरटीआई के मामले में अब तक जो मामले सामने आए हैं उससे तो यही साबित होता है कि इसे संस्थाएं मजाक की तरह ले रही हैं। इस कानून को लेकर न तो आयोग गं•ाीर हैं और न ही इसे लागू करने के लिए नियुक्ति किए गए जनसूचना अधिकारी। ऐसे तमाम मामले हैं जिनमें सूचना आयोगों ने खुद अपने बारे में सूचनाएं उपलब्ध नहीं कराई हैं। यही नहीं कई नामी संस्थाओं के बारे में सूचना आयोगों ने जिस तरह का रवैया अपनाया है वह •ाी गौर करने लायक है।
सूचना का अधिकार पूरे देश में 2005 में लागू किया गया था। तब से लेकर  अब तक एक •ाी ऐसा बड़ा फैसला न तो राज्य  सूचना आयोग और न ही केंद्रीय आयोग की ओर से आया है, जिसमें इस कानून को ताकत  मिल सकती। 2007-8  तक केंद्रीय सूचना आयोग के पास लग•ाग 58 मामले अकेले इंडियन आॅयल के खिलाफ थे। यह मामले दो  साल  से  चल रहे थे और तब तक इनमें से एक •ाी मामला इंडियन आॅयल के खिलाफ नहीं गया था। क्या यह महज संयोग था। क्या इंडियन आॅयल इन स•ाी मामलों में पाक साफ थी। इसे समझने के लिए एक मामले पर गौर करें। वीरेंद्र कुमार बनाम इंडियन आॅयल कारपोरेशन के मामले में वादी ने कुछ सूचनाएं गैस एजेंसी के संबंध में मांगी थीं। सूचनाएं न मिलने पर 2007 में केंद्रीय सूचना आयोग में  मुकदमा दायर किया गया। कई महीने के बाद तारीख लगी और सूचना  आयोग ने अपने निर्णय में लिखा ‘‘पेट्रोल पंप के संबंध में सूचनाएं मांगी गईं जो कि इंडियन आॅयल ने उपलब्ध करा दी हैं, इसलिए मामला खारिज किया जाता है।’’ जरा गौर करें- सूचना आयोग में मामला गैस एजेंसी के संबंध में सूचना न मांगने पर डाला गया और आयोग ने फैसला पेट्रोल पंप के संबंध में दिया। इस फैसले  पर रिव्यू के लिए आवेदन किया गया।  इसे •ाी केंद्रीय सूचना आयोग ने पहले के आदेश को सही ठहराते हुए खारिज कर दिया।
यह तो हुआ केंद्रीय सूचना आयोग में फैसला  सुनाने का एक नमूना। अब बात इसकी कि खुद केंद्रीय सूचना आयोग अपने बारे में सूचना मांगे जाने पर क्या रुख अपनाता है। उत्तर प्रदेश सूचना आयोग से 2007 में प्रार्थी अजय  पांडेय ने सूचना आयोग से वहां चल रहे मुकदमों की तारीख  के बारे में निर्धारित शुल्क अदा करते हुए पोस्टल डाक से सूचना  मांगी। यह डाक सूचना आयोग को प्राप्त होने की सूचना •ाी प्रार्थी को मिल गई। इसके बाद •ाी प्रार्थी को क•ाी सूचना नहीं दी गई। सूचना आयोग में पता करने आयोग ने डाक के मिलने से ही इंकार कर दिया, जबकि प्रार्थी के पास  इसकी प्राप्ति रसीद •ाी मौजूद थी।
तीसरा मामला है सूचना आयोग  के सुनाए गए फैसले और उन्हें लागू करने का। हाईकोर्ट ने सूचना अधिकार के तहत सूचना मांगे जाने की फीस आरटीआई अधिनियम के  खिलाफ जाते हुए 500 रुपये रखी। इस पर उत्तरप्रदेश सूचना आयोग में मैने स्वयं और एक अन्य व्यक्ति एसएन शुक्ला ने शिकायत की। इसमें कहा गया कि पूरे देश में अधिनियम के मुताबिक सूचना प्राप्ति की फीस 10 रुपये ही है। ऐसे में उत्तर प्रदेश हाइकोर्ट का  सूचना के लिए 500 रुपये फीस लगाया जाना अधिनियम के खिलाफ है। इस पर आयोग ने सुनवाई  की और सितंबर 2007 में उत्तरप्रदेश सूचना  आयोग की पांच सदस्यीय पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि हाइकोर्ट  द्वारा लगाई गई  500 रुपये की फीस को गलत और अनुचित बताया। फैसले में कहा गया कि जब पूरे देश में फीस दस रुपये है तो इलाहाबाद हाइकोर्ट ने किस आधार पर 500 रुपए  फीस रखी है।  इसलिए हाइकोर्ट को अपनी फीस पूरे देश के हिसाब से करनी चाहिए। इस फैसले पर हाइकोर्ट  ने आज तक कोई संज्ञान नहीं लिया है।
एक  और मामला देखिए। यूपी के रामनाथ गुप्ता ने बार कौंसिल आॅफ उत्तरप्रदेश इलाहाबाद से जनवरी 2010 में कुछ सूचनाएं मांगीं।  सूचनाएं न मिलने पर 2010 में ही राज्य सूचना आयोग उत्तरप्रदेश में रामनाथ गुप्ता बनाम बार कौंसिल आॅफ उत्तरप्रदेश शिकायत  दाखिल की। इस शिकायत पर आज तक कोई •ाी सुनवाई की तिथि नहीं लगाई गई और शिकायत का क्या हुआ इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई।
यह मामले बताते हैं  कि देश में सूचना अधिकार अधिनियम की क्या हालत है और  ऐसे में राज्य और केंद्रीय सूचना आयोग क्या कर रहे हैं। इनके पास कितनी ताकत है। अलबत्ता तो इन आयोगों में निचली अदालतों की तरह ही मामले लंबे समय तक तारीख-पर-तारीख के मिजाज से चलते हैं। अगर किसी मामले में फैसला हो •ाी जाता है तो वह इतने बेसिर-पैर का होता है कि उससे इस अधिनियम की ही हंसी होती है। क•ाी क•ाार अच्छे फैसले आ •ाी जाते हैं तो उन्हें लागू करने की ताकत इन आयोगों में नहीं है। जिन संस्थाओं पर अधिनियम लागू होता है उन पर अ•ाी अधिनियम पूरी तरह लागू नहीं कराया जा सका है।  ऐसे में नए क्षेत्रों को शामिल करना एक तरह से अधिनियम का गला घोंट देना ही होगा। ऐसे मैं राजनीतिक दलों पर टिप्पणी करने या उन्हें आंख दिखाने के साथ सीएसी को अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है। सूचना अधिकार अधिनियम को ताकतवर बनाने की जरूरत है। अन्यथा तो आयोग ने जो किया है उससे राजनीतिक दलों को एकजुट होने का मौका दिया है और यह हो सकता है कि राजनीतिक दल आयोग के पर कतरने की अपनी  मुहिम को और तेज कर दें। ऐसे में नुकसान तो उस अवाम का होना जिसने इस अधिनियम को लागू कराने को लंबी लड़ाई लड़ी है।
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